क्रोध है अग्नि समानः रौद्ररूप दिखाकर शिवजी ने पिप्पलाद को समझाया
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंवृतासुर को मारने के लिए इंद्र ने अपना वज्र चलाया तो वह टूट गया. उसे मारने के लिए नए और ज्यादा मजबूत वज्र की जरूरत थी. दधीचि ने शिवजी से वरदान लिया था कि उनकी हड्डियों इंद्र के वज्र से ज्यादा मजबूत हो जाएं.
भगवान विश्वकर्मा को नया वज्र बनाने का आदेश श्रीहरि से मिला तो विश्वकर्माजी ने कहा कि दधीचि की हड्डियां मिलें तभी वह वज्र बना सकते हैं. इंद्र के मांगने पर दधीचि ने हड्डियां दान कर दीं.
जब यह घटना घटी तब दधीचि का बेटा पिप्लाद बहुत छोटा था. बाद में उसे बात पता चली तो यह सोचकर उसे बहुत क्रोध आया कि देवताओं ने अपने लाभ के लिए उसके पिता के प्राण ले लिए.पिप्लाद ने देवताओं से बदला लेने की ठानी. उसने भगवान शिव की तपस्या शुरू की. शिवजी प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा. पिप्लाद बोले- अपना तीसरा नेत्र खोलकर देवताओं को भस्म कर दीजिए.
भगवान शिव ने समझाते हुए कहा- बेटा अभी तो मैं अपने साधारण रूप में तुम्हारे सामने प्रकट हुआ हूं. मेरे रौद्र रूप को तुम देख नहीं पाओगे. मेरा तीसरा नेत्र खुलते ही सारा संसार नष्ट हो जाएगा. तुम एक बार फिर सोच लो.
पिप्पलाद बोले- मुझे इस संसार से कोई मोह नहीं है. आप तो बस नेत्र खोलकर देवताओं को भस्म कर दीजिए भले ही साथ में सारा संसार जल जाए. क्रोध से भरे पिप्लाद जिद पर अड़े थे.
शिवजी बोले- तुम्हें सोचने का एक मौका और देता हूं. पहले अपने मन में मेरे रौद्र रूप के दर्शन करो फिर निर्णय करो. पिप्लाद ने हृदय से उनका दर्शन किया तो उन्हें लगा कि वह खुद जल रहे हैं. उनका शरीर कांपने लगा. वह जोर से चिल्लाए.पुकार सुनकर शिवजी ने अपना रौद्र रूप उसके हृदय से गायब कर दिया और सामान्य स्वरूप में प्रकट हुए. पिप्लाद बोले- प्रभु मैंने तो आपसे देवताओं को भस्म करने की प्रार्थना की थी. आप तो मुझे ही भस्म करने लगे. क्यों?
शिवजी जोर से हंसे फिर बोले- पुत्र विनाश किसी एक स्थान से शुरू होता है लेकिन फिर वह रोकने से नहीं रूकता. बढ़ता चला जाता है. एक दिन उसको भी अपनी चपेट में ले लेता है जिसने उसे शुरू किया था.
तुम्हारे हाथ इंद्र हैं, नेत्र सूर्य हैं और मन चंद्रमा है. तुम्हारे सारे अंग किसी न किसी देवता के रूप हैं. अगर उनको नष्ट कर दोगे तो तुम कैसे बचे रहेगो. तुम्हारे पिता ने परोपकार के लिए शरीर त्याग दिया और तुम उनके पुत्र होकर दूसरों को नष्ट करना चाह रहे हो.पिप्लाद को बात समझ में आ गई. वह शिवजी के चरणों में गिर पड़े. ध्यान रखें क्रोध एक आंच है. आप ज्यादा समर्थवान हैं तो संभव है दूसरों की ज्यादा क्षति कर सकते हैं लेकिन ध्यान रहे उसकी आंच से आप भी अछूते नहीं रह सकते.
यदि आप शत्रु का शरीर जला देते हैं तो ध्यान रहे कि आग जलाते समय आपके शरीर के भी कुछ उपयोगी रोएं जल जाते हैं जिनपर ध्यान बाद में जाता है और पीड़ा बाद में महसूस होती है.
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