देवों से शांतनु को मिला दिव्यरथ का उपहार, राजा ने खो दिया उसपर चढ़ने का अधिकारः शांतनु के रथविहीन होने और पुनः रथप्राप्ति की कथा

लेटेस्ट कथाओं के लिए प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प डाउनलोड करें।
आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
[sc:mbo]
ऋषि भारद्वाज ने सूतजी से पूछा- ऋषिवर, शांतनु देवताओं द्वारा दिए रथ पर बैठने योग्य नहीं रह गये थे, ऐसा क्यों हुआ था? फिर उन्होंने ऐसा क्या किया कि वह रथ पर बैठने के अधिकारी बन सके? इस प्रसंग को सुनाने की कृपा करें.
राजा शांतनु को देवताओं ने प्रसन्न होकर दिव्य रथ प्रदान किया था. शांतनु उसी रथ का प्रयोग करते थे. एक दिन वह रथ पर सवार होकर कहीं गए. कार्य पूरा करने के बाद वह पुनः अपने रथ पर सवार होने आए तो वह सवार ही न हो सके.
राजा ने कई बार प्रयास किया किंतु वह उस दिव्य रथ पर सवार न हो सके. रथ वहां से लुप्त गया. राजा रथविहीन हो गए थे. चिंतित शांतनु ने सोचा- मैं प्रतिदिन नृसिंह भगवान की पूजा मनोयोग से करता हूं. लक्ष्मीपति भी मुझसे रुष्ट नहीं हैं. देवताओं ने तो प्रसन्न होकर ही यह रथ सौंपा था. फिर ऐसा क्यों?
इसी बीच नारदजी उधर से होकर गुजरे. यदि राजा रथविहीन हो जाए तो उसका अर्थ होता है कि उसका पराक्रम और ऐश्वर्य नष्ट हो चुका है. इसलिए शांतनु को थोड़ी लज्जा आयी. परंतु नारदजी को देख कुछ ढाढस भी बंधा.
शांतनु के बोलने से पहले नारदजी ही बोल पड़े- राजन इस तरह विषाद से भरकर आप किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. आपका रथ कहां है, दिखाई तो नहीं देता?
शांतनु ने विनीत भाव से कहा- मुनिश्रेष्ठ मैं अपने रथ से ही यहां आया था पर जब लौटकर रथ पर चढने को हुआ तो जाने क्यों मेरी गति रूक गई. मैं रथ पर चढने में असमर्थ हो गया तो रथ लौट गया. मैं यहां असहाय खड़ा हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
नारद जी ने पूछा- महाराज इसका क्या कारण हो सकता है इसका आपने विचार किया? कोई कारण पता हो तो बतायें जिसका हम समाधान बता सकें.
शांतनु ने कारण जानने में असमर्थता जताई तो नारदजी से प्रार्थना की कि वह अपनी शक्तियों का प्रयोग कर कारण को समझने का प्रयास करें और निवारण भी बताएं. नारद जी ने ध्यान लगाया.
नारदजी ने कहा- राजन आपने भूलवश भगवान विष्णु का निर्माल्य लांघ लिया है जिसके चलते आपकी गति अवरुद्ध हो गई और आप रथ पर चढने में असमर्थ हुए हैं.
शांतनु ने कहा- अंजाने में ऐसा अपराध मुझसे हुआ होगा मुनिवर. कृपा करके इससे मुक्ति का उपाय बताएं. नारद बोले- इस संदर्भ में मुझे एक और घटना की स्मृति है उसकी कथा कहता हूं. ध्यान से सुनो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
अंतर्वेद में कोई बड़ा बुद्धिमान रवि नामक माली रहता था. स्वभाव से साधु और धर्मनिष्ठ, पूजा पाठ करने वाला था साथ ही परिश्रमी भी था. रवि ने एक बहुत बड़ा बागीचा लगाया.
वह मूलत: तुलसी का बागीचा था पर उसमें मौलश्री, मल्लिका, बकुल, इस प्रकार के बहुतेरे सुगंध देने वाले पुष्प भी थे. तुलसी की अधिकता के चलते उस वाटिका को नाम दिया वृंदावन. बागीचा बहुत ही मनोहर था.
रवि ने अपने बागीचे के चारों और बडी अभेद्य और न लांघे जाने वाली सुदृढ घेराबंदी खड़ी करायी थी. उसके भीतर बागीचे के एक छोर पर अपना घर बनाया और ऐसा प्रबंध किया था कि कोई बिना घर में प्रवेश किये बागीचे में नहीं जा सकता था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
बागीचे के दुर्लभ सुगंधित फूलों से मालाएं तैयार करता था. कुछ मालाएं भगवान नृसिंह को अर्पण करता, कुछ ब्राह्मणों को भेंट करता और बाकी को बाजार में बेचकर अपनी पत्नी और परिवार का पालन पोषण किया करता था.
बागीचे से ही उसकी आजीविका चलती थी. एक दिन रवि ने देखा कि बागीचे में एक भी फूल नहीं है. वह अचरज से भर गया क्यों कि एक दिन पहले उसने कुछ फूल और ढेरों कलियां देखी थीं. आज बागीचा सफाचट. उसे कुछ समझ में नहीं आया.
अगले दिन भी ऐसी ही स्थिति देख कर वह तो हैरान ही रह गया. बदहवास बागीचे में घूमता रहा. कहीं किसी के आने का कोई संकेत न दिखा. वैसे किसी मनुष्य का यहां आना असंभव था पशुओं की तो बात ही क्या. पक्षियों का ये काम नहीं हो सकता था.
रवि ने विशेष निगरानी की ठानी. पूरे दिन बागीचे में ही रहा और रात में खेत में ही सो गया. कुछ रात बीतने पर वह सचेत हुआ और यह देखने के प्रयास में छिपकर बैठ गया कि क्या कोई यहां आता है, आता है तो कौन और कहां से?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
रवि रात भर बागीचे में जागता रहा पर किसी के आने के संकेत नहीं मिले. सुबह हुई तो फिर से फूल गायब हो चुके थे. अत्यंत विषाद ले भरा दुःखी रवि घर लौट आया.
रवि भगवान नृसिंह का भक्त था. वह अपने आराध्य देव को बार-बार याद करने लगा और अंजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा मांगने लगा. वह भगवान तक को पुष्प अर्पित नहीं कर पा रहा इसका उसे बड़ा दुख था.
इसी चिंता में व्याकुल रवि को बैठते ही नींद आ गई. नींद में उसे भगवान ने दर्शन दिए और फूल के चोर का पता लगाने की युक्ति बताई. कौन था रवि के वृंदावन का चोर और उससे शांतनु का क्या सरोकार जो नारदजी ने कथा सुनाई.
शेष भाग अगले पोस्ट में पढ़ें कुछ ही देर में…
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली