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हिंदू देवों का उपहास करने वाले को मिला सही सबक

हिंदू देवों का उपहास करने वाले को मिला सही सबक

कोई किसी भी धर्म का मानने वाला क्यों न हो उसका अपमान न कीजिए. यह एक गर्व गाथा है. एक बादशाह ने हिंदू धर्म का अपमान किया. कारिंदे ने बादशाह को अच्छा सबक सिखाया. इसे अंत तक पढ़ें, गर्व करें.

अकबर ने राजनीतिक कारणों से जोधाबाई से विवाह कर लिया. महल में पूजा-पाठ की अनुमति भी दे दी, लेकिन हिंदू धर्म को लेकर उसके मन में आदर न था. हिंदुओं के देवताओं पर वह बहुत चुटकी लिया करता था.

एक बार अकबर ने बीरबल से कहा- तुम्हारे भगवान और हमारे खुदा में बहुत फर्क है. हमारा खुदा दुनिया में जब भी जरूरत हो अपने पैगम्बर भेजकर काम कर देता है, जबकि तुम्हारा भगवान बारबार आता है. तुम्हारे भगवान को अपने दूतों पर इतना अविश्वास क्यों है?

बीरबल ने उस समय कुछ बोलना उचित न समझा. बस इतना कहा ईश्वर को बार-बार क्यों आना पड़ता है, इसका मर्म तब समझ में आएगा जब आपको व्यवहारिक अनुभव होगा.

बात बीरबल के मन में लग गई थी. उन्होंने ठाना कि ईश्वर का उपहास करने वाले राजा को सबक सिखाना पड़ेगा.

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बीरबल जानते थे कि ईश्वर के चमत्कार देखकर भी अकबर के आंख पर पड़ी पट्टी नहीं हटेगी. इसलिए कुछ और रास्ता खोजना पड़ेगा. बीरबल ने एक युक्ति लगाई.

उन्होंने अकबर को एक दिन यमुना में परिवार समेत नौका विहार करने को राजी किया. वहां कुछ बड़ी नावों की व्यवस्था पहले से ही करवा दी थी. बरसात के दिन थे. यमुना लबालब भरी थी. पानी उछाल मार रहा था.

जिस नाव में बीरबल ने अकबर को बिठाया उसी नाव में एक तरफ एक दासी अकबर के दुधमुंहे बेटे के साथ बैठी.बीरबल ने अकबर के बेटे की शक्ल का एक मोम का पुतला भी बनवाया. उसे हुबहू राजकुमार जैसे कपड़े पहना दिए गए. पुतला दूर से एकदम शहजादे जैसा दिख रहा था.

दासी को बीरबल ने सब कुछ सिखा दिया था. नाव यमुना के बीच पहुँची. लहरों पर नाव हिचकोले लेने लगी. तभी दासी ने ऐसा स्वांग रचा जैसे शहजादा उसकी गोद से उछलकर पानी में जा गिरा हो. उसने मोम के पुतले को नदी में गिराकर शोर मचाना शुरू कर दिया.

“शहजादे नदी में गिर गए.” “कोई शहजादे को बचाओ, वह नदी में गिर गए.”छाती पीटते हुए वह ऐसा चिल्लाती रही. सबका ध्यान उधर गया.  अकबर ने उसकी चीख सुनी. मोम के पुतले का कपड़ा पानी पर दिख रहा था.

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बादशाह समझ गया कि उसका शहजादा नदी में गिर गया है. उसे तुरंत न बचाया गया तो डूब मरेगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

बेटे की जान पर बन आई थी. बादशाह अकबर ने न आव देखा न ताव. तत्काल बेटे को बचाने के लिए अकबर यमुना में कूद गया. गोते मारकर बड़ी मुश्किल से उसने बच्चे को पानी में से निकाला.

बाहर आते ही उसने देखा कि यह तो बच्चा नहीं मोम का पुतला था.अब तो अकबर आग-बबूला हो गया. गुस्ताख दासी का सिर काटने के लिए तलवार खींच ली. वह दासी की ओर बढ़ा ही था कि बीरबल सामने आकर खड़े हो गए. बीरबल ने क्रोध त्यागने की विनती की. दासी को भी इशारा किया तो वह अकबर के पैरोंं में लोट गई.

अकबर थोड़ा शांत हुआ तो बीरबल ने कहा- बादशाह सजा देनी हो तो मुझे दें. इसमें दासी का दोष नहीं है. उसने यह सब मेरे कहने से किया. मैं इसके लिए अपनी गर्दन कटाने को हाजिर हूं. आप इसे मुक्त कर दीजिए.

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अकबर ने सुना तो और नाराज हुआ. गुस्से में चिल्लाते हुए बोला- बीरबल सर तो मैं तुम्हारा कलम करूंगा ही पर मुझे जानना है कि यह गुस्ताखी क्यों की तुमने?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

बीरबल ने कहा- जहाँपनाह! आपकी बेइज्जती के लिए नहीं बल्कि आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ा. आप पुतले को अपना पुत्र समझकर नदी में कूद पड़े. जबकि इसी नाव में आपके साथ कई नामी तैराक बैठे थे. आप उनमें से किसी को भी आदेश देते. वह तत्काल कूदकर शहजादे को बचा लाता. पर आपने ऐसा नहीं किया. मेरी जान तो जाने ही वाली है पर मुझे इस प्रश्न का उत्तर जानकर मरना है. मैं जान सकता हूं आप स्वयं क्यों कूदे?अकबर ने कहा-अपना बेटा डूबता हो तो मंत्रियों या तैराकों को कहने की फुर्सत रहती है? खुद ही कूदा जाता है अपने कलेजे के टुकड़े को बचाने के लिए. क्या फिजूल का सवाल करके मुझे गुमराह कर रहे हो.

बीरबल बोले- मैैं यही सुनना चाहता था. जैसे अपने बेटे की रक्षा के लिए आप खुद कूद पड़े, ऐसे ही हमारे भगवान जब भी अपने बच्चों को संसार की मुसीबतों में डूबता देखते हैं, किसी पैगम्बर या दूत को नहीं भेजते, खुद ही रक्षा के लिए प्रकट हो जाते हैं. वे अपने बेटों की रक्षा के लिए स्वयं अवतार लेते हैं.

संसार की मुश्किलों का सामना करते हुए अपने बच्चों को जीवन का मूल्य सिखाते हैं. वह भगवान होकर भी खुद संसार का कोई नियम नहीं तोड़ते. सारे कष्ट संसारी लोगों की तरह झेलते हैं. यही फर्क है आपके खुदा और मेरे भगवान में.अकबर का सर झुक गया था. उसे अपनी भूल का आभास हुआ था. किसी और की आस्था का अपमान करने वाले को स्वयं अपमानित होना पड़ता है. एक सच्चा धर्मनिष्ठ किसी के धर्म का उपहास नहीं करता. वह सबका सम्मान करता है. सनातन यही सिखाता है.

सबका आदर करना चाहिए. किसी भी धर्म या परंपरा का अपमान नहीं करना चाहिए. ईश्वर को यह पसंद नहीं है.

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