नागदंश की रोमांचक सत्यकथा
नागों में दिव्य शक्तियां होने की बात हमेशा से कही जाती है लेकिन विज्ञान इसे गलत बताता है। फिर भी सर्पों से संबंधित ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जो विज्ञान को झुठला देती हैं। आज हम आपको ले चलेंगे प्राचीन भारत की उस परंपरा की ओर जिसका अब भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बोलबाला है। ओझा-गुनी का नाम गांव से ताल्लुक रखने वाले किस भारतीय ने न सुना होगा। क्या करते हैं ये ओझा-गुनी, कैसे होता है इनके झाड़-फूंक का असर, क्या ये बस भ्रमजाल है या कुछ व्यवहारिक भी है। हम इसके बारे में कोई टिप्पणी नहीं करेंगे पर आप कोई राय बनाने से पहले इसे पढ़े जरूर। सोच की दिशा शायद बदल जाए।
नाग जाति के सर्पों में दिव्य शक्ति की एक ऐसी ही घटना मध्य प्रदेश के रीवां जिले की है। जिसे लेखक ने खुद अपनी आंखों से देखा है। पाठकों की रुचि बढ़ाने के लिए पूरे घटनाक्रम का नाटकीय वर्णन किया गया है।
रीवां के दूरदराज के एक गांव में सुबह होने में अभी कुछ समय शेष है, कुछ लोग उठ चुके थे, और दैनिक कार्यों की शुरुआत में लगे हुए थे।
तभी अचानक गाँव के कोने से स्त्रियों पुरूषों और बच्चों का शोर सुनाई देने लगा, यह शोर पूरे गाँव में फैलता जा रहा था। आवाज़ें बहुत तीखी और हृदयविदारक थी, सभी लोग एक ही तरफ भागे जा रहे थे।
जिससे पूछो बस एक ही बात कह रहा था, कि फूलन सिंह को सर्प ने काट लिया है, अब इससे अधिक पूछना बेमानी था, सारे गाँव में अफरा तफरी मच गयी, फूलन सिंह की , गुंडागर्दी के कारण गाँव में अच्छी चलती थी, लोग उसके बारे में कुछ कहने से भी घबराते थे। हर किसी को उस से पिटने का डर रहता, तो किसी को गालियों की बौछार खाने का। ।शेष अगले पेज पर, नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें-
उनमें से कुछ, किसी और की दुश्मनी अपने सर मोल नहीं लेना चाहते थे। उसकी एक गुंडा, चोर मण्डली थी, जो अपने गुरु की आज्ञा का पालन मदारी के बन्दर की तरह करती थी, खैर, गाँव के सभी लोगों का एक ही जगह जाकर बहुत बड़ा हुजूम इकठ्ठा हो गया, ये फूलन सिंह का घर था
सर्प के काटने से फूलन सिंह का शरीर लगातार शिथिल अवस्था में पहुँच रहा था, कुछ जानकर लोगों ने काटे हुए स्थान पर, नस्तर लगा दिया, तो दूसरों ने उस घाव में मिर्च भर दी, ताकि जहर का असर कम बना रहे।
कुछ ने उसके हाथ की कोहनी के पास कपड़े से मजबूती से बाँध दिया था, लेकिन इतना सब कुछ करने के बाद भी जहर किसी बाधा दौड़ के एथलीट की भांति सभी बाधाओं को पार करता हुआ पूरे शरीर में फ़ैलता जा रहा था।
अब कुछ लोगों ने फूलन सिंह के शरीर को उस चबूतरे पर लाकर नीम के पत्तों के बीच दबा दिया।
अब इंतज़ार था……….उन भगत, बायगीरों का, जो मंत्रों से सर्पविष, उतारते हैं।शेष अगले पेज पर, नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें-
जो कान में खबर पड़ते ही तुरंत उपचार हेतु निकल पड़ते हैं, चाहे उनको कितनी हीं बाधाओं का सामना क्यों ना करना पड़े, मित्रों, आपने मुंशी प्रेमचंद्र की कहानी ‘मन्त्र’ तो पढ़ी ही होगी।
उसमें वो बूढा भगत सर्प के काटे जाने की खबर सुनने के बाद से, अपने आप को रोकने की बहुत कोशिश करता है लेकिन रोक नहीं पाता, और उसे उस लड़के का इलाज़ करने जाना पड़ता है, जहाँ तक मैंने सुना और पूछा हैं इन बायगीरों से ,ये बायगीर, भगत जो मन्त्र, झाड़ फूंक करते हैं।
इनको गुरु और मन्त्रों की आन लगी होतीं है, यदि एक बार सर्प के काटे जाने की खबर कानों में पड़ गयी,उसी पल इनको जाना पड़ेगा, अब चाहे दिन हो, या रात। यदि वो इससे छुटकारा पाना चाहे तो किसी को अपना शिष्य बनाकर उसे ये विद्या सिखा दें। फिर वो इस बंधन से कुछ हद तक मुक्त हो सकते हैं, अब शिष्य पर भी यही बात लागू होती है।
फूलन सिंह की माता हरि प्यारी एवं पत्नी शांति देवी बहुत अधिक भयभीत थी, अब उन्हें भविष्य की चिंता सताए जा रही थी, वे अपने बेशकीमती आंसुओं को निरंतर बहाए जा रही थी, बच्चे भी अपने पिता की हालत को देखकर, अपने कोमल नवीन आंसुओं को बहा लेते और हाथ के बाजुओं से पोंछ लेते थे।
पास खड़े सभी स्त्री पुरुष उनको समझा रहे थे। तब तक पास से, दूर से, भगत-बायगीर अपनी मंडलियों के साथ टोलियों के रूप में आ गए।
उन्होंने फूलन सिंह को नीम के पत्तों के ढेर में से निकालकर चौकी के समीप आसन पर बिठा लिया, उसको सफ़ेद चादर से ढंक दिया।
जिसके दोनों तरफ 4 – 5 युवक उसे उठने से रोकने के लिए बैठ गए। सफ़ेद चादर को इसलिए डाला जाता है, ताकि उस व्यक्ति की विषहरण प्रक्रिया निर्बाध चलती रहे, और सभी उस व्यक्ति के वीभत्स चेहरे को ना देख सकें।
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अब बायगीरों ने अपने जस और मन्त्रों के द्वारा कार्य को प्रारम्भ किया, चार चीजों का ये बायगीर विशेष इस्तेमाल करते हैं, पहला .जस…गाने,लोक गीत सर्पों से सम्बंधित दूसरा .मन्त्र, तीसरा ….वाचा (वचन), आन……..सर्प वचन,आन का बहुत पक्का होता है,
इसलिए जस गाने के दौरान उस पीड़ित व्यक्ति के कान में ऐसी ऐसी बातें कहीं जाती हैं, जिससे उस सर्प को खेलना पड़े और फिर उन्हीं वाचों का उपयोग ,उसकी जान बचाने हेतु किया जाता है, चौथा ….. पीतल की थाली….इसको एक चौड़े घड़े के मुंह के ऊपर उल्टा करके रख दिया जाता है, फिर एक छोटे बैंडनुमा डंडे से प्रशक्षित भगत या उनके शिष्यों द्वारा थाली को, एक हाथ से घुमाते हुए और दुसरे हाथ से डंडे को विशेष धुन पर बजाया जाता है, एक व्यक्ति ढोलक से इसकी ताल मिलाता है।
सच कहता हूँ मित्रों, इस धुन का कोई सानी नहीं, आपके DJ वगेरह सब फेल,
यदि ऐसा नहीं होता, तो सर्प बीन और इन जैसी धुनों पर नाचते नहीं।
खैर, धीरे धीरे समय अपनी गति से बढ़ता जा रहा था, जस गाने के दौरान बायगीर ऐसे ऐसे वचन,आन उस पीड़ित के कान में कहते,
सर्प भी एक बार को विवश हो जाता खेलने के लिए, फूलन सिंह के ऊपर सिर्फ चादर पड़ी थी, इसलिए वो ऐसे झूमता, जैसे किसी बार में बैठा हो, वहां खड़े सभी लोग जैसे मंत्रमुग्ध, सम्मोहित हो चुके थे उस संगीत के आगे, धीरे धीरे ६-७ घंटे बाद उन बायगीरों की मेहनत रंग लायी, और सर्प महाराज गद्दी पर आ गए।
सभी बायगीर भगतों ने सर्प महाराज को प्रणाम किया, तो उन्होंने भी प्रणाम किया। तब भगत लोगों ने बात आगे बढ़ाई और उनका परिचय पूछा, उन्होंने अपना सही सही परिचय दिया, तो बायगीरों ने फूलनसिंह को काटने का कारण पूछा, तो सर्प महाराज ने कहा, ‘यह चोर है, अपने आप को गुंडा समझता है,बदमाशी, लूट खसोट करता है। बताओ यह बात सही है या नहीं ?
इतना सुनते ही सभी लोग असमंजस में पड़ गए।उनकी तो सांप छछूंदर जैसी हालत हो गयी। अगर वे इन बातों के लिए हाँ करते हैं, तो सुबह उनकी शामत आ जाएगी।और ना करते हैं तो, सर्प महाराज बिगड़ जायेंगे।
बायगीर इतना सोच ही रहे थे कि, सर्प महाराज ने कड़ककर दुबारा पूछा, बताओ उत्तर क्यों नहीं देते हो। उन सब में सबसे समझदार कालिया भगत था, वो बात को भांप गया और तुरंत मोर्चा संभाल लिया।
वो बोला, “ठीक है महाराज मान ली आपकी बात, लेकिन ये बात आपको साबित करनी पड़ेगी। इतना सुनते ही फूलन सिंह की चोर मंडली की हवाइयां उड़ने लगी। लेकिन वो सुनने के सिवाय कर ही क्या सकते थे।
अब सर्प महाराज बोले, “ठीक है मैं साबित कर दूंगा।
इसके घर के पीछे, एक कमरा है, जिसमें लकड़ी और कूड़ा कबाड़ा भरा पड़ा है। उसमें मेरे मित्र के दो बैल बंधे हैं। उनको यह रात में चुराकर लाया है। मैंने अपने मित्र के वास्ते, इसके साथ आकर इसके घर में ही काटा है।
कहो, मैंने मित्रता का फ़र्ज़ निभाया है अथवा नहीं” इतने सुनते ही सभी लोग भौचक्के रह गए।
बायगीर तो बेचारे दुबारा से बगलें झाँकने लगे, उन्होंने सोचा, “यदि हाँ कहते हैं, तो इसका अर्थ हुआ आपने सही काटा है। और ना कहते हैं, महाराज जी पूछेंगे तो मित्रता का फ़र्ज़ गलत कैसे, जो नितांत अनुचित है।
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बाद में कालिया भगत ने कहा, “महाराज जी, जिसके बैल हैं, वो एक आदमी है, वह आपका मित्र कैसे हो सकता है” ?
सर्प ने कहा, “पहले मेरे मित्र को बुलाओ, फिर बताऊंगा”
तभी ……………
बायगीरों ने कुछ जानकर ग्रामीणों को बुलाया, और उनमें से दो-तीन आदमियों को सर्प के बताये स्थान पर लगभग तीन-चार कोस दूर दूसरे गाँव में भेज दिया।
शाम हो चली थी पक्षी अपने अपने घर लौटने की तैयारी में लगे थे। अब सूर्य महाराज की ड्यूटी ख़त्म होने को आई थी। वे सारा कामकाज चन्द्र महाराज को समझा रहे थे।
उधर, वहां वो किशोरी भगत अपनी चिंता में डूबा हुआ अपने कार्य में मशगूल था। दो-तीन आदमी ३-४ घंटे का सफ़र करने के बाद किशोरी भगत के घर पहुँच गए, जब उन्होंने सारी बात सिलसिलेवार बताना शुरू किया। तो किशोरी भगत की आँखें फटी की फटी रह गयी। वह आश्चर्यचकित था, एक सर्प मेरा मित्र कैसे हो सकता है ?
उसके मन में कुछ पल में अजीब – अजीब से ख्याल आने लगे, कि कहीं मुझसे कोई भूल तो नहीं हो गयी। लेकिन भूल हुई होती तो वह सर्प मुझसे बदला लेता, मेरा मित्र हरगिज़ नहीं बनता।
उन आदमियों ने टोका तो, वह अपने ख्याल से बाहर आया। अब वह मना कैसे कर सकता था चलने के लिए। सो, उसने उसी समय कपड़े पहने, और निकल पड़ा अपने उस अजनबी मित्र से मिलने। अँधेरा हो चुका था। वो पगडंडियों से होता हुआ चलने लगा उन लोगों के साथ। रास्ता दुर्गम, कंटीली झाड़ियों, नालियों और खड्डों से युक्त था। चलते – चलते , इसी रास्ते पर वह कई बार गिर पड़ा था। बेचारे के कपड़े भी जगह जगह से फट गए ।लेकिन वह इतनी तत्परता से चला जा रहा था, मानो उसके लिए हरिद्वार की यात्री बस खड़ी हो, जो अगर छूट गयी तो उसका तीर्थ अधूरा रह जाएगा।
वह उन आदमियों के साथ चलते-चलते रात लगभग ९ बजे उस स्थान पर पहुंचा, जहाँ पहले से मनुष्यों का हुजूम वहां उसका इंतज़ार कर रहा था। वो उन सभी लोगों को देखकर चौंक गया, जो इस अद्भुत तमाशे का साक्षात्कार करने को डटे हुए थे। अब तो सभी उस किशोरी भगत को ऐसे देख रहे थे, जैसे कोई दूर ग्रह से आया हुआ आदमी हो। उस इकट्ठे हुजूम की बेचैनी इस हद तक बढ़ चुकी थी, कि कोई अपने स्थान को उठने को तैयार नहीं था।
अब चाहे प्यास ही लगे या ‘वो’ सभी अपने अपने स्थान से चिपक गए थे। एक गैस का हंडा जला कर रख दिया गया था बीच में, जो अकेला ही सभी से निर्द्वन्द होकर परिचय पूछ रहा था।
किशोरी भगत को बायगीरों ने आगे कर दिया। जिस फूलन सिंह के ऊपर सर्प महाराज खेल रहे थे,किशोरी भगत उनके सामने पहुंचा। तो महाराज जी ने उसे देखकर प्रणाम किया,और कहा , “मित्र, मुझे मालूम है कि तुम कल रात से बहुत अधिक परेशान हो क्योंकि तुम्हारे बैलों की चोरी हो गयी है।
इतना सुनते ही किशोरी भगत के पैरों टेल जमीन खिसक गई। उसने सोचा , “ आखिर, ये बात इनको कैसे पता चली”।
लेकिन तब तक सर्प महाराज ने दुबारा कहा,“ परेशान ना हो मित्र, पहले तुम पीछे के कमरे में जाकर अपने बैलों को देख लो फिर हम तुम बातचीत करेंगे।
अब किशोरी एक दो लोगों के साथ चल दिया पीछे के कमरे में। जाकर देखा तो वह हक्का – बक्का रह गया।
“ ये तो मेरे ही बैल है, ये कैसी मित्रता है” उसने सोचा।
जब किशोरी लौट के आया तो उसने महाराज जी से कहा “आपने, मुझे इन बैलों को दिलाने के लिए इतनी जहमत क्यों उठाई”।
महाराज जी आपने मुझे मित्र कहा और मित्रता की मिसाल भी कायम कर दी। लेकिन मुझे अभी तक अपने मित्र के विषय में कुछ भी पता नहीं चल सका है।
उसकी आँखों में से आंसुओं की छोटी – छोटी ओसनुमा बूंदे गिरने लगी। उसने आगे कहा, “मैंने अपने जीवन में ऐसा एहसान किसी के साथ नहीं किया, जिसका मुझे इतना बड़ा मान मिले। मैं गरीब, फ़क़ीर,किसी का क्या मित्र बनूँगा”।
महाराज, गरीब का कोई साथी नहीं, कोई मित्र नहीं, मेरा तो गरीबी ही साथी है,
मैंने इसी को अपना मित्र बना लिया है।
कृपया मुझ नासमझ को अपनी कहानी ,एवं मुझसे मित्रता के विषय में बताएं।
इतना सुनने के बाद सभी लोगों की आँखे नाम हो गयी।
तभी सर्प महाराज ने कहा, “चिंता ना करो मित्र, मैं तुम्हें सब बताऊंगा, थोड़ा धैर्य रखों वर्ना मैं भी तुम्हारी तरह अश्रु बहाने लगा तो बताऊंगा कैसे।
अब सर्प महाराज ने अपनी जिंदगी की दास्ताँ इस तरह से बयान की कि वहां उपस्थित सारा जनसमूह आश्चर्य चकित रह गया। उन्होंने एकाग्रता से शून्य की तरफ निहारा मानो अतीत का दर्शन किया हो और बोले……..
मैं और मेरा भाई प्रताप दोनों सर्प के रूप में कई सालों से एक वीरान जगह पर धीरे – धीरे अपना समय काट रहे थे। ये जगह मनुष्यों की नज़रों से सुरक्षित तो थी लेकिन सुकून नहीं था, जो गंगा नदी से काफी दूर भी पड़ता था।
काफी समय बाद हम भाईयों ने सोचा कि इस जन्म से छुटकारा पाने के लिए गंगा किनारे कहीं निवास करेंगे जिससे गंगा स्नान भी करते रहें और अपने ऐसे जीवन का प्रायश्चित भी करते रहें।
मित्रों, सर्प योनि अपने आप में अभिशापित है जिसमें ताउम्र पेट के बल रगड़कर चलना होता है। इस योनि के बैरी भी बहुत हैं। कुछ हैं जो सुरक्षित अपना जीवन काट लेते हैं, १००० वर्षों तक , वे फलस्वरूप इच्छाधारी बन जाते हैं यही उनकी साधना है।
लेकिन सोचिये इतने वर्षों तक पेट के बल चलना ……..खैर, हम दोनों भाई ऐसी धारणा बनाकर गंगा स्नान के लिए उस स्थान को छोड़कर चल दिए। मानव समाज, सर्प भक्षी जानवरों एवं पक्षियों से बचते बचाते हुए फर्रुखाबाद जिले ( उत्तर प्रदेश का एक जिला) के गाँव के नज़दीक पहुँच गए।
शाम का समय था। सभी मजदूर खेतों में से काम करके लौटने की तैयारी में लगे थे। तभी भैया ने कहा , “अब थोड़ा आराम कर लेते हैं, उसके बाद आगे रात में पुनः प्रस्थान करेंगे”।
हम दोनों ने एक सुरक्षित जगह ढूढनी शुरू की। काफी मशक्कत के बाद एक जगह मिल गयी। वहीँ नज़दीक में खेत के किनारे, ऊँची मेड के नीचे, एक छेद था।
उसमें एक में, मैं और दूसरे में मेरा भाई घुस गए और रात के प्रस्थान के बारे में सोचने लगे। अन्दर जाकर वे छेद एक ही जगह मिलते थे। लेकिन हमारा दुर्भाग्य था, वहीँ थोड़ी दूर पर खड़े खेत मालिक ने हमें छेद में घुसते हुए देख लिया था। वह जोर जोर से चिल्लाने लगा।
दौड़ के आओ, अरे ! यहां तो सांप है। देखते – देखते कई आदमी अपने अपने हाथों में लाठियां लिए हुए वहां आ गए।
अब हम दोनों बुरी तरह घबरा गए। हमारे पास बचने का कोई रास्ता न था।
हम दोनों आपस में सोच रहे थे कि हे भगवान् ! गंगा स्नान के स्थान पर हमें मौत मिल रही है, क्या नियति है। इतने में मेरा भाई बोला, “ देख भाई! यदि हम दोनों छेदों में, घुसे रहे तो दोनों मारे जायेंगे। मैंने कहा, “ प्रताप ऐसा करते हैं कि, मैं एक छेद से निकलकर भागूँगा तो भीड़ मेरे पीछे भागेगी। जब ये सब मेरे पीछे दूर निकल जाएँ तो तू सुरक्षित निकल जाएगा।
यदि मैं मारा गया, तो वादा कर मेरे बदले का गंगा स्नान भी कर लेगा और इस जन्म से छुटकारा भी दिला देगा लेकिन तब तक उसने कहा, “देख भाई,
यह काम तो मैं करूँगा” और इतना कहते ही, वह एक छेद से निकल भागा।
अब मेरे पास कोई रास्ता ना बचा था मैं दूसरे छेद से दूसरी तरफ भागा। लोग मेरे भाई के पीछे पागलों की तरह भाग रहे थे और जोर – जोर से चिल्ला रहे थे, “बच के ना जाने पाए”।
ना जाने किस जन्म का बदला हमें चुकाना पड़ रहा था। आखिर ऐसा कौन सा गुनाह किया था हमने यही कि हम गंगा करने आये थे।
उन लोगों ने थोड़ी दूर जाकर मेरे भाई को घेर लिया और ताबड़तोड़ लाठियां भांज दी।
आज मेरा जिगरी दोस्त, भाई सदा के लिए इस दुनिया से चला गया। मैं काफी क्रोध में खड़ा – खड़ा देख रहा था।मैं उन मनुष्यों को भी देख रहा था। बहुत खुश थे वे सब के सब।
सोच रहा था, इन्होने क्या शाबाशी का काम किया है। एक निहत्थे, बेक़सूर पर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है। मैं अभागा बच गया थ। मेरे भाई ने मेरी खातिर कुर्बानी दी थी।
मैंने उपरवाले वाले को बहुत बुरा भला कहा। वो सब लोग मेरे भाई के शरीर को, उस डंडे से लटकाकर गाँव की तरफ ले जा रहे थे। शाबाशी का काम, अब दिखाना भी तो था, गाँव वालों को।
हे ईश्वर ! क्या यही सिला मिलता है इस योनि का, इस शरीर का , वाह ! क्या न्याय है तेरा। मैं बुरी तरह अन्दर ही अन्दर रो रह था। आंसू देखने वाला कौन था मेरे। खैर,तब तक रात का धुंधलका छा चुका था। मुझे अपने भाई की हत्या का दुःख अन्दर ही अन्दर साले जा रहा था।
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मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कार रही थी मेरा गम दूर करने वाला कोई न था। मानव समाज को मैं सबसे बड़े बैरी के रूप में देखने लगा। जो सिर्फ अपना बुद्धि और बल दिखाने के लिए निर्दोषों का कत्ल करने से भी नहीं चूकता। अब मेरे अन्दर बदले की भावना ने जन्म ले लिया। और ठान लिया कि इस खेत मालिक से अपने भाई की मौत का बदला ले के रहूँगा।
तब से मैंने कई बार उससे बदला लेने की कोशिश की लेकिन हर बार असफलता ही हाथ लगी।
लेकिन कुछ समय बाद वह एक हादसे में मारा गया। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। लेकिन अब मैं बिल्कुल असहाय, दुखी हो चुका था बावरा पागल सा इधर उधर घूमता जिंदगी का कोई ध्येय न रहा था।
मैंने गंगा स्नान कर ही लिया था और अपने भाई को उसके नाम से गंगा स्नान करवा दिया था। तो बस कभी इधर ,कभी उधर उपरवाले से हर समय दुआ करता था, कि मुझे भी योनि से मुक्त कर दें।
लेकिन उसके कान पे तो जूं तक नहीं रेंग रही थी। लगता था, उसने मेरे लिए सुनने के सभी दरवाजे बंद कर दिए गए हो।
मैं सोच रहा था कहीं बाहर चला जाऊं। वहीँ अपना जीवन यापन करूँ और शायद गम दूर करने के लिए कोई मित्र मिल ही जाए।
इतना कहते कहते सर्प महाराज रुक गए, वहां मौजूद सभी लोगों का हुजूम रो रहा था। वो चोर मंडली भी मनुष्यों की ओट लेके आंसू बहा रही थी,
मैं भी रो दिया। उस पल को बयां नहीं कर सकता मैं। कितनी दुखद दास्तान थी उस सर्प की।
लेकिन कुछ बायगीरों ने हिम्मत करके पूछा, “महाराज लेकिन आपकी किशोरी से मित्रता कैसे हुई” ?
अब सर्प महाराज ने थोड़ी गहरी सांस ली, और बोलना शुरू किया…………..
एक दिन मैं घूमते घूमते यहीं तुम्हारे खेतों के पास आ गया। वहां तुम्हारी झोंपड़ी खेत के एक पुराने टीले के पास है। उस टीले में ही एक छेद था, मैं वहां रात बिताने के लिए रुका।
मित्र, तुम उस रात काफी देर से आये। मैंने सोचा—सुबह शीघ्र ही मैं यहां से निकल जाऊँगा। रात काफी गहरा चुकी थी। तुम अपने लेटने की तैयारी करने लगे। जब तुम लेटे तो ,तुम ईश्वर भजन गाने लगे। काफी देर तक तुम गाते रहे। शायद ये तुम्हारी आदत में शुमार था। मैं अपने छेद से निकलकर तुमसे कुछ दूरी पर आकर बैठ गया। तुम्हारें ईश्वर भजन को सुनने लगा, मन को एक अजीब सी शान्ति मिली।मैं भाव विभोर हो चुका था, कुछ पल के लिए सारे गम को भूल गया। मुझे उस रात बहुत अच्छा लगा। तुम गाते गाते सो गए, मैं भी अपने छेद में चला गया। सुबह मैं तुमसे शीघ्र उठकर घूमने चला गया। लेकिन मेरा मन कहीं ना लगा। रात को तुम्हारें स्थान पर फिर वापस आ गया,तुम रात को आये, और लेटते ही ईश्वर भजन शुरू कर दिया।कभी कभी बीच में तुम कोई अच्छी कथा का बखान भी करते। मैं फिर से मन्त्र मुग्ध हो गया। यह मेरे भाई का गम करने, भगवान् के प्रति आस्था जगाने, और मन की असीम शान्ति के लिए काफी था।
अब, मैं नहर के आये हुए पानी ( जो गंगा या और नदियों द्वारा खेतों में छोड़ा जाता है)को गंगा का पानी समझ कर नित्य सुबह उसी में स्नान करता और शाम को तुम्हारें भजन सुनकर अपने गम को कम करता।
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धीरे धीरे मैं अपने भाई का गम भूलता गया और अपने मन में तुम्हें अपने भाई एवं मित्र के रूप में बसाता गया। तभी से मैं तुम्हें अपना मित्र बना चुका था।
कल रात को जब फूलन सिंह, इसी स्थान से अपने साथियों के साथ तुम्हारें बैल चुराने आया । तब तक तुम अपने घर से आये नहीं थे।
मैंने सोचा—- जब किशोरी को अपना भाई और मित्र माना है तो उसका फ़र्ज़ भी अदा करना चाहिए। फिर सोचा अगर इसे यहां काट लिया, तो इसकी कोई सहायता भी नहीं बन पाएगी और यह बिना कुछ बताये मर भी सकता है।
समाज के लोग इसके साथ चोर जैसा व्यवहार भी कर सकते हैं इसको पीटकर मार भी डाल सकते हैं जो उचित नहीं है। दूसरी तरफ मैंने अपने मित्र को धोखा दिया तो वह गरीबी में और भी विषम परिस्थितियों में फंस जाएगा। ऐसा सब कुछ सोचने के बाद मैं इसके पीछे पीछे चल दिया।
इसने बैलों को कमरे में लाकर बाँध दिया। जैसी ही फूलन सिंह देहरी लांघी, मैंने पैर में काट लिया। मैंने इसको यहां इसलिए काटा ताकि,
इसकी करतूतों का खुलासा इसके गाँव में ही होना चाहिए, अब बताओं मित्र, तुम्हें मेरी मित्रता कबूल है,
किशोरी की साँसे बार बार अपनी गति बदल रहीं थीं, उसकी आँखों से आंसू झर झर बहने लगे।
कैसी मित्रता निभाई है इस सर्प ने , उसने सोचा। इतना तो इंसान एक दूसरे के लिए नहीं करता। वो लोभ,लालच और दम्भ का शिकार हो जाता है और मित्रता में विश्वासघात कर देता है। लेकिन इस सर्प ने बिना किसी छल के मुझसे मित्रता निभाई है,
अब किशोरी ने कुछ संभलकर कहा, महाराज जी, मैं तो आपकी मित्रता के काबिल नहीं था। क्योंकि आप हमारे यहां आये, रहे और आपने किसी भी तरह एहसास तक नहीं होने दिया। मैं आपकी किसी भी रूप में सेवा नहीं कर सका। मुझे इस बात का अफ़सोस है। आपका ये एहसान तो जिंदगी भर नहीं चुका पाऊंगा।
महाराज जी, लेकिन आपने मित्र कहा है तो, मैं आपसे मित्रता के सारे फ़र्ज़ निभाऊंगा। जीवन पर्यंत आपकी सेवा करता रहूँगा।
आपसे मित्र होने के नाते यही वादा चाहता हूँ। अब जब तक आप रहें, मेरी उसी कुटिया पर निवास रखें। मुझे रोजाना दर्शन दें।
सर्प महाराज जी ने कहा, किशोरी मेरे मित्र..मैं वादा करता हूँ ,आजीवन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।
और दोनों उठकर(फूलन सिंह के रूप में सर्प तथा किशोरी) प्रेम से एक दूसरे के गले मिले। इस दृश्य को देखकर वहां खड़े सभी स्त्री पुरूषों की आँखों में प्रेम के आंसू भर आये। सभी आश्चर्यचकित थे कि ये कैसा देव विधान है। जो एक सर्प और मनुष्य में परम मित्रता देखने को मिली है।
तभी भीड़ में से आवाज आई। महाराज जी, फूलन सिंह को तो माफ़ कर दो,
सर्प महाराज ने कहा.. इसका फैसला मेरा मित्र करेगा, क्योंकि उसी के बैलों की चोरी हुई है।
अब किशोरी ने ऊँची आवाज में कहा, यदि फूलन सिंह अपनी पिछली जिंदगी छोड़ दे तो हम माफ़ करवा सकते हैं।
इस बात पर सभी साथियों और परिवार के सदस्यों ने हां में गरदनें हिला दी।
किशोरी ने कहा, भैया जाओ माफ़ किया,
सर्प महाराज जी को सिर्फ गंगा जी नहलवा देना और कुछ साधुओं को भोजन करवा देना।
सर्प महाराज ने कहा, जैसा मेरे मित्र ने कहा है।वैसा ही होगा। उन्होंने अब किशोरी से कहा,मित्र, तुम हमें रोज़ाना अपनी कुटिया पर भजन सुनाओगे।
किशोरी बोला, महाराज, इसकी कहने की आवश्यकता ही नहीं थी, क्योंकि अब तो ये मेरा फ़र्ज़ बन गया है।
इसके बाद सर्प महाराज जी ने कड़ककर कहा, फूलन सिंह ने जहाँ से इन बैलों को चुराया था। वहीँ भरे समाज के सामने उसी स्थान पर बाँध कर आये। और माफ़ी मांगे, भगत से विशेष रूप से क्षमा याचना करे।
इसके बाद सर्प महाराज जी ने सबको प्रणाम करके अपने मित्र से चलने की मंशा जाहिर कर दी और इसी के साथ वो उसके शरीर से हट गए।
तमाशा अब ख़त्म हो चुका था लेकिन तमाशे के मदारी को ठीक होने में थोड़ा समय लगता। इसलिए एक दिन बाद जब फूलन सिंह ठीक हुआ, तो बीती हर बात उसके घरवालों और पड़ोसियों ने उसको बता दी।
उसे अपनी गलती पर पछतावा था। उसने सभी गाँव वासियों से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी। और कहा अगर सर्प और इंसान दोनों सच्चे मित्र हो सकते हैं। तो मैं भी अपनी पिछली जिंदगी छोड़ता हूँ।
उसने उन बैलों को किशोरी के गाँव में उसके घर बाँध दिया। भरे समाज के सामने सबसे माफ़ी मांगी। कुछ दिन बाद सर्प के नाम से गंगा स्नान भी करवा दिया।
उसके बाद फूलन सिंह समाज में सभ्य एवं समाज सेवी, इंसान बनकर रहने लगा…………..समाप्त……..



