श्रीरामचरितमानसः एहि बिधि भलेहिं देवहित होई, मत अति नीक कहइ सबु कोई- देवों को तारकासुर का भय व ब्रह्माजी द्वारा राह सुझाना

श्रीरामचरितमानसः एहि बिधि भलेहिं देवहित होई, मत अति नीक कहइ सबु कोई- देवों को तारकासुर का भय व ब्रह्माजी द्वारा राह सुझाना


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शिवजी की ओर से भेजे गए सप्तर्षियों ने अऩेक प्रकार से पार्वतीजी की परीक्षा कर ली है. उन्हें तरह-तरह से शिवविमुख करने का प्रयास किया किंतु पार्वतीजी का प्रण अटल है. सप्तर्षि इससे प्रसन्न हैं और पार्वतीजी को प्रणामकर उनकी महिमा गाते पर्वतराज के महल जाते हैं.

पर्वतराज को वे अपने आगमन का कारण बताते हैं और कहते हैं कि आपकी पुत्री का तप पूरा हुआ है. आप उन्हें तप से हटाकर समझा-बुझाकर घर ले आएं. समय आते ही उनका मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा.

हिमवान पार्वतीजी के पास आते हैं और उन्हें यह सब बताया है तो पार्वतीजी प्रसन्न हो गई हैं. वह पिता के साथ वन का त्यागकर घर चलने को सहमत हैं. मुनियों ने अपना कार्य पूर्ण किया और शिवजी को सब विस्तार से बता दिया.

चौपाई :
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई॥1॥

मुनियों ने जाकर हिमवान्‌ को पार्वतीजी के पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आए, फिर सप्तर्षियों ने शिवजी के पास जाकर उनको पार्वतीजी की सारी कथा सुनाई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥
मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥2॥

पार्वतीजी का प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गए. सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने ब्रह्मलोक को चले गए. तब शिवजी मन को स्थिर करके श्री रघुनाथजी का ध्यान करने लगे.

भोलेनाथ जैसे विजितेंद्रिय विवाह की बात को सहमत हैं यह सब अकारण नहीं हो रहा है. इसके पीछे एक बड़ा देवकार्य भी छुपा है. तारकासुर नामक महाअसुर ने संसार को क्षुब्ध कर रखा है. उसने सभी दिक्पालों से छीनकर त्रिलोकी का संचालन स्वयं करने की धृष्टता की है.

तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥
तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥3॥

देवता और मनुष्य सभी त्राहि-त्राहि कर रहे हैं. इस संकट का निवारण भोलेनाथ के अतिरिक्त किसी के भी पास नहीं है. प्रभु अपने भक्तों को कष्ट में कैसे देख सकते हैं.

अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥4॥

वह अजर-अमर था, इसलिए किसी से जीता नहीं जाता था. देवताओं ने उसके साथ बहुत युद्ध किया किंतु हार गए. तब देवों ने ब्रह्माजी के पास जाकर गुहार लगाई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
दोहा :
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥82॥

ब्रह्माजी ने सब देवताओं का दुःख देखा, समझा और व्यथित हुए. ब्रह्माजी ने कहा- इस दैत्य की मृत्यु शिवजी के वीर्य से पुत्र उत्पन्न के ही हाथों हो सकती है. उसके अतिरिक्त वह युद्ध में किसी से पराजित नहीं होगा.

ब्रह्माजी के मुख से अपने परमशत्रु के नाश का भेद जानकर भी देवताओं का दुख कम नहीं हुआ है. तारकासुर केवल शिव के तेज से उत्पन्न पुत्र के हाथों मारा जाएगा लेकिन शिवजी की पत्नी योगाग्नि में भस्म हो चुकी हैं. वह स्वयं योगमुद्रा में लीन हैं.

फिर यह कार्य संभव कैसे हो? महादेव तो मन के स्वामी हैं. वह एक बार में लाखों वर्षों का ध्यान लगाते हैं. उस पर से उन्होंने पुनःविवाह भी नहीं किया है. तारकासुर के अन्याय से मुक्ति कैसे हो, यही चिंतन हो रहा है? ब्रह्माजी उपाय देते हैं-हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
चौपाई:
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥
सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥1॥

मेरी बात ध्यान से सुनो और कोई उपाय करो. ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जाएगा. सतीजी ने दक्ष के यज्ञ में देहत्याग किया था. उन्होंने अब हिमाचल के घर पार्वती के नाम से फिर से देह धारण किया है.

तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥
जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥2॥

उन्होंने शिवजी को पति बनाने के लिए तप किया है. परंतु शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगाए बैठे हैं. उन्हें श्रीरामजी ने विवाह के लिए मनाया तो है लेकिन शिवजी के लिए कोई समय सीमा तो हो नहीं सकती है.

शिवजी बात को टालेंगे तो नहीं लेकिन कब मानेंगे यह बताया नहीं जा सकता. इसलिए उपाय करना होगा. जो मैं कह रहा हूं यद्यपि है तो बड़े असमंजस की बात, फिर भी सबके हित में जरूरी है सो सुनो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥3॥

तुम कामदेव को शिवजी के पास भेजो. वह शिवजी के मन में प्रेम उत्पन्न करे और उनकी समाधि भंग करे. जैसे ही शिवजी समाधि ने निकलेंगे, तब हम सभी जाकर शिवजी के चरणों में शीश रख देंगे और उन्हें राजी करके विवाह करा देंगे.

एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥4॥

अभी देवताओं के हित के लिए इसके अलावा और कोई 0राह नहीं सूझती. सबने ब्रह्माजी की बात स्वीकार ली. फिर देवताओं ने प्रेम से उनकी स्तुति की. तब विषम पांच बाण धारण करने वाले और मछली के चिह्नयुक्त ध्वजा वाले कामदेव प्रकट हुए.

देवताओं के विशेष अनुरोध पर कामदेव ने एक बड़ा बीड़ा उठा लिया लेकिन उसका बड़ा भीषण परिणाम उन्हें भोगना पड़ा. कामदेव के भस्म होने और पुनः जीवित होने का प्रसंग कल.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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