नवरात्रि में कन्या पूजन कैसे करें? पढ़ें विधि, मंत्र, भेंट आदि सबकुछ
नवरात्रि में कन्या पूजन कैसे करें? किस कन्या में देखें मां के 9 स्वरूप? जानिए सही विधि, मंत्र, महत्त्व और कन्याओं को क्या खिलाएं
नवरात्रि में कन्या पूजन के बिना नौ दिनों की कठिन साधना और व्रत अधूरे माने जाते हैं। कई स्थानों पर इसे कंचक पूजन भी कहा जाता है। सनातन धर्म में कुंवारी कन्याओं को साक्षात मां दुर्गा का स्वरूप माना गया है। अक्सर भक्तों के मन में यह सवाल होता है कि नवरात्रि में कन्या पूजन क्यों होता है, इसकी सही कन्या पूजन विधि क्या है और कन्याओं को भोजन में क्या अर्पण करना चाहिए?

आज के इस विशेष लेख में हम शिव महापुराण के संदर्भ से कन्या पूजन का पौराणिक महत्त्व, प्रामाणिक कन्या पूजन का मंत्र, और मासिक धर्म (पीरियड्स) से जुड़ी दुविधाओं का सरल समाधान जानेंगे।
इस लेख में आप जानेंगे:
- शिव पुराण के अनुसार नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्त्व
- प्रामाणिक और सरल कन्या पूजन विधि
- नवरात्रि में कन्या पूजन का दिव्य मंत्र
- नवरात्रि में कन्या पूजन में क्या खिलाना चाहिए?
- आयु के अनुसार कन्याओं के नौ स्वरूप और उनका फल
- पीरियड्स (मासिक धर्म) के दौरान नवरात्रि में कन्या पूजन कैसे करें?
शिव पुराण के अनुसार नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्त्व
शिवमहापुराण के पार्वती खंड में एक बहुत ही सुंदर और ज्ञानप्रद प्रसंग आता है। जब माता पार्वती केवल आठ वर्ष की थीं, तब उनके पिता पर्वतराज हिमवान उन्हें साथ लेकर भगवान शिव की सेवा में उपस्थित हुए। देवर्षि नारद ने हिमवान को पहले ही बता दिया था कि साक्षात जगदंबा ने उनके घर पुत्री रूप में अवतार लिया है और उनका विवाह महादेव से ही होना तय है।
जब हिमवान प्रतिदिन बालिका गौरी को लेकर शिवजी की सेवा में आने लगे, तो एक दिन महादेव ने कौतुक (विनोद) किया। उन्होंने हिमवान से कहा, “पर्वतराज! आप तो रोज मेरे दर्शन के लिए आ सकते हैं, लेकिन इस छोटी बालिका का यहाँ आना ठीक नहीं है।” भगवान शिव देखना चाहते थे कि साक्षात प्रकृति स्वरूप मां भवानी इस पर क्या उत्तर देती हैं।
तब आठ वर्ष की बालिका गौरी ने अत्यंत मधुर परंतु अकाट्य तर्कों के साथ महादेव को प्रकृति और पुरुष के अंतर्संबंध का बोध कराया। माता के मुख से सृष्टि के इस गूढ़ रहस्य और स्त्री-पुरुष के निर्माण के पीछे विधाता की सोच को सुनकर शिवजी प्रसन्नता से झूम उठे। उन्होंने सहर्ष बालिका गौरी को अपने पिता के साथ आकर सेवा करने की अनुमति दे दी।
चूंकि कुंवारी कन्याएं माता गौरी के उसी बाल स्वरूप के समान अत्यंत पवित्र और पूजनीय होती हैं, इसीलिए नवरात्रि के पावन दिनों में कन्या पूजन की यह महान परंपरा सदियों से चली आ रही है। शास्त्रों का मत है कि हवन, जप और दान से माता दुर्गा जितनी प्रसन्न नहीं होतीं, उससे कहीं अधिक प्रसन्नता उन्हें आदरपूर्वक किए गए कन्या पूजन से मिलती है। इससे साधक के जीवन के सभी भय और संकट दूर हो जाते हैं।
नवरात्रि में कन्या पूजन की विधिः प्रामाणिक व सरल
शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि में कन्या पूजन के लिए कन्याओं की आयु कम से कम दो वर्ष और अधिकतम दस वर्ष होनी चाहिए। एक वर्ष या उससे छोटी कन्याओं को पूजन में शामिल नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे न तो प्रसाद ग्रहण कर पाती हैं और न ही उन्हें पूजा के नियमों का बोध होता है।

आप नवरात्रि की किसी भी तिथि को एक-एक कन्या का या फिर अष्टमी और नवमी तिथि को नौ कन्याओं का पूजन कर सकते हैं। ध्यान रहे कि कन्याओं की संख्या हमेशा विषम (3, 5, 7 या 9) होनी चाहिए। इनके साथ एक छोटे बालक को भी आमंत्रित करना अनिवार्य है, जिसे ‘बटुक’ या ‘भैरव’ का रूप माना जाता है; क्योंकि मां दुर्गा की पूजा बिना उनके रक्षक भैरव के पूर्ण नहीं होती।
नवरात्रि में कन्या पूजन के मुख्य चरण:
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चरण प्रक्षालन: कन्याओं और बटुक के घर पधारने पर सबसे पहले साफ जल से उनके पैर धोएं और उन्हें ऊंचे व स्वच्छ आसन पर बैठाएं।
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तिलक और आरती: सभी कन्याओं के माथे पर कुमकुम, रोली और अक्षत का पवित्र तिलक लगाएं। इसके बाद कपूर या घी के दीपक से मां के स्वरूपों की आरती उतारें।
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भोजन अर्पण: आरती के बाद कन्याओं को पूरी श्रद्धा के साथ सात्विक भोजन परोसें।
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क्षमा याचना और विदा: भोजन के उपरांत आदरपूर्वक उनके हाथ-पैर धुलवाएं। पूजा या सत्कार में हुई किसी भी अनजानी भूल के लिए हाथ जोड़कर क्षमा मांगें। इसके बाद उनके चरण स्पर्श कर सामर्थ्य अनुसार उपहार, फल या दक्षिणा देकर उन्हें विदा करें।
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नवरात्रि में कन्या पूजन का मंत्र
कन्याओं का तिलक करते समय या उनकी आरती उतारते समय मन ही मन या सस्वर इस कल्याणकारी मंत्र का उच्चारण अवश्य करना चाहिए:
ॐ मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्।
नवदुर्गा आत्मिकां साक्षात् कन्याम् आवाह्यम्।।
नवरात्रि में कन्या पूजन में क्या खिलाना चाहिए?
कन्याओं को हमेशा पूर्ण सात्विक और शुद्ध भोजन ही कराना चाहिए। लहसुन और प्याज का प्रयोग भूलकर भी न करें। कन्या पूजन के भोजन में मुख्य रूप से ये चीजें शामिल होनी चाहिए:
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हलवा, पूरी और काले चने: यह मां दुर्गा का पारंपरिक और अत्यंत प्रिय प्रसाद है।
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खीर अथवा मालपुआ: माता को दूध से बनी मिठाइयां या खीर का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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सात्विक सब्जी: यदि सब्जी बना रहे हैं, तो आलू या टमाटर की सात्विक सब्जी बिना लहसुन-प्याज के तैयार करें।
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आयु के अनुसार कन्याओं के नौ स्वरूप और उनका फल

शास्त्रों में दो से दस वर्ष तक की कन्याओं के अलग-अलग नाम और उनके पूजन से मिलने वाले फलों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसे हम इस तालिका के माध्यम से आसानी से समझ सकते हैं:
| कन्या की आयु | देवी का स्वरूप | पूजन का विशेष धार्मिक लाभ/फल |
| 2 वर्ष | कुमारी | जीवन के समस्त दुःख और दरिद्रता का समूल नाश होता है। |
| 3 वर्ष | त्रिमूर्ति | घर में धन-धान्य, अटूट सुख और समृद्धि का आगमन होता है। |
| 4 वर्ष | कल्याणी | परिवार के सभी रुके हुए मांगलिक कार्य निर्विघ्न पूरे होते हैं। |
| 5 वर्ष | रोहिणी | साधक और उसका पूरा परिवार असाध्य रोगों से मुक्त रहता है। |
| 6 वर्ष | कालिका | ज्ञान, विद्या, शत्रुओं पर विजय और राजयोग की प्राप्ति होती है। |
| 7 वर्ष | चंडिका | जीवन में अपार ऐश्वर्य, यश और मान-सम्मान मिलता है। |
| 8 वर्ष | शाम्भवी | बुद्धि तीव्र होती है, वाक-पटुता आती है और कोर्ट-कचहरी में विजय मिलती है। |
| 9 वर्ष | दुर्गा | साक्षात जगदंबा की कृपा से कठिन और असाध्य कार्य भी सिद्ध होते हैं। |
| 10 वर्ष | सुभद्रा | भक्तों के जीवन के सारे मनोरथ और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। |
पीरियड्स (मासिक धर्म) में कन्या पूजन कैसे करें?
अक्सर महिलाओं और माताओं के मन में यह बहुत बड़ा संशय रहता है कि यदि नवरात्रि के अंतिम दिनों में उन्हें पीरियड्स आ जाएं, तो कन्या पूजन कैसे करें? सनातन धर्म के नियम आंतरिक और बाह्य शुद्धि पर बल देते हैं, परंतु भक्ति भाव को सर्वोपरि मानते हैं। मां भगवती केवल सच्चे भाव की भूखी हैं। यदि आपको मासिक धर्म आ गया है, तो आप इन नियमों का पालन कर अपना पूजन संपन्न कर सकती हैं:
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घर के अन्य सदस्यों का सहयोग लें: पीरियड्स के दौरान आप स्वयं कन्याओं या पूजा सामग्री को सीधे स्पर्श न करें। आप दूर बैठकर भोजन तैयार करने में निर्देश दे सकती हैं, परंतु कन्याओं के पैर धुलाने, तिलक लगाने, भोजन परोसने और दक्षिणा देने का मुख्य कार्य अपने पति, बच्चों, सास या घर के किसी अन्य शुद्ध सदस्य से करवाएं।
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मानसिक रूप से लें आशीर्वाद: कन्याओं के बैठने के स्थान से उचित दूरी पर बैठकर उन्हें साक्षात नवदुर्गा का स्वरूप मानते हुए मन ही मन प्रणाम करें।
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मानसिक जप करें: इस अवस्था में आप शांत बैठकर मन ही मन कन्या पूजन का मंत्र या “ॐ दुं दुर्गायै नमः” का मानसिक जप कर सकती हैं। अपने मन में किसी भी प्रकार का दोष या हीनभावना बिल्कुल न लाएं, क्योंकि मां अपने बच्चों की हर परिस्थिति को समझती हैं।
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संकलनः राजन प्रकाश
(नोटः यह पोस्ट धर्म शास्त्र के जानकारों से परामर्श के बाद तैयार की गई है। फिर भी कुछ त्रुटियाँ हो सकती हैं। इसे केवल संदर्भ के लिए प्रयोग करें। विशिष्ट जानकारी के लिए इस विषय के किसी मर्मज्ञ से परामर्श लें। इस पोस्ट में प्रयुक्त सभी छवियां सांकेतिक हैं।)
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