श्रीरामचरितमानस-बालकांडः अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी, भए अनेक धीर मुनि ग्यानी- पार्वतीजी का घोर तप

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याज्ञवल्क्य मुनि से भरद्वाजजी रामकथा सुनाने की विनती करते हैं. उनकी विनती पर याज्ञवल्क्यजी ने श्रीरामकथा आरंभ की है. श्रीराम और शिवजी में आपसी प्रेम और आदर संबंधों का वर्णन करते याज्ञवल्क्यजी शिवजी की कथा भी सुनाते हैं.
कैसे सतीजी ने श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए सीताजी का रूप धरा तो शिवजी ने पत्नी का त्याग कर दिया क्योंकि सीताजी उनके लिए मातृवत और पूजनीया हैं. पत्नी में अब उन्हें माता का स्वरूप दिख गया था. सतीजी पिता के यज्ञ में स्वयं को भस्म कर लेती हैं.
उन्होंने श्रीहरि से अगले जन्म में महादेव को पुनः प्राप्त करने का वरदान लिया है और पर्वतराज हिमवान के घर उनका अवतार हुआ है. पार्वतीजी ने नारदजी की प्रेरणा से महादेव को घोर तप से पतिरूप में प्राप्त करने का निर्णय किया है.
इससे हिमवान और माता मैना अत्यंत विकल हैं. कोमलांगी पुत्री के ऐसे प्रण को सुनकर उनका हृदय बैठा जा रहा है. पार्वतीजी ने माता-पिता को समझा-बुझा लिया है और असाध्य तप के लिए चली हैं. हिमवान को हिम्मत देने के लिए वेदशिरा मुनि का आगमन होता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
दोहा :
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ॥73॥
वेदशिरा मुनि ने आकर सबको भली प्रकार से पार्वतीजी की महिमा को समझाया. पार्वतीजी की महिमा सुनकर सबकी शंकाओं का समाधान हो गया है.
चौपाई :
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥
अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥1॥
प्राणनाथ भोलेनाथ के चरणों को हृदय में धारण करके पार्वतीजी वन में जाकर घोर तप करने लगीं. पार्वतीजी का अत्यन्त सुकुमार शरीर तप के योग्य नहीं था तो भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंने सब भोगों का त्याग कर दिया.
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥2॥
तप करने से स्वामी के चरणों में नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तप में ऐसा मन लगा कि शरीर की सारी सुध ही बिसर गई. एक हजार वर्ष तक पार्वतीजी ने फल-मूल खाए, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताए.
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥3॥
कुछ दिन जल और वायु को ही आहार की तरह ग्रहण किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किए. जो बेलपत्र सूखकर पृथ्वी पर गिरते थे, तीन हजार वर्ष तक उन्हीं को खाकर तप किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना॥
देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥4॥
फिर सूखे पर्ण खाने भी छोड़ दिए. तभी पार्वती का नाम ‘अपर्णा’ हुआ. तप से उमा का शरीर क्षीण देखकर आकाश से गंभीर ब्रह्मवाणी हुई.
दोहा
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि।
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥74॥
हे पर्वतराज की कुमारी! सुनो, तुम्हारा मनोरथ सफल हुआ. तुम अब सारे असह्य और कठिन तपस्या को त्याग दो. अब तुझे शिवजी मिलेंगे.
चौपाईः
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी॥1॥
हे भवानी! धीर, मुनि और ज्ञानी बहुत हुए हैं पर ऐसा कठोर तप किसी ने नहीं किया. अब तुम इस श्रेष्ठ ब्रह्मा की वाणी को सदा सत्य और निरंतर पवित्र जानकर अपने हृदय में धारण करो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥2॥
जब तेरे पिता बुलाने को आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षियों के दर्शन हों तब इस वाणी को ठीक समझना.
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥
उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥3॥
इस प्रकार आकाश से कही हुई ब्रह्मा की वाणी को सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गईं और हर्ष से उनका शरीर पुलकित हो गया. इतनी कथा सुनाने के बाद याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजी से बोले कि मैंने पार्वतीजी का सुंदर चरित्र सुना दिया, अब आप शिवजी का सुहावना चरित्र सुनें.(कल शिवजी के चरित्र का वर्णन सुनेंगे)
संपादनः प्रभु शरणम्