सुग्रीव, अंगद, विभीषण को श्रीराम से मिले एक-एक पद, हनुमानजी ने अपने लिए मांगे दो पद- आज की रामकथा

सुग्रीव, अंगद, विभीषण को श्रीराम से मिले एक-एक पद, हनुमानजी ने अपने लिए मांगे दो पद- आज की रामकथा

hanuman ji
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श्रीराम अयोध्या के राजा के रूप में सिंहासन पर विराजमान हो चुके थे. उनके न्याय से प्रजा प्रसन्न थी.

विपत्ति में जिसने भी प्रभु को सहारा दिया था, प्रभु ने उन्हें भरपूर सम्मान दिया. सुग्रीव किष्किंधा के राजा तो अंगद युवराज बने. विभीषण लंकापति बने.

श्रीराम और माता सीता दोनों विपत्ति काल में हनुमानजी के किए उपकारों की चर्चा हमेशा अपने सभासदों के बीच आनंद विभोर होकर किया करते थे.

सभासदों ने एक दिन कहा- आपने उन सभी को पद दिया जिन्होंने आपका प्रिय किया था, पर हनुमानजी को कोई पद नहीं मिला. उनके साथ न्याय न हो सका.

श्रीराम तो जानते थे कि हनुमानजी को प्रभु भक्ति के अतिरिक्त कोई इच्छा ही नहीं लेकिन सभासदों के मन से यह बात निकालनी जरूरी थी कि न्याय में चूक नहीं हुई है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रभु ने हनुमानजी से कहा- आप हमेशा मेरे संकटमोचक रहे हैं. मेरे सभी प्रियजनों को कोई न कोई पद मिला, पर आप रह गए. आपको जो पद प्रिय हो वह कहिए, मैं आपको वह देना चाहता हूं.

हनुमानजी ने कहा- आपकी असीम अनुकंपा मुझे मिलती रहती है, मुझे इसके अलावा और किसी चीज की आवश्यकता ही नहीं.

परंतु भगवान बार-बार हनुमानजी से कोई पद मांगने को कहते रहे. हनुमानजी ने कहा- प्रभु आपने सबको एक-एक पद दिया है. मेरा काम एक पद से नहीं चलेगा. क्या आप मुझे दो पद दे सकते हैं?

प्रभु ने कहा- हनुमानजी आप मांगिए तो सही. सर्वस्व आपका है.

हनुमानजी ने कहा- प्रभु पद पाने से मन में मोह और मद आ जाता है. ऐसे पद का क्या लाभ जिससे अहंकार घेर ले.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हनुमानजी ने भगवान के दोनों चरण पकड़ लिए और कहा- प्रभु मुझे तो इन दो पदों की सदैव सेवा का अधिकार चाहिए.

श्रीराम ने बजरंग बली को गले से लगा लिया. सभासदों को समझ में आ गया था कि हनुमान किसी राजपद से ऊपर प्रभु के हृदय पद के अधिकारी हैं.

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संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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