श्रीराम के प्रेम से धन्य हो गए निषादराजः बालक निषाद और बालरूप भगवान के भेंट और मित्रता का प्रसंग
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निषादराज के पिता की चक्रवर्ती महाराज दशरथ से मित्रता थी. वह दशरथ के दर्शन करने समय-समय पर अयोध्या आया करते थे.
दशरथजी के घर में प्रभु का अवतार जब हुआ वह तब तक निषाद वृद्धावस्था में पहुंच गए थे लेकिन संतान की बधाई लेकर स्वयं अयोध्या आए. दशरथ के चारों पुत्र साधारण पुरूष तो थे नहीं, सभी अवतारी थे.
उनके दर्शनों से निषादराज को जो आनंद की अनुभूति हुई उसकी कोई सीमा ही न थी. उनका तो हृदय वहां से जाने को ही नहीं करता था. भला भगवान के बालरूप के आनंद से कौन वंचित रहना चाहेगा!
जब बृद्ध निषाद अयोध्या से लौटे, तो प्रभु की सुंदरता, उनकी बाल लीलाओं का वर्णन करते नहीं अघाते. यह सब सुनकर छोटे निषाद के मन में बड़ी इच्छा हुई कि क्यों न मैं भी दर्शन कर लूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बालक निषाद के मन में यह बात बैठ गई कि उसे अयोध्या के राजकुमारों के दर्शन करने हैं. इस तरह वह पांच वर्ष के गए. पुत्र की उत्कंठा देख वृद्ध पिता ने आज्ञा दे दी कि जाओ इच्छा पूरी कर लो. साथ में सहायक भी भेज दिए.
पिता ने भेंटस्वरूप मीठे फल तथा रुरु नामक मृग के चर्म की बनी हुईं छोटी छोटी पनहिंयाँ (बनवासियों द्वारा पहनी जाने वाली छोटी धोती) देकर पुत्र को विदा किया.
छोटे निषाद ने फल वगैरह तो साथियों को सौंपा कि लेकर चलो लेकिन चारों पनहियां अपनी काँख मे दबाए चलते रहे. कई दिन में रास्ता तय हुआ. अयोध्या पहुंचकर छोटे निषाद ने अपनी गठरी सरयू जी के किनारे रखी और स्नान करने लगे.
उन्हें पिता ने समझाया था कि स्नान करके ही महल में जाना. वह स्नान तो कर रहे थे तो लेकिन निगाह गठरी पर ही थी जिसमें वह रामलला और उनके अनुजों के लिए उपहार लाए थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तभी छोटे निषाद ने देखा कि चार सुंदर बालक खेलते हुए आए और गठरी के पास बैठ गए फिर गठरी खोलने भी लगे. छोटे निषाद ने देखा तो उनसे नजर नहीं हटती थी लेकिन अपने राजकुमारों के लिए रखा उपहार कोई छूए यह भी पसंद न था.
उसने जोरदार आवाज में पुकारा- ओ भैया गठरी न खोलो. यह हमारी है. लेकिन इतने में चारों कुमारों ने गठरी खोलकर चारों पनहियां पहन ली और प्रसन्नता में उछल-कूद करने लगे.
छोटा निषाद भागता हुआ आया और बालसुलभ क्रोध करने लगा- तुम जानते नहीं यह मैं राजा दशरथजी के चारों कुमारों के लिए ले जा रहा हूं, तुमने बिना पूछे कैसे पहन ली!
प्रभु ने कहा- मित्र तब तो और अच्छा हुआ. जिनके लिए लेकर आए थे, उन्हें मिल गई. हम हैं वे चारों जिनके लिए आप लेकर आए. सुनते ही छोटा निषाद वहीं बालू में लोट गया. उठाकर प्रभु ने सीने से लगा लिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अब पांचो लोग हाथ में हाथ डाले महल की ओर चल पड़े. वहां पहुंचकर चारों भाइयों ने महाराज को प्रणाम किया. उसी तरह निषाद ने भी उन्हें प्रणाम किया. प्रभु ने परिचय कराया- पिताजी यह मेरा मित्र है.
निषाद आयु में छोटा था लेकिन बुद्धि में कम न था. उसने जब सुना कि च्रकवर्ती सम्राट के पुत्र छोटी सी भेंट के बाद ही मुझे अपना मित्र मानने लगे हैं, तो भाव-विभोर हो गया. उसकी आंखों में आंसू आ गए. प्रभु का हृदय तो स्नेह का अथाह सागर ही है.
राजा दशरथ ने भी पुत्र की उदारता देखा तो बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने समझ लिया कि निषाद के साथ ये चारों भाई प्रसन्न रहते हैं. इसलिए दशरथ ने निषाद को अयोध्या में धनुर्विद्या सिखाने के बहाने रोक लिया और बूढ़े निषाद को सूचना कर दी.
एक बार वन विहार से लौटने पर प्रभु राम द्वारा निषाद की बड़ी प्रशंसा की गयी. उसी समय राजा दशरथ ने निषाद को अपने सीने से लगा लिया और अपने हाथ का कंगन पहनाते हुए शृंगवेरपुर का राजा बना दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.निषाद, अब शंगवेरपुर के राजा निषाद हो गए थे और निषादराज कहलाते थे. प्रभु को जब बनवास की सूचना उन्हें मिली तो वह भागे आए मिलने. भगवान और भक्त की भेंट की कथा तो सब जानते ही है.
भगवान की लीलाओं की कथा हमने कई बार सुनी होती है फिर भी बार-बार सुनने की इच्छा होती है. कभी मन नहीं भरता. यह भी प्रभु की ही लीला है. इस कड़ी को पूरा करने के लिए प्रभु श्रीराम और निषादराज के मिलन का प्रसंग भी जल्द सुनाउंगा.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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