मोटी बुद्धि के बोपदेव ने किया भागवत महात्म्य का दान, हरि कृपा से प्राप्त हुआ शुकदेव सरीखा सम्मान

लेटेस्ट कथाओं के लिए प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प डाउनलोड करें।
आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
[sc:mbo]
बोपदेव की बुद्धि मोटी थी. वह गुरु के समीप बैठकर अध्ययन करते पर उन्हें कुछ समझ में नहीं आता. बोपदेव ने हार मान ली कि वह शायद ही अध्ययन कर पाएंगे. सो इस झंझट से दूर हो जाना ही ठीक है. वह घर से निकल पड़े.
प्रभु ने तो उनके लिए कुछ और ही निर्धारित किया था. घूमते घूमते बोपदेव एक सरोवर के तट पर पहुंचे. सरोवर पर पत्थर के घाट बने थे. बोपदेव बैठे ही थे कि इतने में एक स्त्री घड़ा लेकर आई और उसे घाट पर रख नहाने लगी.
थोड़ी देर में वह नहा-धोकर और घड़े में पानी लेकर चली गई. बोपदेव ने देखा कि जहाँ उस स्त्री ने घड़ा रखा था, वहां पत्थर पर एक गङ्ढा सा बन गया है. यह गड्ढा पुराना प्रतीत होता है.
बोपदेव ने मन ही मन सोचा कि जब पत्थर जैसी कठोर वस्तु मिट्टी के घड़े की रगड़ से घिस जाती है, तब लगातार परिश्रम करने में मेरी मोटी बुध्दि भी क्या घिसकर तेज न हो पाएगी?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
बोपदेव को लगा उनकी समस्या का समाधान मिल गया. सीधे गुरूजी के पास पहुंचे और तन मन से पढाई में लग गए. बोपदेव ने कई ग्रन्थ लिखे और उनकी पण्डिताई का डंका बजने लगा.
अब बोपदेव वेद-वेदांग में परांगत कृष्णभक्त के रूप में प्रसिद्ध होने लगे. वह वृदांवन-तीर्थ पहुंचे और वृंदावन के कण-कण में श्रीकृष्ण को देखने लगे. इस भाव से प्रभु प्रसन्न हो गए.
श्रीकृष्ण ने उनके ह्रदय में भागवत कथा का उदय कराया. यह वही कथा थी जो श्रीशुकदेवजी ने राजा परीक्षित को सुनाई थी लेकिन बोपदेव को इसका विस्तृत ज्ञान नहीं था. बोपदेव उस कथा को हरि-लीलामृत नाम से फिर से सुनाने लगे.
भक्त की भक्ति से मुग्ध भगवान श्रीकृष्ण इस बार साक्षात प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. बोपदेव ने कहा- प्रभु भागवत ज्ञान तो आपने मुझे प्रदान किया, यदि वर देना चाहते हैं तो उस भागवत का माहात्म्य मुझसे कहें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
श्री भगवान बोले- बोपदेव! संसार में यह रहस्य शुकदेव के अतिरिक्त किसी और को ज्ञात नहीं. शुकदेव ने भी वह कथा दैवयोग से महादेवजी के मुख से सुन ली थी किंतु में तुम पर प्रसन्न हूं. इसलिए इसे सुनाउंगा.
श्रीहरि सुनाने लगे- दम्भ और पाखण्ड से भरे बौद्धों का प्रभुत्व प्रगति पर था. ऐसी परिस्थिति में भगवान शंकर माता पार्वती के साथ काशी में उत्तम भूमि देखकर वहां स्थित हो गए
उसी समय भगवान् शंकर ने किसी को आनंदपूर्वक प्रणाम करते हुए कहा- हे सच्चिदानन्द ! हे जगत को आनंद देने वाले ! आपकी जय हो. यह सुनकर माता पार्वती को अचरज हुआ.
कौतूहल दूर करने के लिए उन्होंने भगवान् शंकर से पूछा –आपके समान दूसरा अन्य देवता कौन है जिसे आपने इस प्रकार सम्मानपूर्वक प्रणाम किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
भगवान शिव बोले– महादेवि! यह काशी का परम पवित्र क्षेत्र है. यह स्थान स्वयं ही सनातन ब्रह्म स्वरूप है. इसलिए यह भूमि प्रणाम के योग्य है. इसलिए मैंने ऐसा कहा. मैं यहां सप्ताह-यज्ञ (भागवत-सप्ताह-यज्ञ) करूंगा.
भगवान् शंकर ने उस यज्ञ-स्थल की रक्षा के लिए चंडीश, गणेश, नंदी इत्यादि को तैनात किया और स्वयं ध्यान में स्थित होकर माता पार्वती से सात दिन तक भागवती कथा कहते रहे. माता को नींद आ गई.
आठवें दिन पार्वती को सोते देखकर भगवान शंकर ने पूछा कि कितनी कथा सुनी? पार्वतीजी ने उत्तर दिया, मैंने अमृत-मंथन तक का विष्णु चरित्र सुना है. वहीं वृक्ष के कोटर में एक तोता यह सब सुन रहा था.
भागवत कथा के प्रभाव से वह शुक महर्षियों द्वारा पूजनीय शुकदेव हुए. वह इस अमृत-कथा के सुनने के कारण अमर हो गए. बोपदेव! तुमने भी इस दुर्लभ भागवत-माहात्म्य को प्राप्त किया है .हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
अब यह कथा नर्मदा के तट पर राजा विक्रम के पिता गन्धर्वसेन को सुनाओ. हरिकथा माहात्म्य का दान सभी दानों में उत्तम है. भूखे को अन्नदान से भी श्रेष्ठ. परंतु इसका दान किसी विष्णुभक्त बुद्धिमान को ही करना.
भागवत के प्रभाव से बोपदेव ज्ञानी और अज्ञानी का भेद करने में समर्थ हो गए. श्रीहरि के आशीर्वाद से बोपदेव ने हरि-माहात्म्य का दान किया और प्रख्यात ज्ञानी हुए. हरिकथा वांचने में योगदान के कारण उनकी गिनती शुकदेव सरीखी होती है.
(भविष्य पुराण प्रतिसर्गपर्व के द्वितीय खंड की कथा)
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली