महाकालेश्वर महात्म्यः बालक ने पत्थर को शिवलिंग की तरह पूजा तो प्रकट हो गए महाकाल, भगवान श्रीकृष्ण के पूर्वज नंद की कथा

हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
उज्जयिनी के राजा चंद्रसेन महान शिवभक्त थे. शिवजी के प्रमुख गण मणिभद्र चन्द्रसेन के मित्र बन गए. प्रसन्न होकर मणिभद्र ने चन्द्रसेन को चिन्तामणि नामक एक महामणि प्रदान की.
चिंतामणि, कौस्तुभ मणि और सूर्य के समान चमकदार थी. उसको देखने, सुनने से मनुष्यों का मंगल होता था. चंद्रसेन के गले में चिन्तामणि को शोभा पाते देख अन्य राजाओं में ईर्ष्या हुई.
चंद्रसेन से चिढ़े उन राजाओं ने अपनी चतुरंगिणी सेना तैयार की और उस चिन्तामणि छीनने के लिए आ धमके. कई राज्यों की संगठित सेना ने राजा चन्द्रसेन पर आक्रमण कर दिया.
नगर को शत्रुओं से घिरा देख चन्द्रसेन महाकालेश्वर भगवान शिव की शरण में पहुंच गए. वह उपवास-व्रत लेकर भगवान महाकाल की आराधना में जुट गए.
उज्जयिनी में एक विधवा ग्वालिन रहती थी जिसका इकलौता पुत्र था. वह अपने बालक को लेकर महाकालेश्वर का दर्शन करने गई. बालक ने चन्द्रसेन को श्रद्धाभक्ति से महाकाल की पूजा करते देखा.
बालक की माता ने भक्तिभाव पूर्वक महाकाल की आराधना. उसने बेटे को भी जैसे-जैसे कहा उसने उस तरह से पूजा की. लेकिन उसने पूजा की पूरी विधि देखकर अच्छे से समझ ली.
घर लौटकर उसे शिवजी के पूजन का विचार आया. वह एक सुन्दर-सा पत्थर ढूंढ़कर लाया और अपने निवास से कुछ ही दूरी पर किसी अन्य के निवास के पास एकान्त में रख दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
उसने अपने मन में निश्चय करके उस पत्थर को ही शिवलिंग मान लिया. बालक ने शुद्ध मन से भक्ति भावपूर्वक गन्ध, धूप, दीप आदि जुटाकर अपने द्वारा रखे शिवलिंग की पूजा की.
बालक उस पर फूल पत्ती चढ़ाता, श्रद्धा भाव से दंड़वत प्रणाम करता. उसका चित्त भगवान के चरणों में आसक्त था. उसी समय ग्वालिन ने भोजन के लिए उसे बुलाया.
शिव की आराधना में लीन उस बालक को भूख-प्यास ही नहीं थी. माता के बार-बार बुलाने पर भी जब वह नहीं आया तो उसकी माता स्वयं वहां आ गईं.
माँ ने पुत्र को एक पत्थर के सामने आंखें मूंदे बैठे देखा तो उसे खींचकर घर ले जाने लगी पर वह हिला तक नहीं. क्रोधित होकर माता ने उसे ख़ूब पीटा. फिर उस पत्थर को उठाकर फेंक दिया.
उस शिवलिंग पर चढ़ाई गई सारी सामग्री को भी फेंककर घर चली गई. बालक के लिए तो वह शिवजी थे. उनका अनादर देखकर वह जोर-जोर से रोने लगा.
बालक बिलखता हुआ महादेव को पुकारने लगा और अचानक अचेत होकर गिर पड़ा. कुछ देर बाद जब चेतना आयी तो भगवान शिव की कृपा से वहां महाकाल का दिव्य मन्दिर खड़ा हो गया था.
मणियों के चमकीले खम्बे उस मन्दिर की शोभा बढा रहे थे. भूतल पर स्फटिक मणि जड़ दी गयी थी. स्वर्ण-शिखर उस शिवालय को सुशोभित कर रहे थे. मुख्य द्वार, उनके कपाट सोने के थे. सामने नीलमणि तथा रत्नजड़ित चबूतरे बने थे.
उस भव्य शिवालय के गर्भगृह में भोलेनाथ का रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित था. उसने जो भी पूजन-सामग्री चढ़ाई थी, वह शिवलिंग पर सुसज्जित पड़ी हुई थी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
शिवलिंग तथा उस पर उसके ही द्वारा चढ़ाई पूजन-सामग्री को देखते ही बालक उठ खड़ा हुआ. उसकी खुशी का कोई ठिकाना न था. उसने शिवजी की स्तुति कीं. बार-बार अपने मस्तक को उनके चरणों में लगाया.
सूर्यास्त होने पर वह शिवालय से निकल कर बाहर आया और अपने घर को देखने लगा. उसका घर इन्द्र के महल जैसा शोभा पा रहा था.
बेटे से शिव की कृपा का सम्पूर्ण वर्णन सुनकर ग्वालिन ने राजा चन्द्रसेन को सूचित किया. महादेव का पूजन पूर्ण करके चन्द्रसेन रात्रि के समय पहुंचे और ग्वालिन के पुत्र का प्रभाव देख चकित हो गए.
उज्जयिनि को घेरकर युद्ध के लिए खड़े राजाओं ने भी गुप्तचरों के मुख से वह अद्भुत वृतांत सुना तो विचार किया कि चन्द्रसेन महान शिवभक्त है. इसलिए उसे जीतना असंभव है.
महाकाल स्वयं उज्जयिनी का पोषण करते हैं. यहां का बालक भी ऐसा शिवभक्त है, तो चन्द्रसेन का शिवभक्त होना स्वाभाविक है. ऐसे नगर पर आक्रमण से महादेव क्रोधित हो जाएंगे.
इस भय से उन्होंने दुश्मनी का विचार त्यागकर संधि प्रस्ताव भेजा ताकि उन्हें भी भगवान महेश्वर की कृपा प्राप्त होगी. उसी समय परम तेजस्वी श्री हनुमानजी वहां प्रकट हो गए.
उन्होंने बालक को हृदय से लगाकर राजाओं से कहा- ध्यानपूर्वक सुनो. शरीरधारियों के लिए महादेव से बढ़कर अन्य कोई गति नहीं है. महेश्वर की कृपा-प्राप्ति ही मोक्ष का उत्तम साधन है.
इस गोप कुमार ने शिवलिंग के दर्शन किए और उससे प्रेरणा लेकर स्वयं शिवपूजा में प्रवृत्त हुआ. यह कोई लौकिक या वैदिक मन्त्र नहीं जानता, किन्तु इसने बिना मन्त्रोच्चार के भक्ति निष्ठा के बल से भोलेनाथ की आराधना की और उन्हें प्राप्त कर लिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
यह बालक गोप कुल की कीर्ति बढ़ाने वाला उत्तम शिवभक्त हो गया है. इसके कुल में आठवीं पीढ़ी में नन्द उत्पन्न होंगे. उनके यहां साक्षात नारायण अवतार लेकर श्रीकृष्ण के नाम से विख्यात होंगे.
यह गोप बालक भी, जिस पर भगवान शिव की कृपा हुई है, ‘श्रीकर’ गोप के नाम से विशेष प्रसिद्धि प्राप्त करेगा. यह बताकर हनुमानजी अदृश्य हो गए. कहते हैं भगवान महाकाल तब ही से उज्जयिनी में स्वयं विराजमान है.