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शिव-पार्वती कथाः शिवगण ने की गोपनीयता भंग, पार्वतीजी के शाप से बन गया मानव- भाग 1

शिव-पार्वती कथाः शिवगण ने की गोपनीयता भंग, पार्वतीजी के शाप से बन गया मानव- भाग 1


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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भोलेनाथ के पास ऋषियों और विरक्तों का जमघट लगता जहां वह प्रवचन करते. पार्वतीजी पर्वतराज की पुत्री थीं. हालांकि उन्होंने जैसे घोर तप किया वैसा तप बड़े-बड़े हठयोगी नहीं कर सकते थे.

फिर भी स्त्री तपस्विनी हों तो भी कुछ तो स्त्रियोचित व्यवहार उन्हें भी पसंद आता है. साज-शृंगार घूमना फिरना. पार्वतीजी की जब भी कोई इच्छा होती भोलेनाथ उन्हें कोई ऐसी सुंदर कथा सुना देते जिससे वह उस कथा में खो जातीं.

भोलेनाथ तो एक कुशल गृहस्थ की तरह बुद्धि का प्रयोगकर अपना दांपत्य जीवन भी बढ़िया निबाह रहे थे. एक बार पार्वतीजी ने हठ किया कि नाथ मुझे ऐसी कथाएं सुनाएं जो आपने पहले किसी और को न सुनाई हों.

शिवजी मान गए तो से देवी बोलीं– जो भी कथा सुनाएं वह वह लंबी हो. काफी समय तक चले लेकिन समय का पता भी न चले. शिवजी पार्वतीजो को लेकर एक निर्जन गुफा में पहुंचे.

कोई और कथा न सुन ले इसके लिए उन्होंने द्वार पर नंदी को पहरे पर बिठा दिया और पार्वती को अकेले में लंबी कथा सुनानी शुरू की. पार्वतीजी कथा में लीन हो गईं. उन्हें आनंद आने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शिवजी भी सुनाते रहे. काफी समय बीत गया. इसी बीच पुष्पदंत नामक एक शिवभक्त उनके दर्शनों को आया. पुष्पदंत पार्वतीजी की सखी और प्रिय सहचरी जया का पति था.

पुष्पदंत जब भी शिवजी के दर्शन को आता नंदी उसे आने से रोक देते. वह कई बार आया, हर बार नंदी का वही उत्तर मिलता कि शिवजी माता पार्वती को कथा सुना रहे हैं. बाद में आना. पुष्पदंत को बड़ा कौतूहल हुआ.

आखिर ऐसा कौन सा गूढ़ ज्ञान शिवजी दे रहे हैं. यह देखने के लिए उसने रूप बदला और पक्षी का रूप धरकर चुपके से नंदी की नजर बचाकर गुफा में प्रवेश कर गया और एक स्थान पर बैठकर कथा सुनने लगा.

पुष्पदंत आया तो था कुछ पल के लिए कथा में ऐसा खो गया कि उसने चुपके से सारी कथा सुन ली. काफी समय बाद कथा सुनने-सुनने का प्रकरण समाप्त हुआ तो शिव-पार्वती गुफा से निकल आए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस बात को काफी समय हो गए. एक बार पार्वतीजी ने जया और विजया से कहा- मैं तुम लोगों को आज ऐसी कथा सुनाती हूँ, जो आज तक मेरे अतिरिक्त किसी ने नहीं सुनी है.

पार्वती ने ज्योंहि कथा सुनानी शुरू की जया ने बीच में टोक कर आगे की कथा सुना दी और कहा- देवी, यह कथा तो मेरी पहले की सुनी हुई है. फिर उसने पार्वतीजी को आगे की पूरी कथा बताने लगी.

पार्वतीजी को बड़ा अपमान महसूस हुआ कि वह अनुचरों के सामने झूठी साबित हुईं. उन्होंने जया से पूछा कि तुमने यह कथा कब और किसके मुख से सुनी है. जया ने बता दिया कि मैंने अपने पति पुष्पदंत से सुनी है.

पार्वतीजी क्रोध में तमतमाकी भगवान शिव के पास पहुंची और पूछा- आपने जो कथा मुझे सुनाई वही कथाएं आपने अपने गणों को भी सुनाई है, जबकि हमारे बीच शर्त थी कि आप किसी और नहीं सुनाएंगे. आपने वचन भंग किया है.

शिवजी बोले मैंने किसी अन्य को नहीं सुनाई है कथा. पार्वतीजी ने सारा हाल कह दिया तो शिवजी ने ध्यान लगाकर पता किया. पुष्पदंत नंदी की नजर बचाकर अदृश्य होकर गुफा में जा छिपा यह बात उन्हें पता चल गई और उन्होंने पार्वतीजी से कही.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पार्वतीजी के क्रोध की तो अब सीमा ही न रही. अनुचर गोपनीयता को भंग करने लगे. वह पुष्पदंत को शाप देने के लिए तत्पर हुईं. इसे देखकर उसका मित्र माल्यवान बोल पड़ा- माता मूर्ख ने कौतूहलवश यह घृष्टता कर डाली है. यह इसका पहला अपराध है आप क्षमा करें.

पार्वतीजी का गुस्सा कम होने के बजाय और बढ़ गया. वह बोली- तू भी अपराधी का पक्ष ले रहा है. मैं तुम दोनों को शाप देती हूं कि मनुष्य योनि में चले जाओ और पृथ्वी पर जा गिरो.

पति को शाप मिलने की बात सुनकर जया दौड़ी हुई आई. पुष्पदंत और जया दोनों पार्वतीजी से दया की भीख मांगने लगी. पार्वतीजी का क्रोध शांत हुआ तो द्रवित हुई. उन्होंने कहा शाप समाप्त तो नहीं हो सकता, मुक्ति का उपाय बताती हूं.

पार्वती ने शापमुक्ति का उपाय बताते हुए कहा- एक यक्ष सुप्रतीक शापग्रस्त होकर कानभूति नाम से विन्ध्य के वन में पिशाच बन कर रहता है. पुष्पदंत, जब तुम उसे यही कथा सुना दोगे तो तुम्हारी शापमुक्ति हो जाएगी.

तुम्हारा यह साथी माल्यवान उस कानभूति से यह कथा सुनकर इसका प्रचार करेगा तब इसकी भी शापमुक्ति हो जाएगी. पुष्पदंत और माल्यवान धरती पर मनुष्य बन जा गिरे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पुष्पदंत पाटलिपुत्र के राजा नन्द के मंत्री वररूचि कात्यायन के नाम से व्याकरण का पंडित बन गया है. वररुचि ने जो कानभूति को वही कथा सुनाई जो उसने छुपकर सुनी थी. इससे उसकी शापमुक्ति हुई.

पुष्पदंत ने छुपकर कई कथाएं सुनी थीं. कथा आपको कल सुनाएंगे.
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