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परमात्मा हमें शेर की तरह समर्थवान बनाना चाहते हैं, लोमड़ी की तरह आश्रित नहीं-प्रेरक कथा

परमात्मा हमें शेर की तरह समर्थवान बनाना चाहते हैं, लोमड़ी की तरह आश्रित नहीं-प्रेरक कथा

Shivshakti
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक बौद्ध भिक्षु भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियां चुन रहा था. तभी उसने पेड़ के नीचे बैठी एक ऐसी लोमड़ी देखी जिसके पैर नहीं थे.

भिक्षुक को बड़ा आश्चर्य हुआ. बिना पैरों की लोमड़ी जो चल फिर नहीं सकती वह शिकार क्या करेगी. फिर ये जिंदा कैसे है और तंदुरुस्त भी.

वह बैठकर प्रभु की माया के बारे में सोचने लगा. वह इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि अचानक सारे जानवर इधर-उधर भागते दिखे. एक शेर उस तरफ आ रहा था.

भिक्षु एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया. शेर अपने अपने जबड़े में एक हिरन दबाए लोमड़ी की तरफ बढ़ा आ रहा था. भिक्षु पेड़ पर बैठा सब देख रहा था. वह अपाहिज लोमड़ी की रक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करने लगा.

शेर ने लोमड़ी पर हमला नहीं किया बल्कि उसे अपने शिकार में से मांस के कुछ टुकड़े खाने के लिए डाल दिए. लोमड़ी ने शेर को धन्यवाद किया. यह देख भिक्षु का आंखें फंटी रह गईं.जानवरों को मारकर खा जाने वाला शेर लोमड़ी को मारने की बजाए उसे भोजन दे रहा है. हे प्रभु यह आपकी कैसी माया है. उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था.

मन में विचार आया शायद आज के दिन शेर दान करता होगा इसलिए उसने लोमड़ी को भोजन दिया. वह अगले दिन फिर वहीँ आया, छिप कर शेर का इंतज़ार करने लगा.

फिर वैसा ही हुआ. शेर ने अपने शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के सामने डाल दिया. भिक्षु ने कहीं सुना था भगवान जिसे पैदा करता है उसके भोजन का इंतजाम भी करता है. आज उसे इसका प्रमाण नजर आ रहा था.

भिक्षुक ने स्वयं से कहा- मैं तो भगवान की सेवा में लगा हूं. भगवान यदि लोमड़ी जैसे पापी जीव के लिए भोजन का प्रबंध कर देते हैं तो मेरे जैसे भक्त को भला वह भूखा रखेंगे. आज से इस लोमड़ी की तरह मैं भी ऊपर वाले की दया पर आश्रित रहूंगा.भिक्षु ने लकड़ियां चुनकर भोजन बनाने का इरादा छोड़ा. एक वीरान स्थान पर डेरा जमाया और यह सोचकर बैठ गया कि ईश्वर मेरे लिए भी भोजन की व्यवस्था करेंगे.

पहला दिन बीता. कोई वहां नहीं आया. दूसरे दिन भी कुछ लोग उधर से गुजरे पर भिक्षु की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया. कई दिन बीत गए. बिना कुछ खाए-पीये वह कमजोर होता जा रहा था.

धीरे-धीरे उसकी रही सही ताकत भी खत्म हो गयी. चलने-फिरने लायक भी नहीं रहा. मरे हुए इंसान की तरह शक्तिहीन होकर पड़ा था. तभी एक महात्मा उधर से गुजरे. उन्होंने भिक्षु की दुर्दशा देखी तो उसके पास चले गए.

भिक्षु ने सारी कहानी महात्माजी को सुनाई और बोला- भगवान इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं, क्या ईश्वर का नाम लेने वाले व्यक्ति को इस हालत में पहुंचा देना पाप नहीं है?महात्माजी ने कहा- तुम इतने मूर्ख कैसे हो सकते हो? तुमने यह क्यों नहीं समझा कि भगवान तुम्हें उस शेर की तरह बनते देखना चाहते थे जो लाचारों के भोजन का प्रबंध करें. लोमड़ी की तरह नहीं जो दूसरों की दया पर आश्रित हो.

ईश्वर ने हर व्यक्ति के अंदर कोई न कोई ऐसा गुण दिया है जिससे वह संसार के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकता है. उन गुणों को पहचानकर उसका सही प्रयोग करने की जरूरत है. अन्यथा ईश्वर हमें शेर की तरह समर्थवान बनाना चाहेगा लेकिन हम बन जाएंगे लोमड़ी की तरह आश्रित.

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