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शिव-पार्वती कथाः मृगावती को जमदग्नि के आश्रम से लाने सहस्त्रनीक रवाना, समय बिताने के लिए सेवक ने सुनाई प्रेम कथा. भाग-7

शिव-पार्वती कथाः मृगावती को जमदग्नि के आश्रम से लाने सहस्त्रनीक रवाना, समय बिताने के लिए सेवक ने सुनाई प्रेम कथा. भाग-7


शिव-पार्वती रोचक कथा शृंखला की यह छठी कथा है. हमने पहले भी एक कथा प्रकाशित की थी. पूरी कथा के लिए देखें एप्प- Mahadev Shiv Shambhu.
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हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पिछली कथा से आगे…
यह कथा शृंखला उस वृहत कथा का भाग है जो भगवान शिव ने पार्वतीजी के मनोरंजन के लिए गोपनीय रूप से सुनाई थी परंतु उनके एक गण ने चोरी से सुन लिया था. क्रोधित पार्वतीजी के शाप से वह मनुष्य बना.

शिवजी की वह कथा कई महीने चली थी. पार्वतीजी ने शिवगण को कहा कि यदि वह उस कथा को पृथ्वी पर एक पिशाच को सुनाने के बाद प्रचार करे तो उसकी शाप मुक्ति होगी. मनुष्यरूप से शिवगण उसी कथा को सुना रहे हैं. गतांक से आगे…

राजा सहस्रणीक ने अपनी खोई रानी मृगावती को जमदग्नि के आश्रम से लिवा लाने के लिये उदयाचल की और कूच किया. शाम हो गयी पर उद्याचल अभी थोड़ा दूर था.

राजा ने एक तालाब के किनारे डेरा डाला. राजा के लिए रात भारी लग रही थी. उसने समय बिताने के लिए अपने मुंहलगे नौकर संगतक से कोई मनोरंजक कहानी सुनाने को कहा.

संगतक बोला- महाराज आप दुःखी न हों. वियोग के विरह के बाद मिलन के सुख का मजा ही कुछ और होता है. अब शीघ्र ही रानी आपसे मिलने वाले हैं. रात भर की ही देर है.

महाराज आपके मनोरंजन के लिए मैं मिलन और विछोह के बीच की इस रात पर एक कथा सुनाता हूं. संगतक ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार से है-हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मालव क्षेत्र में यज्ञसोम नामक एक ब्राह्मण रहता था. उसके दो बेटे थे. एक का नाम था कालनेमि और दूसरे का विगतभय. यज्ञसोम ने दोनों बेटों को पाटिलीपुत्र के परम विद्वान देवशर्मा से उत्तम शिक्षा दिलायी.

देवशर्मा की दो लड़कियां थीं, दोनों रूपसी. कालनेमि और विगतभय सुंदर और पढाकू थे. देवशर्मा ने दोनों कन्याओं का विवाह यज्ञसोम के दोनो बेटों से कर दिया. इस बीच यज्ञसोम परलोक सिधार गया.

कालनेमि में धनी बनने की चाहत हद से ज्यादा थी. वह दूसरों का धन देखकर जलता था. कालनेमि ने लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए बड़ा शानदार यज्ञ किया. लक्ष्मीजी प्रसन्न हुईं.

लक्ष्मीजी ने उसे धनी होने का वर देते हुए कहा- जा तू धनी हो जा. तेरा एक बेटा राजा बनेगा. पर तूने यह यज्ञ लालच और ईर्ष्या के चलते किया है इसलिए तेरी मौत चोरी के अपराध में होगी.

कालनेमि शीघ्र ही पुत्रवान हुआ. फिर लक्ष्मी के वरदान से धनवान भी. उसका बेटा श्रीदत्त ब्राह्मण होकर भी युद्ध कौशल सीखने में रुचि रखता था. खूब सीखा और महान योद्धा बन गया.

राजा वल्ल्भशक्ति के बेटा विक्रमशक्ति के साथ-साथ अवंति के रहने वाले वज्रमुष्टि और बाहुशाली से उसकी गहरी दोस्ती हो गई. ऐसे ही अनेक योद्धाओं से भी उसने मित्रता की. एक बार गंगातट पर सब मित्र मंडली जमा हुई.

तय हुआ कि एक खेल खेला जाय. सभी योद्धा हैं तो खेल युद्ध का ही होना चाहिए. दो दल बने. एक दल का अगुआ राजकुमार बना तो दूसरे की अगुवाई श्रीदत्त करने लगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.श्रीदत्त ने राजकुमार और उसके दल को अकेले ही बुरी तरह हरा दिया. मित्र होने के बावजूद वह चिढ गया और उससे झगड़ने लगा. श्रीदत्त बेहतर योद्धा और वीर था पर विक्रमशक्ति राजकुमार था.

अपमान से बेचैन राजकुमार ने श्रीदत्त को मरवा डालने का प्रयास किया लेकिन यह बात श्रीदत्त को पता लग गई. जान का खतरा देख भाग खड़ा हुआ. वह गंगा के किनारे- किनारे भागा जा रहा था तभी देखा एक औरत डूब रही है.

उसने नदी में छलांग लगा दी पर औरत उसके पहुंचने से पहले ही डूब गयी. श्रीदत्त डुबकी लगा कर पानी के भीतर गया. उसने गंगा की तलहटी में एक शिव मंदिर देखा.

न तो वहां पानी था न ही कोई औरत. श्रीदत्त अचरज में था. साथी छूट चुके थे. वापस जाना मुश्किल था. श्रीदत्त बहुत थका था सो वहीं सो गया. सुबह हुई तो देखा कि वही डूबने वाली औरत पूजा करने शिव मंदिर आयी है.

जब वह पूजा कर के लौटी तो श्रीदत्त उसके पीछे पीछे चला. वह औरत एक महल में पहुंची और सीधे अपने पलंग पर गिरकर रोने लगी. श्रीदत्त सब देख रहा था.

सेवक सेविअकाओं की भीड़ उसे समझाने बुझाने में नाकाम हो कर चली गयी तो श्रीदत्त आगे आया. श्रीदत्त ने उसको उसका दुख दूर करने का वचन दिया और दुख की वजह पूछी.

उस औरत ने बताया. मेरा नाम विद्युतप्रभा है. मेरे पिता को विष्णु ने मार डाला और बाबा दैत्यराज बलि को कैद कर लिया है. हम हजार बहनें है जिसमें मैं सबसे बड़ी हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हमारे नगर से हमको निकाल दिया गया और नगरद्वार पर एक सिंह तैनात कर दिया गया है जिसके भय से हम अपने नगर में नहीं जा सकतीं. वह सिंह और कोई नहीं कुबेर का कोई शापित सेवक यक्ष है.

उस सिंह हो मार दें तो हमारा भय खत्म हो. हम अपने नगर को जायें. उसे मारने से आपको यह लाभ होगा कि आपको मृगांक नाम की तलवार मिल जाएगी जिससे आप संसार पर विजय पा सकते हैं.

मुझे पता है कि यह सिंह बना यक्ष मनुष्य के हाथों ही मारा जा सकता है इसलिए आप इसका वध कर सकते हैं. श्रीदत्त हजार बहनों को लेकर नगर द्वार पर चला और युद्ध में सिंह को मार गिराया.

सिंह मरकर तत्काल यक्ष के रूप में बदला और श्रीदत्त को मृगांक नामक तलवार भेंट कर उसकी खासियत बताई और अंतर्धान हो गया. हजार बहनों को लेकर श्रीदत्त नगर में घुसा.

विद्युतप्रभा ने नगर प्रवेश के अवसर पर श्रीदत्त को एक विषनाशक अंगूठी भेंट की. फिर उसने कहा कि युद्ध के बाद उसे इस तलवार के साथ इस तालाब में स्नान कर लेना चाहिए.

श्रीदत्त अपनी मृगांक तलवार और विषनाशिनी अंगूठी पहनकर जैसे ही बावड़ी में घुसा अपने को गंगा के तट पर पाया. उसने अचरज से इधर उधर देखा तो उसका दोस्त निष्ठुरक वहां घूमता मिला.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.दोस्त ने उसे गले लगा लिया और बोला- मित्र तुम कहां चले गये थे. यहां बहुत अनर्थ हो गया. हम सारे मित्र तुम्हारे जाने से इतने दुःखी थे कि आत्महत्या करने जा रहे थे पर तुम्हारे आने की आकाशवाणी हुई तो सब ने यह विचार त्याग दिया.

श्रीदत्त ने अपने माता-पिता का हाल पूछा तो मित्र ने बताया कि वल्लभशक्ति की मृत्यु हो गयी और विक्रमशक्ति गद्दी पर बैठा. उसने तुम्हारे पिता के पास सैनिक भेज पुछवाया कि तुम कहां भागे हो? तुम्हारे पिता कालनेमि ने कहा मुझे नहीं मालूम.

विक्रमशक्ति राज्य के शत्रु को चोरी छिपे भगाने के आरोप में उन्हें फांसी पर लटका दिया. उधर तुम्हारी मां इस सदमे को सह नहीं सकी और गोलोक चलीं गयी. सुना है कि है कि वह अभी भी तुम्हें मारने के लिये ढुंढवा रहा है.

निष्ठुरक ने आगे कहा- सारे मित्र तो उज्जयिनी चले गये. मैं आकाशवाणी के अनुसार यहां गंगातट पर तुम्हारी राह देख रहा हूं. स्थितियां विकट हैं शीघ्र ही कोई निर्णय लो.

मां-पिता के निधन से दुःखी श्रीदत्त ने सोचा, मां पिता तो रहे नहीं, घर क्या जाना. ऐसे में श्रीदत्त ने कहा चलो अब उज्जयिनी चलो. सब मित्र वहीं मिलेंगे.

श्रीदत्त अपने मित्र निष्ठुरक को साथ ले उज्जैयिनी चल पड़ा. रास्ते में एक राह भूली स्त्री मिली तो उसे भी साथ ले लिया. रात हुई तो तीनों ने एक उजाड गांव में डेरा डाला.

आधी रात को कुछ खटपट से श्रीदत्त की नींद खुल गयी. उसने देख तो बगल में निष्ठुरक नहीं था. थोड़ी दूरी पर ओट में सो रही वह स्त्री भी न दिखी. कुछ आहट पाकर जब उसने निगाह उस और फेरी तो उसने गज़ब का दृश्य देखा.

श्रीदत्त ने देखा कि वह स्त्री निष्ठुरक को मारकर खा रही है. श्रीदत्त यह वीभत्स दृश्य और न देख सका तुरंत मृगांक तलवार हाथ में ले औरत की और दौड़ा.
(कथा क्रमशः जारी रहेगी)

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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