भागवत कथाः ग्वालबाल का रूप धरके आया कंस का दूत प्रलंबासुर, बलराम के हाथों हुआ उद्धार
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ग्रीष्म ऋतु थी. ग्वाल बाल गायें चराते थक गए तो मन हुआ कि कुछ मनोरंजन किया जाए. श्रीकृष्ण ने अपने अग्रज बलराम और अन्य बालसखाओं के सामने खेलने का प्रस्ताव रखा.
सभी सहर्ष तैयार हुए तो खेल की तैयारी होने लगी. कंस का भेजा हुआ प्रलंबासुर जो लगातार श्रीकृष्ण और बलरामजी पर नजर रखे हुए था, वह भी वहां पहुंचा.
प्रलंबासुर ने ग्वालबाल का रूप धरा और उसी टोली में शामिल हो गया. श्रीकृष्ण ने उसे ताड़ लिया. प्रलंबासुर अत्यंत बलशाली मायावी असुर था. उसका शरीर विशाल था किंतु एक छोटे-से बाल सखा के रूप में वहां आया हुआ था.
वह श्रीकृष्ण और बलराम का वध करना चाहता था. श्रीकृष्ण ने सोचा किसी युक्ति से इसका वध करना चाहिए. उन्होंने प्रस्ताव रखा कि आज मित्रमंडली दो टोली में बंटेगी और हम नया खेल खेलेंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.नियम बना कि जो टोली हारेगी वह विजेता टोली के एक सदस्य को पीठ पर बिठाकर उसके पसंद के स्थान तक लेकर जाएगी. एक दल के नेता बने श्रीकृष्ण और दूसरे दल के नेता बने बलरामजी.
टोली बंटी तो प्रलंबासुर श्रीकृष्ण की मंडली में आ गया. श्रीकृष्ण ने उस पर निगाहें बना रखी थीं कहीं वह किसी ग्वालबाल का अहित न करें किंतु उन्होंने यह प्रकट भी न होने दिया. उसके साथ मित्रवत ढंग से रहे.
एक बार बलरामजी की टोली जीत गई और श्रीकृष्ण की टोली बार गई. हारी हुई टोली के लोग घोड़ा बने और विजेता टीम ने सवारी की. श्रीकृष्ण ने अपनी पीठ पर सुदामा को बिठाया, मद्रसेन ने वृषम और बलराम ने प्रलंबासुर को.
वास्तव में, प्रलंबासुर श्रीकृष्ण की शक्ति को देख समझ गया था. उसे आभास हो गया था कि श्रीकृष्ण का वह अहित नहीं कर पाएगा इसलिए क्यों न बलराम का ही वध करके श्रीकृष्ण को पहले पीड़ित किया जाए. बाद में कृष्णवध की योजना बनेगी.
उसने बलराम को अपनी सवारी का आमंत्रण दिया. श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई को संकेत से समझा दिया. प्रलंबासुर घोड़ा बना और बलराम उसकी पीठ पर बैठ गए. उसके दिमाग में बलराम के अपहरण की योजना चल रही थी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रलंबासुर ने बलराम को अपनी पीठ पर सवार किया भांडीर वन से होते हुए गुजरने लगा. प्रलंबासुर अत्यंत बलवान था किंतु वह नहीं जानता था कि संपूर्ण लोकों को अपने फनों पर धारण करने वाले शेषनाग के अवतार उसकी पीठ पर हैं.
बलराम के शारीर के भार के कारण प्रलंबासुर का शरीर तुरंत ही बुरी तरह से थककर चूर हो गया. उसे चला नहीं जा रहा था और बलराम उसे घोड़े की तरह हांक रहे थे.
वह अपने वास्तविक असुर रूप में आ गया और बलराम को लेकर हवा में उड़ा. बलराम सकपकाए. उन्होंने असुर के सिर पर जोरदार मुक्का मारा तो उसका मस्तक चूर हो गया. वह जमीन पर गिरा और उसके प्राण निकल गए.
ग्वालबालों ने जब देखा कि बलरामजी ने ऐसे भयंकर राक्षस का संहार कर दिया है तो वह खुशी से नाचने लगे. उन्हें फूलमालाएं पहनाईं और नाचते-गाते घर की ओर चले.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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