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श्रीराम-भरत प्रेम कथाः धरा! तुम भरत के लिए निष्कंटक और कोमल हो जाना

श्रीराम-भरत प्रेम कथाः धरा! तुम भरत के लिए निष्कंटक और कोमल हो जाना

RamBharat
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माता कैकेयी की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान श्रीराम लक्ष्मणजी व सीताजी के साथ चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे. राह बहुत पथरीली और कंटीली थी. प्रभु के चरणों में एक कांटा चुभ गया.

प्रभु रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर पृथ्वी से अनुरोध करने लगे. श्रीराम बोले- मां, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है. क्या आप स्वीकार करेंगी? पृथ्वी बोलीं- प्रभु प्रार्थना नहीं दासी को आज्ञा दीजिए.

प्रभु बोले- मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज में इस पथ से गुज़रे तो नरम हो जाना. कुछ पल के लिए अपने आंचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना. मुझे कांटा चुभा सो चुभा, मेरे भरत के पांव में आघात मत करना.

प्रभु को यूं व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई. बोली- भगवन, धृष्टता क्षमा हो पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार हैं? जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो भरत नहीं कर पाएंगे?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.फिर मैंने तो सुना है कि वह स्वभाव से संत हैं. संत तो सहनशील व धैर्यवान हुआ करते हैं. फिर भरत कुमार को लेकर आपके चित में ऐसी व्याकुलता क्यों?- पृथ्वी की उत्सुकता बढ़ गई थी.

प्रभु बोले- नहीं, नहीं माता. आप मेरे कहने का अभिप्राय नहीं समझीं! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पांव को नहीं, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा!’ पृथ्वी ने आश्चर्य में पूछा- हृदय विदीर्ण!! ऐसा क्यों प्रभु?

प्रभु श्रीराम ने कहा- भरत अपनी पीडा़ से नहीं दुखी होगा बल्कि यह सोचकर कि इसी कंटीली राह से मेरे भ्राता श्रीराम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पगों में भी चुभे होंगे.

मैया, मेरा भरत कल्पना में भी मेरी पीडा़ सहन सहन नहीं कर सकता! इसलिए उसकी उपस्थिति में आप कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना.

संकलनः रमा सागर
संपादनः प्रभु शरणम्

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