कुंभ कथाः माता की मुक्ति के लिए गरूड़ अमृत याचना के लिए निकले गरुड़ ने खाया हाथी और कछुआ. भाग-3
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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पिछली कथा में आपने पढा कि गरुड़ ने अपनी मां को सर्पों की माता के दासीत्व से मुक्ति दिलाने की ठान ली. सर्पों ने अमृत के बदले उनकी माता को मुक्त करने की शर्त रखी. गरुड़ अपनी माता से अमृत लाने के लिए जाने की अनुमति लेने पहुंचे.
गरूड़ ने माता से पूछा कि भूख लगने पर मार्ग में उन्हें क्या खाना चाहिए? विनता ने बताया- समुद्र में निषादों की एक बस्ती है. उन्हें खाकर तुम अमृत ले आओ लेकिन याद रखना, ब्राह्मण का वध कभी न करना.
गरुड़ माता से अनुमति लेकर उड़े. उन्हें समुद्र का वह द्वीप दिखा. वहां पर उन्हें निषाद मिले. माता की आज्ञा के अनुसार द्वीप के निषादों को खाकर वे आगे बढे. किंतु भूल से निषादों के साथ-साथ एक तपस्वी भी उनके मुंह में आ गया.
तपस्वी ब्राह्मण के तेज से उनका तालू जलने लगा. गरूड़ को अपने प्राण संकट में दिखने लगे. कोई राह नहीं सूझी तो घबराकर वह अपने पिता कश्यप ऋषि के पास पहुंचे और अपनी पीड़ा बताई.
कश्यप ने उस जलन से उन्हें मुक्ति दिलायी और कुशलक्षेण पूछा. कश्यप ने पूछा कि क्या उसे आवश्यकता असार भोजन नहीं मिल पा रहा जो वह अखाद्य वस्तुएं खाने को विवश हुए.
गरुड़ ने बताया कि वह माता को दासीत्व से मुक्ति दिलाने के लिए सर्पों के कहने पर अमृत लाने के लिए चले थे. माता ने ही निषादों का भोजन करने को कहा था परंतु उससे मेरा पेट नहीं भरा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अतः आप कोई ऐसा भोजन सुझाइए जिसे खाकर मैं अमृत ला सकूं. कश्यपजी ने कहा- बेटा यहां से थोड़ी दूर पर एक सरोवर है. उसमें एक हाथी और एक कछुआ रहते हैं. वे दोनों पूर्वजन्म के भाई परंतु एक दूसरे के शत्रु हैं. तुम उन्हें खा लो.
कश्यपजी ने बताया कि पूर्व काल में वे दोनों भाई थे. दोनों ने एक दूसरे को शाप दिया था. शापित होकर वे इस रूप में है. तुम उन्हें खाकर शाप से मुक्ति दिला सकते हो.
गरूड़ ने कहा- पिताश्री आपकी आज्ञा मेरे लिए शिरोधार्य है. यदि मेरे खाने से वे शापमुक्त होते हैं तो मैं शीघ्र ही यह कार्य करूंगा किंतु मेरे मन में उनकी कथा सुनने की उत्सुकता हो गई है. गरूड़ की विनती पर कश्यप ऋषि ने कथा सुनानी शुरू की.
ऋषि विभावसु बड़े क्रोधी स्वभाव के थे. उनका छोटा भाई सुप्रतीक भी बड़ा तपस्वी था किंतु दूसरों के भड़काने से वह भाई से द्वेष करने लगा. सुप्रतीक घर की धन संपत्ति का नियंत्रण बड़े भाई से लेना चाहता था. इसलिए उसने शीघ्र बंटवारे की रट लगा ली.
विभावसु ने सुप्रतीक को समझाया-लोगों के बहकावे में न आओ. धन मोह में जो बंटवारा चाहते हैं वे एक दूसरे के विरोधी हो जाते हैं. हमारे शत्रु मित्र होने का स्वांग करके भाई-भाई में भेद डालते हैं और वैर-भाव बढा देते हैं. इससे कुल की मर्यादा नष्ट होती है.
पर सुप्रतीक को नीति की बातें नहीं सुहाई और वह बंटवारे के लिए अड़ा रहा. विभावसु को क्रोध आ गया और बोले- तू भेदभाव के कारण ही परिवार अलग करना चाहता है. जा तुझे हाथी की योनि प्राप्त हो जो जल को सरोवर से अलग करने को आतुर रहता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस शाप से सुप्रतीक के तेवर चढ़ गए. उसने क्रोध में आकर बड़े भाई को भी शाप दे दिया- मैं यदि हाथी होऊंगा तो तुम कछुआ होगे. गरुड़, इस तरह दोनों भाई धन के लालच से एक दूसरे को शाप देकर हाथी और कछुआ हो गये हैं.
वे दोनों इस जन्म में भी आपस में लड़ते रहते हैं. उनकी इस लड़ाई से दूसरे जंतु बहुत दुखी हैं. अत: गरुड़ तुम जाकर उन दोनो भयंकर जन्तुओं को खा जाओ और अमृत ले आओ. इस तरह दोनों का बैर मिट जाएगा.
पिता की आज्ञा प्राप्त कर गरुड़ उस सरोवर पर गए. उन्होंने एक नख से हाथी और दूसरे से कछुए को पकड़ा और बहुत ऊंचे उड़कर अलम्ब तीर्थ में जा पहुँचे. सुवर्णगिरि पर्वत के वृक्ष गरुड़ को देखते ही इस भय से कांपने लगे कि कहीं इनके धक्के से हम टूट न जायें.
उनको भयभीत देखकर गरुड़ जी दूसरी ओर निकल गए. उधर एक बड़ा सा बरगद था. बरगद ने गरुड़ जी को हाथी और कछुए को लेकर उड़ते देखा तो कहा कि तुम मेरी सौ योजन लम्बी डाल पर बैठकर हाथी और कछुए को खा सकते हो.
गरुड़ बरगद की शाखा पर बैठे तो वह टूट गयी और गिरने लगी. गरुड़ ने गिरते-गिरते उस शाखा को पकड़ लिया और बड़े आश्चर्य से देखा कि उसमें नीचे की ओर सिर करके वालखिल्य नामक ऋषिगण लटक रहे हैं.
गरुड़ को स्मरण हुआ कि मां ने कहा है उनके कारण किसी भी ब्राह्मण की हत्या न हो. यदि शाखा गिर गयी तो ये तपस्वी ब्रह्मर्षि मर जाएंगे. उन्होंने झपटकर अपनी चोंच से वृक्ष की शाखा पकड़ ली साथ ही, हाथी और कछुए को पंजों में दबोचे आकाश में उड़ने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उनके पंखों की हवा से पहाड़ भी कांप उठते थे. वालखिल्य ऋषियों की रक्षा की चिंता में वह कहीं बैठ न सके, आकाश में ही उड़ते ही रहे. उड़ते-उड़ते गंधमादन पर्वत पर गये.
कश्यपजी ने पुत्र गरूड़ को ऋषियों को लेकर उड़ते देखा तो उन्हें चिंता हुई कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो सूर्य की किरण पीकर तपस्या करने वाले वालखिल्य ऋषि क्रुद्ध होकर कहीं गरुड़ को भस्म न कर दें.
कश्यप जी ने ने वालखिल्य ऋषियों से प्रार्थना की और कहा- हे ऋषिगण, गरुड़ माता के हित के लिए एक महान कार्य करना चाहता है. आप लोग इसे आज्ञा,आशीर्वाद दीजिये.
कश्यप जी का आदर करते हुए वालखिल्य ऋषियों ने अनुरोध स्वीकार करके बरगद की शाखा छोड़ दी और हिमालय पर चले गए. गरुड़ ने वह शाखा फेंक दी और पर्वत की चोटी पर बैठकर हाथी तथा कछुए को खाया.
गरूड़ अमृत प्राप्ति के अभियान पर निकल गए. गरूड़ ने अमृत प्राप्ति कैसे की और क्या सर्पों को सचमुच अमृत पीने को मिल गया? इस कथा को कल पूर्ण करेंगे.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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