जानिए कन्हैया ने मिट्टी खाकर पूरे किए कौन से बारह बड़े कामः भगवान का मिट्टी खाना
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।भगवान श्रीकृष्ण ने बचपन में एकबार मिट्टी खाई थी. पूर्णावतार भगवान कोई भी कार्य ऐसे नहीं करते. उसके पीछे कारण होते हैं. परमेश्वर कन्हैया ने मिट्टी खाई. इस लीला के पीछे भी कल्याण के कई कारण थे. अनंत लीलाएं हो सकती हैं फिर भी समझते हैं प्रभु की 12 लीलाएं जिसके कारण उन्होंने मिट्टी खाई होगी.
जन्मस्थली नन्दभवन से पूर्व दिशा में ज्यादा से ज्यादा एक मील दूर ब्रह्माण्ड घाट है. यहीं पर एक दिन बलराम और दूसरे कई ग्वालबाल श्रीकृष्ण के साथ खेल रहे थे. अचानक श्रीदामा ने हल्ला मचा दिया- कन्हैया ने माटी खाली, मिट्टी मुंह में रख ली है.
जो भी पूछता कन्हैया बस नकार में गरदन हिला देते कि माटी नहीं खाई मैंने. एक सखा बोला- चोरी का माखन बहुत खाता है. पेट बहुत चिकना हो गया है. उसे साफ करने के लिये खाई होगी माटी.
भगवान मां यशोदा के सामने पेश हुए. यशोदा ने श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया. श्रीकृष्ण की आंखें डर के मारे नाच रहीं थीं. यशोदा ने डपटकर कहा— तू बहुत ढीठ हो गया है. छिपकर मिट्टी क्यों खायी ?गोपाल बोले—‘माँ! मैंने मिट्टी नहीं खायी, सब झूठ बोल रहे हैं. चाहो तो मेरा मुँह देख लो. यशोदाजी ने कहा- मुँह खोल. भगवान श्रीकृष्ण ने अपना मुँह खोल दिया.
यशोदाजी ने देखा कि उनके मुख में सम्पूर्ण जगत समाया हुआ है, आकाश, पहाड़, द्वीप और समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, ग्रह-गोचर, चन्द्रमा और तारों के साथ सबकुछ उसमें डोल रहा है.
वह बड़ी शंका में पड़ सोचने लगीं कि ‘यह स्वप्न है या भगवान की माया? श्रीकृष्ण ने जल्द ही अपना मुंह बंद कर लिया और मोहक मुस्कान बिखेरते हुए बोले, दिखी कहीं मिट्टी?
मां यशोदा पर कृष्ण की मोहक मायावी मुस्कान का असर था या मां की ममता का प्रभाव. यशोदा ने कन्हैया को गले से लगा लिया और बोलीं- तू जो कहे वही सच्चा बाकी सब झूठ.
कृष्ण ने मिट्टी क्यों खाई, इसके पीछे बड़े गहरे राज हैं. आप कहेंगे ये तो बच्चों का स्वभाव है वे एक खास उम्र में मिट्टी खाते ही हैं. पर भगवान की लीला इतनी आसान दिखती भले हो पर होती नहीं. क्या बारह कारण हो सकते हैं-1 पहली बात मां यशोदाजी ने भगवान के दोनों हाथ क्यों पकड़े? किसी भी माता को पसंद नहीं कि उसका बालक मिट्टी खाए. कान्हा ने मिट्टी खाई तो इस कारनामे में सबसे नजदीकी सहायक तो ये दोनों हाथ ही थे न. अपराधी का सहायक भी अपराधी होता है पहले उसको पकड़ लो तो अपराध का पता चलना आसान हो जाता है.
2 भगवान की दोनों आंखें डर के मारे इसलिये नाचने लगीं क्योंकि असल में भगवान के नेत्र में सूर्य और चंद्रमा का निवास है. वे हर कर्म के गवाह हैं. उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायेंगे. स्वीकार करते हैं तो कोई बात नहीं, यदि मुकर गए तो हमको क्या करना होगा, इस अनिश्चितता में दोनों नेत्र चकराने लगे.
3. पृथ्वी भगवान विष्णु की पत्नी हैं. विष्णु सहस्त्रनाम में भगवान विष्णु का एक नाम “मेदिनिपति भी है. जब भगवान भू देवी से बात करते हैं तो कोई न कोई आ ही जाता है खलल डालने तो उन्होंने धरती का एक टुकड़ा ही मुंह में रख लिया और पृथ्वी से बोले- मेदिनी अब तुम मेरे मुंह में रहकर ही मेरे मुंह से बात कर सकती हो.
4. धूल या मिट्टी के टुकड़े को रज भी कहते हैं. भगवान श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें तो केवल शुद्ध सत्वगुण ही है. जबकि इस अवतार में मुझे बहुत से असुरों का संहार करना है. उसके लिए कुछ राजस कर्म भी करने हैं. राजस कर्म के लिए तो क्यों ना थोडा-सा ‘रज’ संग्रह कर लें. भगवान का संकेत है कि वीरता के सभी कार्य अपनी मिट्टी या राष्ट्र के कल्याण के लिए करना चाहिए.5. भगवान के मुख में द्विज निवास करते हैं. भगवान ने सोचा कि मैं राजस कर्म करुंगा तो इसकी सूचना मुंह में बैठे द्विज अथवा दांतों को देने के लिए उन्हें रज से युक्त करना पड़ेगा. इसलिए एक टुकड़ा मिट्टी खाना जरूरी है.
6. संस्कृत-साहित्य में पृथ्वी का एक नाम ‘क्षमा’ भी है. श्रीकृष्ण ने देखा कि ग्वालबाल मेरे साथ खेलते हैं, अपना सखा मानकर गाली भी दे देते हैं, अपमान भी कर बैठते हैं. इस तरह उनके कर्म दूषित हो रहे हैं, उनका परलोक न बिगड़े इसलिए मुझे अपने भीतर क्षमा धारण करना चाहिये .
7. भगवान ने सोचा कृष्ण अवतार मेरा प्रेम अवतार है. अगर मैं इन भोले भाले ब्रजवासियों को क्षमा नहीं करूँगा तो ब्रहम को गाली देने के कारण इनको नरक में जाना होगा. तब प्रभु ने पृथ्वी के गुण को सबके सामने प्रगट करने के लिए मिट्टी खाई. पृथ्वी से ज्यादा क्षमाशील कोई नहीं. वह अपने ऊपर अत्यातार करके फसल उगाने वाले किसानों को सबसे ज्यादा प्रेम करती हैं. पृथ्वी का इससे मान बढ़ेगा.
8. कल को मैं जो अद्भुत लीला दिखाऊंगा और ये मानेंगे नहीं तो मुझे क्रोध भी आ सकता है. मुझे क्रोध आया तो सब भस्म. इसलिये उनके साथ पृथ्वी का क्षमांश धारण करके ही क्रीडा करनी चाहिये, जिससे कोई विघ्न न पड़े, सब बचे रहें.9. भगवान कृष्ण ने कहा है कि मैं भक्तों का दास हूं. अपने भक्तों की चरण-रज मुख के द्वारा अपने ह्रदय में धारण करने की ही एक लीला है भगवान द्वारा मिट्टी खाना.
10. भगवान श्रीकृष्ण के उदर में रहने वाले कोटि-कोटि ब्राह्मांड़ों के के जीव ब्रज-रज—गोपियों के चरणों की रज—प्राप्त करने के लिये व्याकुल हो रहे थे. उनकी यह कामना पूरी करने के लिये भगवान ने मिट्टी खायी.
11. श्रीकृष्ण ने सोचा सब रस तो ले ही चुका हूँ, यहां श्री राधा रानी की चरणों की धूल पड़ी है, आगे चलकर रास भी करना है, अब क्यों न रसा-रस का भी स्वाद लेता चलूं. संस्कृत-भाषा में पृथ्वी को ‘रसा’ भी कहते हैं.
11. पहले गोपियों का दही, मक्खन खाया था, उलाहना देने पर मिट्टी खा ली, जिससे मुँह पूरी तरह साफ हो जाय. मुह इसलिये खोला कि, ये मुझ अकेले को ही क्यों फंसा रहे हैं. मैंने खायी, तो सबने खायी, देख लो मेरे मुख में समूचा संसार!
12. श्रीकृष्ण ने विचारा कि मुख में विश्व देखकर माता अपनी आँख बंद कर लेगी, यह सोचकर मुख खोल दिया. भगवान ने जल्द ही मुंह बंद इसलिये कर लिया कि मां को मेरा सारा ऐश्वर्य दिख गया तो फिर पुत्र के रूप में प्रीति समाप्त हो जायेगी. वैसे भी ऐश्वर्य प्रेम का शत्रु है.
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