परेशानियां बेशुमार हैं, जलने वाले लगातार बढ़ रहे हैं, क्या करें
जीवन में उलझनों-परेशानियों की कोई कमी नहीं है. एक परेशाानी मिटती नहीं कि दूसरी मुंह बाए खड़ी हो जाती है. ऐसा है न! हम ईश्वर से मनाते रहते हैं कि कोई और परेशानी न आए.
फेसबुक पेज लाइक करेंःदेखा जाए तो ज्यादातर परेशानियों का कारण हम स्वयं हो जाते हैं. सुकरात की एक बात गांठ बांध लेने की है. सुकरात जनजागरण का प्रयास कर रहे थे. अब लोगों की आंखों पर सैकड़ों सालों से पड़ी पट्टी हटाने का प्रयास करेंगे तो उसकी प्रतिक्रिया होगी ही. परिवर्तन, खासकर सकारात्मक परिवर्तन इतना सहज तो होता नहीं.
सुकरात से घृणा करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी. उनका अपमान करना, उन पर हमला करना रोज की बात हो गई थी. जितना विरोध हो रहा था उतने लोग उनके साथ जुड़ भी रहे थे.
सुकरात के किसी प्रिय शिष्य ने पूछा- आप इतने विरोध को कैसे सह लेते हैं. इसका क्या राज है. मैं तो अधीर हो जाता हूं. आप एक मंत्र दीजिए मुझे.
वह बोले-अपने शत्रुओं की संख्या को लगातार कम करते जाओ, तुम दिन-ब-दिन खुश और मानसिक रूप से ताकतवर होते जाओगे. बहुत से लोगों को हम बेवजह अपना बैरी मानकर उनके प्रति सशंकित रहते हैं और इस तरह उनकी अच्छाइयों की अनदेखी और आलोचना का अवसर खोजते रहते हैं.
जलने वालों के प्रति क्यों न यह सोचना अनदेखा करना शुरू किया जाए कि यह तो मेरी शत्रुता के भी योग्य नहीं. इस पर तो दया ही की जा सकती है.
पहले आपको एक छोटी से प्रेरक कथा सुनाता हूं. फिर इस पर आगे बात करेंगे.एक किसान दो घड़ों को एक बड़ी सी लाठी के दोनों छोर पर बांधकर दूर एक नदी पर जाता और रोज वहां से पीने का पानी भर कर ले आता.
एक घड़ा कहीं से थोड़ा सा टूटा था जबकि दूसरा बिलकुल अच्छा. किसान दोनों घड़ों में पानी भरकर ले चलता लेकिन घर पहुंचते बस डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था. ऐसा कई सालों से चल रहा था.
जो घड़ा फूटा नहीं था उसे इस बात का बड़ा घमंड था कि वह सर्वगुण संपन्न है. पूरा पानी घर तक पहुंचाता है. एक तरफ टूटा घड़ा है जो एक भी कायदे से पूरा नहीं कर पाता.वह टूटे घड़े की समय-समय पर हंसी भी उड़ा देता था. दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि उसके कारण किसान की मेहनत बेकार चली जाती है.
फूटा घड़ा यह सोचकर काफी दुखी रहने लगा. एक दिन उसने मन की बात किसान से कहने की सोच ली.
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एक दिन किसान कंधे पर पानी लिए चला जा रहा था तभी आवाज आई- मैं खुद पर शर्मिंदा हूं. आपकी मेहनत बर्बाद करने के लिए माफी मांगता हूं.
किसान ने पूछा- तुम किस बात से शर्मिंदा हो?
घड़े ने कहा- पिछले कई सालों से आप मुझे रोज लेकर नदी तक आते हैं. साफ करके पानी भरते हैं बदले में मैं बेईमानी कर लेता हूं. मुझे जितना पानी आपके घर पहुंचाना चाहिए था उसका आधा ही पहुंचा पाया हूं. मेरे अन्दर कमी है जिससे आपकी मेहनत बर्वाद होती रही.
घड़ा काफी दुखी था.किसान घड़े की बात सुनकर बोला- कोई बात नहीं, मैं चाहता हूँ कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को जरूर देखना. उसके बाद हम फिर से इस पर बात करेंगे.
नदी से घर के रास्ते पर घड़े ने वैसा ही किया.
रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखा तो उसकी उदासी कुछ दूर हुई लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते उसका आधा पानी गिर चुका था. इस बात से उसकी खुशी गायब हो गई और वह मायूस होकर किसान से बार-बार क्षमा मांगने लगा.
किसान ने समझया- शायद तुम मेरा संकेत नहीं समझे. तुमने एक बात और नहीं गौर की कि रास्ते में जितने भी फूल खिले थे वे सब तुम्हारी तरफ ही थे. जिस घड़े से पानी नहीं गिरता उसकी तरफ एक भी फूल नहीं था.मैं तुम्हारी कमी को जानता था लेकिन मैंने तुम्हें त्यागने की बजाय उसका लाभ उठाया. मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर फूलों के बीज बो दिए थे. तुम रोज़ थोडा-थोडा कर के उन्हें सींचते रहे. पूरे रास्ते को इतना सुंदर बना दिया. तुम्हारे कारण ही मैं भगवान को फूल अर्पित कर पाता हूं. तुमसे अपना घर सजाता हूं.
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सारे रास्ते उन फूलों देखकर मुझे भार से होने वाली थकान नहीं लगती. सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते, तो क्या मैं यह सब कुछ कर पाता? घड़े को अपने इस गुण का पता नहीं था. किसान ने जब उसे बताया कि उसके अवगुण में भी गुण हैं तो वह बहुत खुश हुआ.
किसी में कोई शारीरिक कमी दिखे तो उसका माखौल उड़ाने के बजाय उसे प्रेरित करें. आपकी एक कोशिश किसी का जीवन बदल सकती है.वह इंसान घड़े की ही तरह स्वयं को बेकार समझकर नष्ट करने की बजाय वाला खुद पर गर्व करने लगेगा. इस तरह यदि सोचना शुरू करें तो आप लोगों की कमियों को अनदेखा करके उनके गुणों को उभारने के अभ्यस्त हो जाएंगे.
आपको महसूस होगा कि आपके शत्रुओं की संख्या घट रही है और आपसे प्रेम करने वाले बढ़े हैं. भटके हुए को राह पर लाना, यह भी एक तरह की प्रभु भक्ति है.
इंसान तो अवगुणों से भरा पड़ा है, फिर भी वह सच्चे मन से पुकारता है तो भगवान चले आते हैं. उन्होंने कभी फर्क नहीं किया. सुदामाजी ने बचपन में चावल के दाने की बेईमानी की थी पर पुकारा तो श्रीकृष्ण पांव पखारने तक पहुंचे.
अहिल्या से भूल हुई थी. वह पत्थर बनकर पड़ी रहीं और श्रीराम उन्हें खोजते हुए पहुंचे और उद्धार किया. ऐसे अनगिनत उदाहरण जिन्हें देखना चाहिए.
आपको यह कथा कैसी लगी? क्या इसमें प्रेरित करने वाला कोई गुण था? कथा यदि पसंद आई हो तो आप प्रभु शरणम् से जुड़ जाएं. ऐसी कथाओं का सुंदर संसार वहां मिलेगा. लिंक नीचे है. आप हमारे साथ फेसबुक पर भी जुड़ें और इस अभियान को आगे बढ़ाने में हाथ बटाएं.
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