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जीवात्मा और परमात्मा का फर्कः मायाजल में फंसी जीवात्मा समझ ही नहीं पाती कि हर पल की कीमत बताने को परमात्मा उसके पास है

जीवात्मा और परमात्मा का फर्कः मायाजल में फंसी जीवात्मा समझ ही नहीं पाती कि हर पल की कीमत बताने को परमात्मा उसके पास है

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एक पेड़ पर दो पक्षी बैठे थे. एक ऊपर की डाल पर दूसरा नीचे की. ऊपर की डाल वाला पक्षी स्थिर भाव का था. अपनी धुन में रहता, शांत और संतुष्टि के भाव के साथ. नीचे वाला पक्षी चंचल स्वभाव का था.

वह कभी इस डाल पर फुदकता कभी उस डाल पर. कभी खुद को बड़ा भाग्यशाली समझता तो कभी भाग्य का रोना रोने लगता. हर चीज से उसका मन तुरंत भर जाता.

तरह-तरह के फलों के पीछे भागता. कभी बहुत मीठे फल मिल जाते तो बड़ा खुश होता, कभी कड़वे फल मिलते तो सबको कोसने लगता. पेड़ को, फल को और कभी-कभी तो ईश्वर तक को.

एक बार उसने एक फल खाया. फल बहुत कड़वा निकला. वह स्वयं पर झुंझलाने लगा. तभी उसकी नजर ऊपर के डाल पर बैठे पक्षी पर पड़ी. वह पहले ही की तरह स्थिरभाव से बैठा था.

उसे ऊपर बैठा पक्षी ज्यादा सुखी लगने लगा. उसका अपना मन कड़वा हुआ था इसलिए स्वयं को सबसे दुखी और दूसरे को सबसे सुखी समझ रहा था. उसने दूसरे पक्षी के बारे में सोचना शुरू किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

बड़ा विचित्र है. न तो कभी बहुत खुश दिखता है न कभी बहुत दुखी. शांत भाव से अपने आप में विभोर रहता है. वह है तो थोड़ा अजीब पर ज्यादा सुखी है. क्यों न उससे मिलकर दोस्ती की जाए, कुछ सीखा जाए.

वह ऊपर वाले पक्षी के पास गया. जब नजदीक पहुंचा तो महसूस हुआ कि सूर्य की किरणों जैसे सुनहरे पंखों में से रोशनी आ रही है. उस रोशनी में उसने खुद को देखा तो अपना शरीर सड़ता-गलता नजर आया.

ऐसा महसूस हुआ मानो वह काफी समय से थोड़ा-थोड़ा करके गल रहा था पर आभास नहीं हो पा रहा था. फिर उस पक्षी से निकली किरणें उसे अपने में समेट कर पवित्र कर रही हैं उसकी पीड़ा शांत कर रही हैं.

सुनहरे पंखों वाले ऊपर की डाल के पक्षी को परमात्मा समझिए और नीचेवाले को जीवात्मा. जीवात्मा ही सारे सुख-दुख भोग रहे हैं जैसे उस पक्षी को कभी मीठे तो कभी कड़वे फल मिल जाते थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

जीवात्मा ही बेचैन होते हैं, सुख में उधम मचाने लगेंगे और दुख में हिम्मत हारने लगेंगे लेकिन परमात्मा समभाव में हैं. इसलिए जीवात्मा का अंततः उसकी ओर झुकाव होता है.

जब जीवात्मा परमात्मा के करीब जाने को बेचैन होता है तो वही आध्यात्म की स्थिति है क्योंकि मन की शांति तो वहीं मिलनी है. मन की शांति की ओर अग्रसर होने में हम जितनी देर करेंगे, कड़वे फल उतने ही चखने को मिलेंगे.

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