इंद्रपुत्र जयंत ने की भगवान नृसिंह के भक्त के वृंदावन से चोरी, मिला दंडः शांतनु के रथविहीन होने की कथा का अंतिम भाग

इंद्रपुत्र जयंत ने की भगवान नृसिंह के भक्त के वृंदावन से चोरी, मिला दंडः शांतनु के रथविहीन होने की कथा का अंतिम भाग


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वृंदावन का मालिक रवि अपने उद्यान के फूलों की अदृश्य शक्तियों द्वारा होने वाली चोरी से भयभीत हो गया. वह अपने आराध्य भगवान नृसिंह को पुष्प अर्पित नहीं कर पा रहा था. दुखी माली रवि ने भगवान नृसिंह से प्रार्थना की.

रवि ने सारी रात जागकर अपने बाग की पहरेदारी की थी. वह प्रभु को याद करता था कि तभी उसे शीघ्र ही नींद आ गयी. उसे सपने में भगवान नृसिंह ने दर्शन दिए.

भगवान ने कहा- पुत्र मैं जानता हूं तुम पुष्प की चोरी के कारण दुखी हो. तुमने कई दिनों से मुझे पुष्प नहीं चढ़ाए उसकी पीड़ा है. तुम्हारा परिवार भी इस कारण संकट में है. उस चोर को अवश्य दंड मिलेगा.

तुम कहीं से मेरा निर्माल्य(चढ़े हुए फूल आदि) लेकर आओ. उस निर्माल्य को बागीचे के चारों और और बीच-बीच में बिखेर दो. तुम्हारे फूलों के चोर दुष्ट से फूलों को बचाने का इससे अलग कोई उपाय नहीं है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
रवि तुरंत उठ बैठा. शीघ्र ही मंदिर जाकर वहां भगवान नृसिंह पर चढाये गये, प्रयोग किये हुए फूल माला और अन्य निर्माल्य सामग्री लाकर समूचे बागीचे में छींट दिया.

उसने निर्माल्य को बागीचे के चारों तरफ इस कुशलता से बिखेर दिया ताकि जो कोई भी फूल तोड़ने का प्रयास करता उसे निर्माल्य का संपर्क अवश्य ही होना था.

दरअसल वृंदावन के पुष्पों की चोरी देवराज इंद्र का पुत्र जयंत कर रहा था. हर रात कुछ पहर रात बीत जाने के बाद एक बहुत ही सुंदर यान पर सवार होकर जयंत कुछ अप्सराओं के साथ वहां आता था.

उसे वृंदावन की शोभा बहुत भा गई थी. इसलिए वह उसमें अप्सराओं संग विहार करता था और सुगंध के लोभ से सारे फूल तुड़वा कर अपने यान में रखकर चलता बनता.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
हर रात्रि की भांति इंद्रपुत्र जयंत बागीचे में आया और यान से उतरकर फूलों को तोड़्ने लगा. फूलों की सुगंध में मस्त उसे भगवान नृसिंह के निर्माल्यों का ध्यान ही न रहा.

जयंत जब वाग के फूल तोड़कर वापस यान पर चढने का प्रयास करने लगा तो वह स्वयं अपने यान में चढ़ने में असमर्थ अनुभव करने लगा. उसके पैर उठ ही नहीं पा रहे थे. उसने कई प्रयास किए पर असफल रहा.

यान पर बैठे सारथी देवसेवित ने कहा- इंद्रकुमार लगता है कि आपने भूलवश भगवान नृसिंह के निर्माल्य को लांघ लिया है. अब आप इस यान पर चढ नहीं पायेंगे. मुझे दुःख है पर मैं कुछ नहीं कर सकता. इसलिए मैं तो चला स्वर्गलोक.

जयंत ने विनीत भाव से कहा- यदि मेरे साथ जाना संभव नहीं है तो कम से कम अज्ञानता में हुए मेरे इस पाप के निवारण का कोई उपाय जानते हो तो वह बताकर प्रस्थान करो या स्वर्गलोक जाकर वहां से निवारण पूछकर शीघ्र ही मुझे संदेश दो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
सारथी देवसेवित बोला- कुरुक्षेत्र में परशुरामजी का द्वादश वर्षीय यज्ञ चल रह है. आप वहां जाएं और विनम्र भाव से ब्राह्मणों का जूठन साफ करें. इस प्रकार नित्य थोड़ी-थोड़ी शुद्धि होते एक दिन पूर्ण शुद्धि के बाद आप पुनः स्वर्ग आने के योग्य हो जाएंगे.

यह कहकर सारथि देवसेवित यान समेत स्वर्ग को लौट गया. यह कथा सुनाकर नारद जी शांतनु से बोले- राजन जयंत ने समय व्यर्थ नहीं किया. वह कुरुक्षेत्र पहुंचकर सरस्वती नदी के तट पर हो रहे विशाल द्वादश वर्षीय यज्ञ में पहुंचा.

यज्ञ में पधारने वाले ब्राह्मणों का जूठन साफ करने लगा. निरंतर अपने कार्य को निष्ठा पूर्वक और सेवा भाव से करने के कारण यज्ञ में आए ब्राह्मण उसके प्रशंसक बन गए.

बारह बरस बीतने के बाद जब यज्ञ समाप्त हुआ तो ब्राह्मणों ने उससे उसका परिचय पूछा कि तुम कौन हो? बारह बरस तुमने निर्विकार भाव से पूरी लगन और निष्ठा से जूठन साफ किया पर इस बीच एक बार भी हमारा भोजन नहीं किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
तुमने तो अन्न भी नहीं ग्रहण किया, ऐसा क्यों? जीवित कैसे हो? ऋषियों के इस प्रकार पूछने पर जयंत ने सारी कथा कह दी. पापमुक्त होने के कारण स्वर्ग से उसका विशेष रथ वापस आया और उसपर सवार हो वह स्वर्ग को चला गया.

नारदजी ने शांतनु से कहा- तो राजन आप भी अपने शुद्धिकरण के लिए ब्राह्मणों का जूठन साफ करें, इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है. इस बात का ध्यान रखें कि अब कभी भगवान नर्सिंह के निर्माल्य का भूले से भी लंघन न हो.

यह प्रसंग सुनाकर सूतजी ऋषि भारद्वाज से बोले- इस तरह नारदजी के बताने से शांतनु ने बारह बरसों तक एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणों का जूठन साफ किया और फिर देवताओं के दिए अपने उत्तम रथ पर सवार होने का सामर्थ्य प्राप्त कर सके.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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