केदारनाथ धाम- कैसे पड़ा शिव के इस धाम का केदार नाम. स्कंद पुराण की कथा

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मैंने आपको कल केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा सुनाई थी कि पांडवों को साक्षात दर्शन देने से बचते हुए भोलेनाथ ने भैंसे का रूप धर लिया था. भीम ने उनकी पूंछ पकड़ ली और सभी पांडव स्तुति करने लगे. प्रसन्न होकर प्रभु ने पांडवों को दर्शन दिए.
स्कन्द पुराण में ही महिष रूपधारी भगवान शिव की केदारधाम से जुड़ी एक अन्य कथा भी आती है. उस कथा में भी केदार क्षेत्र का वर्णन है. वह कथा भी सुना देता हूं.
एक बार असुरों ने जब देवलोक पर आक्रमण कर उसे जीत लिया तो इंद्र आदि देवता जान बचाकर भागे. देवराज इन्द्र इस संकट से मुक्ति के लिए भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए केदारक्षेत्र में तप करने लगे.
इन्द्र के साथ अन्य देवताओं ने भी महादेव की अत्यंता श्रद्धापूर्वक आराधना शुरू की. उनकी तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए. महादेव ने उनकी पीड़ा का अंत करने की आकाशवाणी की.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
महादेव महिष (भैंसे) का रूप धारण करके इन्द्र के समक्ष ही धरती को चीरते हुए प्रकट हुए. उन्होंने पीड़ित इंद्र को सांत्वना देते हुए कहा- ‘देवेन्द्र! बताओ मैं इस महिष रूप में किस-किस का जल में पटककर वध कर दूं?
भगवान शिव के ऐसा पूछने पर इन्द्र ने पांच भयंकर असुर सेनापतियों के नाम बताए. इन्द्र को वचन देकर महादेव उन पांचों बलशाली दैत्यों को खोजने उनके स्थान पर गए.
क्रोधित महिष रूपधारी महादेव को देखकर दैत्यों में भय हुआ. उन्होंने भोलेनाथ पर प्रहार कर दिया. महादेव ने उन्हें अपनी सींगों से मार-मारकर अचेत कर दिया और फिर जल में डुबोकर यमलोक पहुंचाया.
शत्रुओं का नाश होने से इंद्र समेत सभी देवताओं ने प्रसन्न होकर महादेव की अनेक प्रकार से स्तुति आरंभ की. भोलेनाथ उनपर दयालु हो गए और उन्होंने इन्द्र से वर मांगने को कहा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
इन्द्र ने कहा- प्रभु आपने हमारे परम शत्रुओं का संहारकर हमारी चिंता समाप्त कर दी है. सेनापतियों से वंचित असुर सेना का मनोबल टूट गया है. वह आपके भय से देवलोक से जान बचाकर भाग गई है. हम अब सुखी हैं.
हमारे सारे मनोरथ आपने पूर्ण किए हैं. आपकने वर देने की इच्छा कही यह परम सौभाग्य की बात है. मैंने आपकी कृपा इसी पावन भूमि पर प्राप्त की है इसलिए आप धर्म तथा तीनों लोकों की रक्षा करने के लिए यहां सर्वदा निवास करें.
भगवान शिव ने इंद्र को तथास्तु कहा. महादेव ने महिष रूप में प्रकट होकर इन्द्र से कहा था- ‘के दरयामि?’ अर्थात किसको जल में विदीर्ण कर समाप्त कर डालूं?
इसलिए इंद्र ने कहा- प्रभु! आपके महिष रूप द्वारा “के दरयामि” वाक्य का प्रयोग करके मुझे अनुगृहित किया गया था इसलिए इस क्षेत्र का नाम ‘केदार’ प्रसिद्ध होगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
दोनों कथाएं स्कंद पुराण में आती हैं. संभव है कि इंद्र और पांडवों दोनों को महादेव ने महिष रूप में ही दर्शन दिए हों. इसलिए यहां महिष के पृष्ठ भाग आकार की पूजा भी होती है.
प्रभु की माया तो प्रभु ही जानें, हम तो बस पुराणों में आए प्रसंग आपके समक्ष लेकर आते हैं. मैं इतना सक्षम नहीं हूं कि ऋषि-मनीषियों द्वारा लिखे शास्त्रों को चुनौती दे सकूं. पुराण मेरे लिए सदैव पूजनीय हैं.