भागवत कथाः दुर्वासा के शाप से राक्षस बने तृणावर्त का श्रीकृष्ण के हाथों उद्धार

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जब कंस को मालूम हुआ कि पूतना का वध हो गया है तो वह और भयभीत हो गया. उसने अपने निजी रक्षक तृणावर्त राक्षस को श्रीकृष्ण की हत्या करने के लिए भेजा.
तृणावर्त गोकुल में पहुंच गया. प्रभु को इसकी सूचना हो गई. माता यशोदा उन्हें दूध पिला रही थीं. श्रीकृष्ण ने अपना वजन चट्टान सा भारी कर लिया. माता के लिए भार असह्य हो गया.
उन्होंने कन्हैया को आंगन में लिटाया और भीतर चली गईं. तभी तृणावर्त वहां पहुंच गया. तृणावर्त बवंडर बन जाता था और और बड़े-बड़े पेड़ों चट्टानों को उखाड़कर विध्वंस मचा सकता था.
तृणावर्त बवंडर बनकर गया और कन्हैया को अपने साथ ले उड़ा. उसने सोचा कि कन्हैया को खूब आकाश के चक्कर लगाऊंगा और फिर जमीन पर पटककर प्राण ले लूंगा. श्रीकृष्ण ने अपना भार बहुत बड़ा लिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तृणावर्त के लिए उनका भार संभालना असंभव होता जा रहा था. वह बवंडर की गति जितनी तेज करता रहा कान्हा उतना ही भार बढ़ाते रहे. वह बेचैन हो गया. श्रीकृष्ण ने उसे एक चट्टान पर पटका और गला घोंटकर उसका अंत कर दिया.
उसके मरने के बाद बवंडर शांत हुआ तो बालकृष्ण की खोज होने लगी. यशोदा मैया और रोहिणी जी के साथ-साथ अन्य गोकुल की स्त्रियां विलाप करने लगीं. खोज हुई तो प्रभु एक स्थान पर राक्षस के ऊपर कूदकर खेल रहे थे.
उन्हें तुरंत लेकर यशोदाजी आईँ और फिर से उनकी नजर उतारने लगीं. उन्होंने सभी देवों का स्मरण किया और ऐसे भयंकर बवंडर में अपने लल्ला की रक्षा के लिए सबका आभार किया. प्रभु माता की इस ममता का आनंद लेते रहे.
तृणावर्त दरअसल दुर्वासा द्वारा शापित राजा सहस्त्राक्ष था जिसका वधकर प्रभु ने उद्धार किया. राजा सहस्राक्ष अपनी रानियों सहित नदी में क्रीड़ा कर रहे थे. तभी वहां से महर्षि दुर्वासा गुजरे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सहस्राक्ष अभिमानी था. रानियों के साथ क्रीडा में डूबे राजा को अहंकार हुआ. उसने महर्षि दुर्वासा को प्रणाम तक नहीं किया. एक रानी ने कहा कि हमें जल से बाहर आकर महर्षि को प्रणाम करना चाहिए अन्यथा उन्हें अच्छा नहीं लगेगा.
सहस्राक्ष की तो मति मारी गई थी. उसके पास कुछ चमत्कारिक शक्तियां थीं. उसने दुर्वासा का सम्मान तो दूर रानियों का मनोरंजन करने के लिए उनकी ओर माया से तूफान की तरह तेज हवाएं चलानी शुरू कर दीं.
दुर्वासा राजा की इस करतूत से क्रोधित हो गए. उन्होंने शाप दिया कि सहस्त्राक्ष तुमने मनोरंजन के लिए मेरा अनादर किया. मेरी हंसी उड़ाने के लिए तूफान बनाया. इसका तुम्हें दंड मिलेगा. जा तू राक्षस होकर तूफ़ान पैदा कर.
दुर्वासाजी का शाप सुनने ही राजा उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा. उसकी रानियां भी विलाप करके क्षमा मांगने लगीं. दुर्वासा बोले कि मेरा शाप तो वापस नहीं हो सकता किन्तु तुम्हारी मुक्ति का मार्ग बता सकता हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतार लेंगे. वह अपने स्पर्श से तुम्हारा उद्धार करेंगे. वही राजा सहस्राक्ष तृणावर्त दैत्य बनकर उद्धार की प्रतीक्षा में मथुरा में पड़ा रहा.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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