रामनाम की महिमाः हनुमानजी ने श्रीराम से किया भरतजी की रामभक्ति का गुणगान

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लक्ष्मणजी को मेघनाद ने शक्ति मारी और वह मूर्च्छित होकर पड़े थे. सुषेण वैद्य ने संजीवनी लाने को कहा तो हनुमानजी संजीवनी की खोज में उड़े. बूटी को पहचान नहीं पा रहे थे इसलिए पूरा पर्वत ही उखाड़ा और लेकर चल पड़े.
रास्ते में वह कौशलपुरी के आकाश से होकर गुजरे. श्रीराम की चरण पादुका को राजा बनाकर सत्ता चला रहे भरत जी ने उन्हें देखा और शत्रु समझकर बाण मारकर धरती पर गिरा दिया.
भरतजी को पता चला कि यह तो रामकाज के लिए चले थे तो उन्होंने पवनसुत को पवन से भी तेज वेग से श्रीराम के पास लंका में पहुंचा दिया. लक्ष्मणजी के स्वस्थ होने के बाद हनुमानजी श्रीराम को अपने मन की कई बातें सुनाने लगे.
हनुमानजी श्रीराम से बोले- आपने संजीवनी लाने का दायित्व सौंपकर सबसे बड़ा उपकार किया. आपने लक्ष्मणजी की मूर्च्छा मिटाने के लिए यह कार्य नहीं किया क्योंकि आपके आदेश से संजीवनी स्वयं प्रकट हो सकते थे. आपने तो यह मुझे मेरी मूर्च्छा दूर करने के लिए किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हनुमानजी बोले- “सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू” प्रभु मुझे लगता था कि रामनाम जपके मैंने श्री आपको वश में कर रखा है. प्रभु आज मेरा यह भ्रम टूट गया कि मैं ही सबसे बड़ा रामभक्त और रामनाम का जप करने वाला हूं.
श्रीराम ने पूछा- हनुमानजी आपकी बात मुझे समझ नहीं आई. हनुमानजी बोले– प्रभु सारे संसार को अपने अंदर समाए हुए हैं आपसे यह बात कैसे छुपी है. फिर भी आपने पूछ दिया तो कहे देता हूं.
भरतजी तो वास्तव में संत है. रामनाम की असली शक्ति तो उनके पास है. जब मैं भरतजी के बाण से गिरा तो मुझे स्वस्थ करने के लिए भरतजी ने न तो संजीवनी मंगाई, न वैध बुलाया. उन्हें रामनाम के अचूक होने पर भरोसा था और वहीं हुआ.
हनुमानजी ने बताया- भरतजी ने हाथ जोड़कर आपरा स्मरण किया और बोले यदि मन वचन और शरीर से श्रीरामजी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो, यदि रघुनाथ मुझ पर प्रसन्न हों मुझसे स्नेह रखते हैं तो इस वानर की सारी पीड़ा समाप्त हो जाए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भरतजी के मुख से ये वचन निकले और मैं रामनाम का उच्चारण करता उठ बैठा. मैं नाम तो लेता हूं पर मेरा भरोसा भरतजी जैसा नहीं अन्यथा मैं संजीवनी लेने क्यों जाता! मैं भी भरतजी की तरह उस दृढ़ भक्ति की शक्ति से लक्ष्मणजी की मूर्च्छा मिटा सकता था.
हनुमानजी आगे बोले- दूसरी बात प्रभु! बाण लगते ही मैं गिरा वह पर्वत नहीं गिरा क्योंकि पर्वत तो आपने उठा रखा था. मैं तो इस अभिमान में था कि मैंने उठा रखा है. मेरा दूसरा अभिमान भी टूट गया.
एक बात और प्रभु! आपके तरकस में भी ऐसा बाण नहीं है जैसे बाण भरतजी के पास है. आपने सुबाहु मारीच को बाण मारकर दूर गिरा दिया. आपका बाण तो आपसे दूर कर देता है पर भरतजी का बाण तो आपके चरणों में ला देता है. उन्होंने मुझे बाण पर बिठाकर आपके पास भेज दिया.
श्रीराम मुस्कुराने लगे. उन्होंने हनुमानजी को समझाया- हनुमानजी, जब मैंने ताडका व अन्य राक्षसों को मारा तो वे सभी मरकर मुक्त होकर मेरे ही पास तो आए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इसपर हनुमानजी बोले- प्रभु आपका बाण तो मरने के बाद सबको आपके पास लाता है पर भरतजी का बाण तो जिन्दा ही आपके चरणों में लेकर आता है. उनके बाण पर बैठकर मैं आपके पास पहुंचा. भरत जी संत है.
हनुमानजी बोले- प्रभु मेरे मन को पुनः अभिमान ने घेरा, भला बाण मेरा भार उठा सकेगा? परंतु भरतजी ने तो पर्वत सहित मुझे अपने बाण पर बिठाकर पहुंचा दिया क्योंकि उन्होंने बाण साधने से पहले आपका स्मरण किया और आपकी शक्ति के हवाले कर दिया था.
प्रभु संजीवनी लाने के कार्य के लिए आपने मुझे आदेश देकर मेरा यह जीवन सफल कर दिया. रामनाम अनुराग का है, विश्वास का है. हृदय से लें तो इसके बाद किसी चीज की आवश्यकता ही नहीं. नहीं तो सारा भ्रमजाल ही है.
सियापति रामचंद्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय!!
(रामचरित मानस का प्रसंग)
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