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श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध: जब भगवान को अपनी ही प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ी (धार्मिक कथा)

श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध: जब भगवान को अपनी ही प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ी (धार्मिक कथा)

श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध: जब भगवान को अपनी ही प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ी (धार्मिक कथा)

श्री कृष्ण और अर्जुन का युद्ध क्यों हुआ था? गुरु और शिष्य के बीच किसने बो दिए युद्ध के बीज? कैसे रुका महासंग्राम?

कृष्ण और अर्जुन का युद्धः गंधर्व चित्रसेन को दंड देने के लिए गालव ने मांगी श्री कृष्ण से सहायता
कृष्ण और अर्जुन का युद्धः गालव ने मांगी श्री कृष्ण से सहायता

नारद जी की लीला निराली है। उन्होंने एक बार ऐसी लीला कर दी कि एक दूसरे के परम सखा कृष्ण और अर्जुन का युद्ध शुरू हो गया। यह कथा गंधर्व चित्रसेन द्वारा की गई एक धृष्टता से शुरू होती है।

एक बार महर्षि गालव प्रातः काल में सूर्य को अर्घ्य दे रहे थे. उसी समय आकाश मार्ग से जाते हुए गंधर्व चित्रसेन ने ऊपर से थूका और वह अंजलि में गिर गया.

मुनि गालव अत्यधिक क्रोधित हो उठे और उसे शाप देना ही चाहते थे कि तभी उन्हें ध्यान आ गया कि क्रोध और शाप देने से तपस्या का नाश होता है। एक गंधर्व को दंड देने के लिए अपने इतने वर्षों के तप का नाश करना बुद्धिमानी नहीं होगी।

यह विचार कर उन्होंने सीधे भगवान श्रीकृष्ण से फरियाद की और चित्रसेन को मृत्युदंड देने का आग्रह किया। भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण ने भी महर्षि की बात रखते हुए प्रतिज्ञा कर ली कि वे चौबीस घंटे के भीतर मूर्ख गंधर्व चित्रसेन का वध कर देंगे।

 

नारद जी की लीला और चित्रसेन की चिंता

कृष्ण और अर्जुन का युद्धः प्राण बचाने को चित्रसेन पहुँचा सुभद्रा
कृष्ण और अर्जुन का युद्धः प्राण बचाने को चित्रसेन पहुँचा सुभद्रा

महर्षि गालव के जाने के ठीक बाद देवर्षि नारद भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए पहुंचे। नारद जी ने प्रभु के मुख पर चिंता की रेखाएं देखकर उसका कारण पूछा। भगवान ने उन्हें पूरी घटना और अपनी प्रतिज्ञा के बारे में बता दिया।

नारद जी तो ऐसी ही लीलाओं की प्रतीक्षा में रहते हैं। वे तुरंत वहां से उड़े और सीधे गंधर्व चित्रसेन के पास पहुंचकर उसे श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा के बारे में बता दिया। यह सुनकर बेचारे गंधर्व के प्राण सूख गए। वह अपनी जान बचाने के लिए ब्रह्मधाम, शिवपुरी, इंद्र, यम और वरुण—सभी के पास सहायता मांगने गया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण से शत्रुता कौन मोल लेता, इसलिए किसी ने उसे अपने यहां ठहरने तक नहीं दिया।

अंत में नारद जी ने ही उसे एक उपाय सुझाया। नारद जी ने कहा— “आज आधी रात को यहां एक स्त्री आएगी, उसे देखकर तुम जोर-जोर से रोना, वही तुम्हारी प्राण रक्षा करेगी। लेकिन ध्यान रहे, जब तक वह स्त्री तुम्हारे कष्ट दूर करने की सौगंध न ले ले, तब तक अपने संकट का कारण भूले से भी मत बताना.”


सुभद्रा का धर्म-संकट और शरणागत की रक्षा

एक ओर नारद जी ने चित्रसेन को यह समझाया, तो दूसरी ओर वे अर्जुन के महल पहुंचे और सुभद्रा से बोले— “आज बहुत पावन दिन है। आधी रात को यमुना स्नान करने और किसी शरणागत (शरण में आए हुए) की रक्षा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है.”

आधी रात को सुभद्रा अपनी सहेलियों के साथ यमुना स्नान करने पहुंचीं। वहां उन्होंने चित्रसेन को विलाप करते हुए देखा। पुण्य कमाने की लालसा में सुभद्रा ने उसके रोने का कारण पूछा। चित्रसेन बिना प्रतिज्ञा के कुछ भी बताने को राजी नहीं हुआ। अंततः विवश होकर सुभद्रा ने उसके संकट को दूर करने की प्रतिज्ञा ले ली, तब गंधर्व ने अपना सारा हाल कह सुनाया।

यह सुनकर सुभद्रा भारी धर्म-संकट में पड़ गईं। एक तरफ भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा और आज्ञा थी, तो दूसरी तरफ अपनी प्रतिज्ञा। लेकिन क्षत्राणी होने के नाते उन्होंने शरणागत के धर्म को सर्वोपरि माना और चित्रसेन को अपने साथ महल ले आईं। उन्होंने सारी परिस्थिति अपने पति अर्जुन को बताई। चित्रसेन अर्जुन का मित्र भी था, इसलिए अर्जुन ने सुभद्रा को आश्वस्त किया कि तुम्हारी प्रतिज्ञा की हर हाल में रक्षा होगी।


जब आमने-सामने आए श्री कृष्ण और अर्जुन: महासंग्राम

कृष्ण और अर्जुन का युद्धः महादेव के हस्तक्षेप से रूका महासंग्राम

नारद जी ने द्वारका पहुंचकर श्रीकृष्ण को यह सूचना दे दी कि अर्जुन ने चित्रसेन को अपने यहां आश्रय दे रखा है। यह सुनकर भगवान ने नारद जी से कहा कि वे जाकर अर्जुन को समझाएं और लौटा दें।

जब नारद जी ने अर्जुन को समझाया, तो अर्जुन ने दृढ़ता से उत्तर दिया— “यद्यपि मैं श्रीकृष्ण की शरण में हूं, लेकिन उन्होंने ही मुझे शरणागत की रक्षा का सर्वोच्च धर्म सिखाया है। मैं अपने धर्म से विमुख नहीं हो सकता। प्रभु तो ईश्वर हैं, वे अपनी प्रतिज्ञा बदलने में समर्थ हैं, किंतु मैं एक साधारण मनुष्य हूं, मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है.”

अब युद्ध की घोषणा हो गई। द्वारका के समस्त यादव और पांडव सेना सहित रणक्षेत्र में आमने-सामने आ डटे। एक भयंकर और घमासान युद्ध छिड़ गया।

युद्ध का कोई निर्णय नहीं निकल पा रहा था क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण जब भी कोई प्रहार करते, अर्जुन मन ही मन श्रीकृष्ण का ही स्मरण कर उनसे अपनी रक्षा की गुहार लगाते और जवाबी प्रहार करते। चूंकि प्रभु ने पहले ही अर्जुन को विजयी और सुरक्षित रहने का वरदान दिया था, इसलिए अर्जुन इसका पूरा लाभ उठा रहे थे। अंत में स्थिति को गंभीर देख भगवान श्रीकृष्ण ने अपना महासुदर्शन चक्र निकाल लिया।

यह देख अर्जुन ने भी बिना देर किए भगवान शंकर का स्मरण कर अपना अचूक पाशुपत अस्त्र निकाल लिया।


भगवान शिव का हस्तक्षेप और लीला की समाप्ति

दोनों महाविनाशक अस्त्रों को आमने-सामने देख तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। तब देवों के देव महादेव स्वयं प्रकट हुए और दोनों अस्त्रों को शांत किया। इसके बाद वे भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।

महादेव ने मुस्कुराते हुए कहा— “प्रभो! भक्तों की रक्षा और उनकी बात रखने के लिए अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाना तो आपका सहज स्वभाव है। आपने भक्तों का मान रखने के लिए अनगिनत बार ऐसा किया है। अब इस लीला को यहीं समाप्त कीजिए.”

भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर अपना चक्र वापस लिया, आगे बढ़कर अर्जुन को गले से लगाया और गंधर्व चित्रसेन को अभयदान दिया। यह देखकर सभी लोग ‘धन्य-धन्य’ कह उठे।

किंतु महर्षि गालव का गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ था। उन्होंने झुंझलाते हुए कहा, “यह तो बहुत अच्छा मजाक रहा!” और गुस्से में कहा कि मैं अपनी शक्ति से सुभद्रा समेत इस गंधर्व को अभी भस्म कर देता हूं। ऐसा कहकर उन्होंने हाथ में जल लिया।

तभी पतिव्रता सुभद्रा ने अडिग विश्वास के साथ कहा— “यदि मैं सच्चे मन से भगवान श्रीकृष्ण की भक्त हूं और अर्जुन के प्रति मेरा पतिव्रत्य पूर्ण है, तो यह जल ऋषि के हाथ से पृथ्वी पर न गिरे.”

और ठीक वैसा ही हुआ! सुभद्रा के सतित्व और भक्ति के प्रभाव से गालव के हाथ का जल वहीं ठहर गया। यह चमत्कार देख महर्षि गालव का घमंड टूट गया। उन्होंने प्रभु श्रीकृष्ण को सादर प्रणाम किया और अपने आश्रम वापस लौट गए।

(यह एक प्रचलित पौराणिक किंवदंती है जो भगवान की अपने भक्तों के प्रति अगाध प्रेम और शरणागत की रक्षा के धर्म को दर्शाती है।)

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