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शनि की साढ़े साती और ढैय्या का कैसे कम करें दुष्प्रभाव वर्ष २०१५ में: तुला, वृश्चिक, धनु राशि वालों के लिए विशेष विचार

शनि की साढ़े साती और ढैय्या का कैसे कम करें दुष्प्रभाव वर्ष २०१५ में: तुला, वृश्चिक, धनु राशि वालों के लिए विशेष विचार

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भगवान शिव ने शनिदेव का ग्रहों के बीच दंडाधिकारी का पद दिया है. वह हर व्यक्ति के कार्यों का लेखा जोखा करके उसकी जीवन अवधि में दंडविधान करते हैं.

किसी भी जातक की कुंडली में जन्म राशि से यदि 12, 1 और 2 भाव में गोचर से शनि आता है तो शनि की साढ़ेसाती आती है.

इस वर्ष के प्रारम्भ में शनि के वृश्चिक राशि में होने से 2015 में तुला राशि, वृश्चिक राशि तथा धनु राशि वाले लोग शनि की साढ़ेसाती से प्रभावित रहेंगे.

शनि की साढ़े साती का मतलब होता है, साढ़े सात वर्ष तक एक राशि पर प्रभाव. इस प्रभाव को ढ़ाई-ढ़ाई साल के तीन खंडों में बांट दिया जाता है. उसी को ढैय्या कहते हैं.

अपनी ढैय्या अवधि में शनि किसी व्यक्ति के तीन अंगों को बारी-बारी से विशेष प्रभाव में लेते हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पहले ढैय्या में शनि का प्रभाव सिर पर, दूसरे ढैय्या में हृद्य और उदर पर और तीसरे ढैय्या में पैरों पर प्रभाव होता है.

तो 2015 में शनि धनु राशि के व्यक्तियों के सिर पर, वृश्चिक राशि वाले के ह्रदय पर तथा तुला राशि वालों के पैर पर शनि की साढ़ेसाती का विशेष प्रभाव रहेगा.

सिर पर प्रभाव का अर्थ है, बुद्धि को प्रभावित करना. इससे अनिर्णय की स्थिति, गलत फैसले, क्रोध या भावावेश की आशंका रहती है.

इस कारण आप व्यर्थ के विवादों में पड़कर अपने धन और समय का नुकसान कर सकते हैं. विवादों के कारण अपराध व जेल का भय हो सकता है.

शनि की ढैया गोचर में राशि से चौथे और आठवें भाव में शनि के आने पर होता है. इस वर्ष मेष और सिंह राशि वाले जातक के लिए भी शनि की ढैया रहेगी.

शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव में जो जातक आते हैं उनके लिए समय अनुकूल नही रहेगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उनके लिए शारीरिक कष्ट, मानसिक चिंता, पारिवारिक उलझनें, आर्थिक तनाव एवं खर्च की अधिकता और शुभ कार्यों में परेशानियां आती रहेंगी.

लेकिन शनि की साढ़े साती के दुष्प्रभाव को बहुत आसानी से कम किया जा सकता है, या फिर उसे अनुकूल बनाया जा सकता है.

राजा दशरथ पर शनिदेव का प्रकोप हुआ था और अयोध्या में बारह वर्षों तक भयंकर सूखा पड़ गया था.

दशरथ ने शनिदेव को युद्ध में हराकर प्रकोप से मुक्ति पानी चाही थी लेकिन शनिदेव के आगे वह धराशाई हो गए.

हारकर राजा दशरथ ने शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए एक स्त्रोत की रचना की थी. दशरथ की देवताओं से मित्रता थी.

इसका मान रखते हुए शनिदेव ने उन्हें वरदान दिया था कि इस स्त्रोत का पाठ करने से उनके प्रकोप से राहत मिलेगी.

इसलिए दशरथ कृत शनि स्त्रोत का शनिवार और मंगलवार को पाठ करना चाहिए. आपके एप्प में यह स्त्रोत दिया गया है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शनि प्रकोप से बचने के सरल उपायः

-हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का रोज पाठ, अपनी जीवन चर्या में शामिल कर लें.

-शनि पीपल में निवास करते हैं. इसलिए पीपल पेड़ में सुबह में जल दें, और शाम में दीपक जलाएं.

-घोड़े के नाल या नाव की कील की अंगूठी या नीलम धारण कर सकते हैं. नीलम महंगा होता है इसलिए उसका उपरत्न नीली भी पहन सकते हैं.

-दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करें.

प्रस्तुतिः
डॉ. नीरज त्रिवेदी, ज्योतिषाचार्य, पीएचडी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम्

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