मोक्ष का अधिकारी कौन, कर्मनिष्ठ या ज्ञानवान-देवगुरु वृहस्पति ने दिया निदानः ज्ञानवर्धक पौराणिक कथा

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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्रह्माजी के कुल में एक बड़े ही धर्मात्मा और दानी राजा का जन्म हुआ. उनका नाम वसु था. वसु जहां से भी सम्भव हो ज्ञान इकट्ठा करते रहते थे इसलिये अपने ज्ञान और जानकारी के लिए भी बहुत प्रसिद्ध थे.
एक दिन वसु को इच्छा हुई कि चलें ब्रह्माजी से मिल आया जाये. वे ब्रह्मलोक की और चल पड़े. कुछ समय चलने के बाद उन्हें रास्ते में चित्ररथ नामक विद्याधर मिला.
वसु ने चित्ररथ से पूछा कि ब्रह्मा जी से मिलने का उचित समय क्या होगा? चित्रधर बोला- अभी तो ब्रह्माजी के भवन में देवों की सभा चल रही है. ब्रह्माजी उसमें व्यस्त हैं, बाकी आप जो उचित समझें.
वसु ब्रह्मलोक तक पहुंच चुके थे. चित्ररथ की बात सुन उन्होंने ब्रह्म भवन के बाहर ही प्रतीक्षा करना उचित समझा. इतने में रैभ्य मुनि आ गये. उन्हें देख वसु प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें ज्ञानचर्चा के एक साथी मिल गए.
रैभ्य ने बताया कि वह वृह्स्पति के पास आये हैं. इतने में ब्रह्माजी की सभा समाप्त हो गयी. वसु को वहीं वृहस्पति मिल गए. बातचीत करते सब वृहस्पति के ही घर आ गये.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रैभ्य मुनि ने वृहस्पति से कहा कि इस बात की शंका हमारे मन में हमेशा रही है कि मोक्ष किसे मिलेगा वह जो ज्ञानवान है या उसे जो कर्मशील है. हमारा संदेह दूर कर दीजिए.
वृहस्पति बोले इस संदर्भ में ब्राह्मण और शिकारी की एक कथा सुनाता हूं. अत्रि के कुल में पैदा संयमन तथा अधम कर्म करने वाले बहेलिये निष्ठुरक की कथा तुम्हारे संदेह को दूर करने में सहायता करेगी.
तीनों पहर नहाकर पूजा पाठ करने वाले संयमन गंगा में जहां नहाने गये वहां एक शिकारी दिखा. संयमन बोले-यह जीवहत्या का काम ठीक नहीं इसे छोड़ दो. यह सुनकर निष्ठुरक नामक वह शिकारी मुस्कराने लगा.
संयमन के आगे बोलने से पहले वह बोला. सभी प्राणियों में आत्मा के रूप में भगवान बसते हैं. सच्चे पुरुषों को चाहिए कि वह इस अहंकार को त्याग दे कि मैं कर्ता हूं, कोई काम मैं कर रहा हूं, यह सोचना बेकार है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.सही बात तो यह है कि यह सब उसी प्रभु की लीला है. ऐसे में तो क्या शिकार और क्या तो शिकारी. शिकारी से इस तरह ज्ञान की बात सुनकर संयमन ने कहा कि तुम कौन हो जो इतने तर्क सहित अपनी बात रख रहे हो.
शिकारी कोई ज़वाब नहीं देते हुए एक लोहे का जाल लेकर आया. जाल को सूखी लकड़ियों के ऊपर डाल दिया. फिर संयमन के हाथ एक लुकाठी देकर कहा- विप्रवर इन लकड़ियों में आग लगा दें.
संयमन के आग लगाने की देर थी कि देखते ही देखते सूखी लकड़ियां धधककर जलने लगीं. जाल के विभिन्न छेदों से अग्नि की ज्वाला लहराने लगी.
शिकारी ने आग की ओर इशारा करते हुये कहा- विप्रवर आप इन छेदों में से निकलती आग की कोई एक ज्वाला या अग्निपुंज उठा लें क्योंकि अब मैं आग बुझाउंगा.
कुछ क्षण बाद शिकारी ने पानी से भरकर एक घड़ा आग पर फेंका तो पल भर में ही धधकती आग शांत हो गयी. सारा दृश्य पहले जैसा हो गया.
शिकारी बोला- जो आग आपने चुनी थी वह मुझे दे दें. उसी के सहारे मैं अपना जीवनयापन करुंगा. संयमन ने आग पर निगाह डाली पर वहां अब आग कहां! आग की सभी ज्वालायें कब की शांत हो चुकी थीं. संयमन आंख मूंद कर शांत बैठ गये.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शिकारी ने कहा- यही हाल संसार का है. सबके मूल में भगवान की ही जोत जल रही है. यदि व्यक्ति अपने स्वाभाविक धर्म का अनुसरण करते हुए हृदय को परमात्मा से जोड़कर कोई भी शुभ-अशुभ कार्य करता है फिर उस कार्य को प्रभु को समर्पित कर देता है तो उसे न तो कोई दुःख होता है न ही वह कर्म संबंधी पाप पुण्य के चक्कर में पड़ता है.
इतना कहना भर था कि आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी. रत्नों से सजे धजे कई विमान आसपास उतर आए. शिकारी निष्ठुरक अद्वैत ब्रह्म का उपासक था सो उसने योग विद्या से कई शरीर बना लिए तथा अनेक विमानों में बैठ स्वर्ग चला गया.
वृहस्पति बोले- तो हे राजन वसु और मुनिवर रैभ्य, इससे यह सिद्ध होता है कि अपने वर्ण और आश्रम के अनुरूप कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करने के बाद मुक्ति का अधिकारी हो जाता है.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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