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कुंभ कथाः गरुड़ का जन्म और माता को दासता मुक्त कराने के लिए अमृत कलश की तलाश-2

कुंभ कथाः गरुड़ का जन्म और माता को दासता मुक्त कराने के लिए अमृत कलश की तलाश-2


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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अभी नासिक में पवित्र कुंभ का आयोजन हुआ है. कुंभ से जुड़ी कथा सुनाने का जो हमने आपको वचन दिया था उसी शृंखला में हमने गरूड़ की कथा सुनानी शुरू की है. आशा है सावन में शिव कथाओं का आनंद Mahadev Shiv Shambhu एप्प में ले रहे होंगे.

पिछली कथा में आपने पढ़ा कि दक्ष प्रजापति के दो बेटियां कद्रू और विनता जो ऋषि कश्यप को ब्याही थीं, उनमें से कद्रू के गर्भ से निकले अंडे से में से हजार शक्तिशाली नागों का जन्म हुआ.

विनता के गर्भ से दो अंडे निकले. उसने अपनी अधीरता के कारण अंडे को समयपूर्व फोड़ दिया. उससे अरूण पैदा हुए जिनका मात्र आधा शरीर ही पुष्ट था. कुपित अरूण ने माता को 500 वर्ष के दासत्व का शाप दिया और सूर्य की सेवा में सारथी बन गए.

कद्रू ने धूर्तता से अपने नाग पुत्रों की सहायता से विनता को शर्त में हराकर अपनी दासी बनने पर विवश कर दिया. विनता को दासीत्व और श्राप से कोई मुक्ति दिला सकता था तो 500 वर्षों बाद पैदा होने वाला पुत्र.

विनता पुत्र के वियोग और दासत्व दोनों के कारण दुखी रहती थीं. विनता को बाद में कद्रू के पुत्रों ने ही उस छल के बारे में बता दिया जिससे कद्रू ने उसे दासी बनाया था. उसे अपने दूसरे पुत्र की प्रतीक्षा थी जो दासता से मुक्त करा सकता था.

समय पूरा होने पर विनता के अंडे से एक महातेजस्वी पक्षी निकला. उसके तेज से दिशाएं प्रकाशित हो उठीं. उसकी शक्ति,गति,चमक और बुद्धि विलक्षण थी.

उसके नेत्र बिजली के समान चमकीले थे और शरीर अग्नि के समान तेजस्वी. जन्मते ही वह शिशु आकाश में बहुत उडा.

देवताओं ने समझा अग्निदेव ने नया रूप धरा है. सब को भयभीत देखकर अग्नि ने कहा कि यह मैं नहीं परम तेजस्वी गरुड़ हैं. ये नागों के नाशक, देवताओं के हितैषी और असुरों के शत्रु हैं.

एक दिन विनता अपने पुत्र के पास बैठी हुई थी. कद्रू ने उसे बुलाकर आदेश देते हुये कहा- मुझे समुद्र के अन्दर नागों का दर्शनीय स्थान देखना है. तू मुझे ले चल.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.लाचार विनता ने कद्रू को और गरुड़जी ने माता की आज्ञा से सभी सर्पों को अपने कंधे पर बैठा लिया और कद्रू के बताए स्थान की ओर चल पड़े. गरुड़ हजार नागों को पीठ पर बिठाए बहुत ऊँचाई पर उड़ रहे थे.

सूर्य की भीषण गर्मी से सर्प बेहोश हो गये. कद्रू ने इन्द्र की विनती की तो बादल छा गए, वर्षा हुई, सभी सर्प चेतना में लौटे. सर्पों का दर्शनीय स्थल वास्तव में मनोहारी था. लवणसागर, वन आदि में सर्पं ने खूब विहार किया, आनंद उठाया.

चलने को हुए तो सर्प गरुड़ से बोले- तुमने तो आकाश में उड़ते समय बहुत से दर्शनीय द्वीप देखे होंगे. अब हमें और किसी द्वीप में पर्यटन हेतु ले कर चलो. गरुड़ चिंता में पड़ गये.

उन्होंने सोचा कि इस प्रकार हजार सर्प हजार प्रकार की इच्छाए, अकेला किसकी किसकी पूर्ति करूंगा. गरूड़ ने अपनी माता से पूछा कि सर्पों की आज्ञा का पालन करना क्या कोई उनकी विवशता है या वह उन को मना भी कर सकते हैं.

विनता ने बताया- बहन ने मुझसे छल लिया और दासी बना लिया. इसके लिए मेरे अपने ही पुत्र का शाप भी कारण है. अब उनके आदेश का पालन करके उनकी सेवा हमारी विवशता है और धर्म भी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अपनी माता के दुर्भाग्य से गरुड़ बड़े दुःखी हुए. उन्होंने सर्पों से कहा कि यदि तुम मेरी माता की दासता की मुक्ति का उपाय बता दो तो मैं तुम्हारे लिए कोई भी कठिन कार्य करने को तैयार हूं.

सर्पों को याद था कि उनकी माता ने ही जनमेजय के सर्प यज्ञ में उन सभी को जलकर भस्म हो जाने का शाप दिया था. उनको यह भी ज्ञात था कि उसको दिए गए शाप को ब्रह्माजी और दूसरे देवताओं ने निरस्त नहीं किया था.

इसलिए आज नहीं तो कल हम सर्पों को भस्म होने से कोई नहीं बचा सकता. एक ही उपाय था यदि अमृत मिल जाए तो अमर हो सकते हैं या फिर भस्म होने के बाद भी जीवित हो सकते हैं.

सर्पों ने विचार-विमर्श के बाद गरुड़ से कहा- हे गरुड़ तुम अत्यंत तेजस्वी और बलवान हो, पर हो हमारे दास. यदि तुम अपने पराक्रम से हमारे लिए अमृत लाकर हमें दे दो तो हम तुम्हें और तुम्हारी माता को दासत्व से मुक्त कर देंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.माता के कष्टों के निवारण का उपाय जानकर गरूड़ प्रसन्न हो गए. उन्होंने नागों को उनके अभीष्ट स्थान का दर्शन कराया और फिर माता से अमृत की खोज में निकलने की अनुमति लेने पहुंचे.

विनता बहुत प्रसन्न हुईं. उन्हें अपने कष्टों के अंत का मार्ग खुलता नजर आ रहा था. गरूड़ जिस वस्तु की खोज में जा रहे थे उसे असुर अपार बलशाली होने पर भी प्राप्त न कर सके. विनता को इसकी आशंका थी लेकिन पुत्र के सामर्थ्य पर विश्वास था.

गरूड़ ने विदा होने से पहले माता से मार्ग के लिए परामर्श मांगे. लंबी यात्रा पर निकलने से पूर्व संतान को मार्ग के लिए आहार पर माता से परामर्श लेना होता है. गरूड़ के पूछने पर विनता ने कहा कि कुछ भी खा लेना पर ब्राह्मण पर प्रहार न करना.

मार्ग में भूख से व्याकुल गरूड़ ने कैसे भूलवश एक ब्राह्मण को निगल लिया. पिता कश्यप ने उन्हें कैसे दिलाई उस पीड़ा से मुक्ति. यह कथा अगली पोस्ट में.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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