June 17, 2026

श्रीहरि ने मोहिनी माया मारी, नारद बन गए नारी


आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- भगवन ! विष्णु-भगवान की यह कैसी माया है जो सारे जगत को मोहित कर देती है. मैं इस रहस्य को जानने के लिए बड़ा उत्सुक हूं.

इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- महाराज युधिष्ठिर, इसी प्रकार का प्रश्न नारद ने भी श्रीहरि से पूछा था. नारद ने उनसे अपनी माया दिखाने का हठ भी किया.

श्रीविष्णु ने नारद की अभिलाषा को टालते हुए कहा- माया से आप का क्या काम मुनिवर, वह तो सांसारिक मोह में फंसे जीवों के लिए है. आप कुछ और मांग लें.

नारदजी विनम्रतापूर्वक बोले- श्री हरि! मुझे किसी वर की इच्छा नहीं है. भगवन! आप अपनी माया के ही दर्शन कराइए. उसे देखने की इच्छा बड़ी बलवती हो रही है. नारद के बार-बार आग्रह पर नारायण ने नारदजी की बात स्वीकार ली.

नारायण ने नारदजी की अँगुली पकड़ ली. अगले ही क्षण वे श्वेतद्वीप नाम के स्थान पर थे. इसी क्षण भर में नारायण ने शिखा, जनेऊ कमण्डलु, मृगचर्म धारण कर एक वेदपाठी बूढे ब्राह्मण यज्ञशर्मा का रूप धारण कर चुके थे.

भगवान ने नारद जी से कहा. यह स्थान तो तीर्थस्थान जैसा उत्तम लगता है, हमें कान्यकुब्ज नाम के इस नगर में प्रवेश से पहले इस सरोवर में स्नान कर लेना चाहिए. यह कह कर भगवान सरोवर में जाकर शीघ्र ही बाहर आ गये.

See also  लंका दहन कर क्यों पछताए हनुमान, क्यों छोड़ दिए दो महलः आज की रामकथा में लंका दहन प्रसंग

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

Share: