Advertisement728 × 90

ब्रह्मचारी गणेशजी के दो ब्याह कैसे हुए

ब्रह्मचारी गणेशजी के दो ब्याह कैसे हुए

गणेश जी ने ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लिया था. दैवयोग से संयोग ऐसे बने कि उनका ब्रह्मचारी रहने का संकल्प तो टूटा ही दो विवाह हो गए.

गणेश जी की दो पत्नियां है- ऋद्धि एवं सिद्धि. पर गणेश जी ने ब्रह्मचारी रहने का संकल्प किया था. फिर दो-दो विवाह कैसे हो गए? है न आश्चर्य की बात. आपको भगवान श्रीगणेश की लीला कथा सुनाता हूं. इस कथा को सुनकर आपको बचपन की शरारतों की याद ताजा हो जाएगी.

धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-गणेश जी बचपन में बड़े नटखट थे. उनकी शरारत से माता पार्वती कई बार बहुत परेशानी हो जाती थीं.  गणेश जी ने एक बिल्ली देखी. उसके साथ खेलते-खेलते अचानक हवा में घुमाकर उछाल दिया. बिल्ली धरती पर गिरकर घायल हो गई. गणेश जी बिल्ली की ओर दौड़े तो वह अचानक गायब हो गई. बालगणेश खेलते-खेलते थक चुके थे सो चले घर.

उन्हें भूख लग आई थी. वह माता पार्वती से भोजन मांगने लगे.

देवी पार्वती ने कहा- पुत्र अभी थोड़ी देर बाद आओ तब भोजन देती हूं क्योंकि अभी मेरे पूरे शरीर धूल लगी है. मैं धूल-धूसरित हूं. जोर से गिरीं भी हूं इसलिए शरीर में दर्द हो रहा है. अभी औषधि का लेप लगाकर विश्राम कर रही हूं.

बाल गणेश ने सुना कि माता को चोट लगी है तो दुखी हो गए. उन्होंने पार्वतीजी से पूछा- माता आप कैसे गिर गईं. आपका शरीर धूल-धूसरित कैसे हो गया?

माता बोलीं- पुत्र जिस बिल्ली को तुमने घुमाकर फेंका, वह मैं ही थी. मैं मातृस्वरूपा हूं. संसार के सभी जीव मेरे अंश हैं. इसलिए किसी को कष्ट न दिया करो. तुम किसी भी जीव को कष्ट देते हो वह कष्ट मुझे ही होता है.

गणेशजी को बड़ा दुख हुआ कि उनके कारण माता को कष्ट हुआ.

माता ने तो बालगणेश की शरारतें कम करने और एक अच्छी बात सिखाने के लिए सीख थी थी पर यह सीख उलटी पड़ती दिखी.  गणपति जी ने माता की बात की अपने तरह से एक ऐसी व्याख्या कर ली कि माता के लिए पहले सी बड़ी समस्या पैदा हो गई.

गणेश जी इस बात को मन में गांठ बांधकर बैठ गए कि संसार के सभी जीव मेरी माता के ही अंश है. जब सभी जीव माता के अंश है तो मातृस्वरूप हो गए. इसलिए वह कभी विवाह नहीं करेंगे. सभी स्त्रियों को माता समान पूजेंगे.

इसी विचार में गणेश जी ने ब्रह्चारी रहने का विचार कर लिया. उन्हें शिवगणों से पूछा कि ब्रह्मचारी के लिए सबसे उत्तम कार्य क्या होता है. नंदी आदि गणों ने सोचा कि जिज्ञासावश पूछ रहे हैं बालगणेश सो उन्होंने बता दिया कि ब्रह्मचारी को ब्रह्म को साधना चाहिए. इसके लिए उसे पवित्र स्थल पर ध्यान तप आदि करना चाहिए.

गणपति को सुझाव अच्छा लगा. वह तप करने के लिए गंगातट पर पहुंचे और ध्यान लीन हो गए .

इसी बीच एक अन्य घटना हुई. असुरकुल में जन्मी तेजस्विनी वृंदा जिनका नाम तुलसी भी पड़ा, विवाह योग्य हुई. वृंदा इतनी तेजस्विनी थीं कि उनके योग्य कोई वर ही न था. गुरू के परामर्श पर वृंदा अपने लिए योग्य वर की तलाश में स्वयं निकलीं. सारे संसार में उन्हें अपने योग्य कोई वर नहीं मिला.

घूमते-घूमते तुलसी गंगातट पर पहुँची. वृंदा ने तप में लीन गणेश जी को देखा. उनके आकर्षक व्यक्तित्व और तप को देखकर वह उन पर मोहित हो गईं. गणेश जी को रिझाने के लिए वृंदा तरह-तरह के स्त्रियोचित प्रयास करने लगीं.  इस प्रयास में वृंदा का भी काफी समय व्यतीत हो गया पर गणेश जी का तप चलता रहा. वृंदा ने भी प्रयास न छोड़ा.

गणेश जी वृंदा के प्रपंच देख रहे थे. उन्हें आश्चर्य़ भी हो रहा था कि यह स्त्री इस प्रकार का आचरण आखिर क्यों कर रही है. आखिरकार उन्होंने वृंदा से पूछ ही लिया- देवी आप कौन हैं और यहां पर तरह-तरह के स्वांग क्यों रच रही हैं?

वृंदा ने अपना पूरा परिचय बताया. यह भी कहा कि पिता उनके योग्य वर नहीं खोज पाए इसलिए मुझे स्वयं अपने योग्य वर के तलाश में निकलना पड़ा है. सब जगह घूम आई पर कहीं योग्य वर नहीं मिला.

वृंदा ने विनीत भाव में कहा- आपको देखकर मेरा कार्य पूर्ण हुआ. मैं आप पर मुग्ध हूं. आपको प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के स्त्रियोचित भंगिमाएं बना रही थी. मैं सर्वगुणसंपन्न हूं. जितनी रूपवती हूं, उतनी ही विचारवान, कार्य-व्यवहार कुशल. मेरे पिता का कहना है कि संसार में मेरे रूप-गुण की बराबरी की स्त्री दूसरी नहींं. हे पार्वतीनंदन आप मुझसे विवाह कर मुझे कृतार्थ करें. मैं आपको उत्तम पत्नी की तरह हर प्रकार से प्रसन्न रखूंगी.

गणेश जी भी चक्कर में पड़ गए. ब्रह्मचर्य का विचार किया है. आया हूं तप के लिए यहां यह विवाह करना चाह रही है. इसकी बुद्धि फिर गई है, इसे समझा-बुझाकर भेजना होगा.

गणेश जी समझाने लगे- देवी आपके पिता ने अगर आपको सर्वगुणसंपन्न कहा है तो ठीक ही कहा होगा. उस पर कोई तर्क-वितर्क करना उचित नहीं है. परंतु हे देवी किसी ब्रह्मयोगी का ध्यान भंग करना अशुभ होता है. मैं ने ब्रह्मचारी रहने का विचार किया है. इसलिए अब मैं तपोलीन रहना चाहता हूं. मैं विवाह बंधनों में नहीं बंध सकता. आप जैसी योग्य कन्या के लिए वर की क्या कमी. कोई दूसरा वर खोज लें. मैं विवाह नहीं कर सकता.मेरी जैसी योग्य कन्या से विवाह का प्रस्ताव कोई कैसे ठुकरा सकता है, वृंदा का गर्व उसकी बुद्धि को ग्रसने लगा. गणेशजी ने तो शांत होकर अपनी विवशता बताई थी पर रूप के गर्व मे चूर वृंदा ने उसका तात्पर्य गलत लिया.

वृंदा क्रोध से तिलमिलाने लगीं. उसने गणेशजी को फिर कहा- आप मुझसे विवाह करें अन्यथा मैं आपको श्राप दे दूंगी.

गणेशजी ने अनसुना कर दिया तो वृंदा ने श्राप दिया- तुम्हें अपने ब्रह्मचारी होने का बड़ा मान है. तुम मुझ जैसी रूपवती और गुणी कन्या को ठुकरा रहे हो. मैं तुम्हें शाप देती हूं कि तुम्हारे एक नहीं दो-दो विवाह होंगे.

गणेशजी ने सुना तो आवाक रह गए. वृंदा ने उन्हें अकारण शाप दिया था. इससे उन्हें क्रोध आया. उन्होंने भी तुलसी को श्राप दिया.

गणेशजी बोले- तुम्हें अपने रूप और गुण पर बड़ा मान है. तुम कामोत्तेजित हो, विवाह के लिए इतनी लालायित हो. तुम पर असुर गुण हावी हुआ और अकारण मुझे शाप दिया. इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम्हारा विवाह असुर से होगा. तुम्हें जिस सुंदर शरीर पर इतना अभिमान है वह समाप्त हो जाएगा और तुम एक दिन वृक्ष बन जाओगी.

असुर से विवाह और वृक्ष बन जाने की शाप सुनकर वृंदा रोने लगीं. वह गणेशजी के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगीं. वृंदा के बार-बार याचना पर गणपति का क्रोध शांत हुआ.

गणेशजी बोले- मैं शाप को वापस तो नहीं लौटा सकता लेकिन शाप में ऐसा संशोधन कर सकता हूं कि यह शाप वरदान सिद्ध हो जाएगा. शाप भी तुम्हारे लिए आनंददायी हो जाएगा.गणेशजी ने तुलसी से कहा कि वृक्ष रूप में तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय हो जाओगी.

पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा होगी. जिस पूजा संस्कार में तुम्हारा प्रयोग नहीं होगा वह पूजा अधूरी रहेगी लेकिन मेरे पूजन में तुम्हारा प्रयोग वर्जित होगा. गणेशजी के शाप के कारण तुलसी का विवाह असुरराज जलंधर से हुआ. जलंधर दरअसल शिवजी का ही अंश था.

शिवजी ने एक बार इंद्र की परीक्षा लेने के लिए अवधूत का रूप धरा लेकिन इंद्र पहचान नहीं पाए और उनपर वज्र से प्रहार कर दिया.

शिवजी ने इंद्र को भस्म करने के लिए अपने ललाट से विशाल अग्निपुंज पैदा किया लेकिन ब्रह्मा आदि देवताओं ने प्रार्थनाकर उनका क्रोध शांत किया. शिवजी ने उस अग्निपुंज को समुद्र में फेंक दिया. सिंधु से मिलते ही वह अग्निपुंज ने एक शरीर धारण कर लिया.

सिंधु ने उसका लालन-पालन किया. वह सिंधुपुत्र असुरराज जलंधर बना जिससे तुलसी का विवाह हुआ. तुलसी के शाप से गणेश की दो पत्नियाँ ऋद्धि और सिद्धि हुईं.

उधर तुलसी का पति जलंधर असीमित शक्तियों का स्वामी बनकर अत्याचार करने लगा. वह शिवजी का अंश था. ब्रह्मा से उसने वरदान हासिल किया था. इसलिए रक्षा के लिए देवताओं ने शिवजी से प्रार्थना की.

बह्रमाजी ने तुलसी को भी वरदान दिया था कि उसके पति को तब तक कोई हरा नहीं पाएगा जब तक उसका पतिव्रत अखंड रहेगा. शिवजी और जलंधर का हजार साल तक युद्ध हुआ लेकिन तुलसी के सतीत्व के कारण उसे हराना संभव नहीं था.

देवताओं ने विष्णुजी से उपाय निकालने को कहा. आखिरकार विष्णुजी तुलसी का सतीत्व भंग करने को तैयार हुए.

वह अपने दो अनुचरों जय-विजय के साथ तुलसी के महल पहुंचे. जय-विजय ने ब्राह्मण का वेश लिया था और जाकर तुलसी को कहा कि जलंधर का वध हो गया है. उन दोनों ने जलंधर का कटा हुआ सिर भी दिखाया लेकिन तुलसी को विश्वास नहीं हुआ. तभी विष्णुजी जलंधर का वेश बनाकर तुलसी के पास पहुंचे.

पति के मौत की खबर से निराश तुलसी अचानक पति को देखकर इतनी खुश हो गई कि उसने जांच की जरूरत नहीं समझी. उसने जलंधर वेशधारी विष्णुजी को गले लगा लिया.

तुलसी का पतिव्रत भंग हो गया था. शिवजी ने जलंधर का वध कर दिया. अब तुलसी को पता चल गया कि यह उसका पति नहीं. तुलसी के कहने पर भगवान अपने रूप में आए.

तुलसी ने उन्हें शाप दे दिया कि जैसे मुझे पति वियोग हुआ है आपको भी मानव अवतार लेना पड़ेगा और पत्नी वियोग सहना पड़ेगा.

तुलसी का क्रोध अभी शांत नहीं हुआ था. उसने भगवान को एक और शाप दिया- आपका हृदय पत्थर का बना है इसलिए आप पत्थर हो जाइए.

जय-विजय को इस पाप का भागीदार होने के कारण तुलसी ने शाप दिया कि तुम श्रीहरि के पत्नी वियोग का कारण बनोगे. जय-विजय रावण और मारीच हुए जिन्होंने सीताहरण कर प्रभु को पत्नी वियोग दिया.

तुलसी के शाप के बाद सभी देवता वहां प्रकट हो गए और उन्होंने तुलसी से कहा कि इसमें प्रभु का दोष नहीं है. हमारी जिद पर उन्होंने ऐसा किया. आप उन्हें क्षमा कर दें.

तुलसी ने कहा- श्रीहरि पर शाप का असर तो तभी होता है जब वह उसे स्वीकार करें. मैंने अपने शाप से उन्हें मुक्त कर दिया है.

श्रीहरि बोले- मैं शाप स्वीकार करता हूं. मैंने तुलसी का पतिव्रत भंग किया इसलिए मैं इसे पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूं. यह धरती पर तुलसी के पौधे के रूप में पूजी जाएंगी औऱ मैं इनके चरणों में शालिग्राम बनकर पड़ा रहूंगा.

बिना तुलसी का भोग लगाए देव पूजा अधूरी रहेगी. प्रतिवर्ष मेरा और तुलसी के विवाह का आयोजन होगा उसके बाद ही मानव विवाह संस्कार आरंभ करेंगे. इसी कारण हर साल विष्णु भगवान के चतुर्मास विश्राम के बाद तुलसी विवाह कराया जाता है और उसके बाद विवाह शुरू होते हैं.

उधर तुलसी का शाप गणेशजी का पीछा भी कर रहा था और पीड़ित भी. गणेशजी को तो एक सुंदर लीला का बहाना मिल गया था. ब्रह्मचारी गणेशजी विवाह के लिए परेशान थे.

तुलसी के शाप के कारण गणेशजी का विवाह ऋद्धि-सिद्धि से हुआ. गणेशजी विवाह के लिए शापित थे. अब उनका शरीर भारी था साथ में शीश के स्थान पर हाथी का मस्तक, इसलिए न तो कोई देवकन्या न कोई ऋषिकन्या उनसे विवाह करने को राजी होती.

गणेशजी के सभी मित्रों का विवाह होता जाता था. इससे गणेशजी को ठेस लगी. गणेशजी देवों के विवाह में विघ्न डालने लगे. वह अपने वाहन चूहे को भेज देते.

चूहा देवों के बारात के रास्ते और मंडप के नीचे खुदाई कर देता. इससे मार्ग और मंडप धंस जाता. इस आपा-धापी में विवाह का शुभ मुहूर्त निकल जाता. गणेशजी इतने शक्तिशाली थे कि कोई देवता उनसे शिकायत की हिम्मत भी नहीं रखता था.

देवों ने ब्रह्माजी को परेशानी बताई.ब्रह्माजी हंसने लगे और उन्हें बताया कि यह सब वृंदा के शाप के कारण हो रहा है.

उन्होंने अपने पुत्र विश्वकर्माजी की सहायता ली और ऋद्धि-सिद्धि नामक दो कन्याओं से गणेशजी का विवाह कराया. गणेशजी की यह लीला कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण से है.उनके विवाह की कथा भी बड़ी रोचक है किसी और दिन विस्तार से सुनाउंगा. प्रभु शरणम् एप्प में इसे विस्तार से सुनाया था. आप प्रभु शरणम् एप्प ही क्यों नहीं डाउनलोड कर लेते. वहां ज्यादा सरलता से ऐसी अनगिनत कथाएं पढ़ पाएंगे. ऐप्प का लिंक नीचे है. क्लिक करके डाउनलोड कर लें.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

आप प्रभु शरणम् ऐप्प डाउनलोड कर लें. यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है. धर्मप्रचार का कार्य है. ऐप्प डाउनलोड के लिए प्रेरित इसलिए करता हूं क्योंकि वहां पोस्ट करना आसान है. दिन में कई पोस्ट देता हूं. वेबसाइट पर पोस्ट डालना एक टेढ़ा काम है. समय ज्यादा लगता है. आपके लिए लाभ की बात यह है कि ऐप्प की हर पोस्ट के बाद आपको नोटिफिकेशन का मैसेज भी आता है. इस तरह कोई पोस्ट छूट नहीं सकती. सभी महत्वपू्र्ण मंत्र, चालीसा, पूजा विधि, वेद-पुराण कथा, ज्योतिष, राशिफल, रामायण, हिंदू पंचांग सबकुछ है वहां. फिर क्यों नहीं उसे ही डाउनलोड करके लाभ लेना. 4 mb का छोटा सा ऐप्प हिंदुओँ के लिए बहुत उपयोगी है. फ्री है. डाउनलोड करने के बाद पसंद न आए तो डिलिट कर दीजिएगा, कौन से पैसे खर्च हो रहे हैं. लिंक नीचे है-

हिंदू धर्म से जुड़ी सभी शास्त्र आधारित जानकारियों के लिए प्रभु शरणम् से जुड़ें. धर्मप्रचार के लिए बना सर्वश्रेष्ठ हिंदू ऐप्प प्रभु शरणम् फ्री है.
Android मोबाइल ऐप्प डाउनलोड करने के लिए यहां पर क्लिक करें

धार्मिक अभियान प्रभु शरणम् के बारे में दो शब्दः 

सनातन धर्म के गूढ़ रहस्य, हिंदूग्रथों की महिमा कथाओं ,उन कथाओं के पीछे के ज्ञान-विज्ञान से हर हिंदू को परिचित कराने के लिए प्रभु शरणम् मिशन कृतसंकल्प है. देव डराते नहीं. धर्म डरने की चीज नहीं हृदय से ग्रहण करने के लिए है. तकनीक से सहारे सनातन धर्म के ज्ञान के देश-विदेश के हर कोने में प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से प्रभु शरणम् मिशन की शुरुआत की गई थी. इससे देश-दुनिया के कई लाख लोग जुड़े और लाभ उठा रहे हैं. आप स्वयं परखकर देखें. आइए साथ-साथ चलें; प्रभु शरणम्!
इस लाइऩ के नीचे फेसबुक पेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे. धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-

हम ऐसी कहानियां देते रहते हैं. Facebook Page Like करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा: Please Like Prabhu Sharnam Facebook Page

धार्मिक चर्चा करने व भाग लेने के लिए कृपया प्रभु शरणम् Facebook Group Join करिए: Please Join Prabhu Sharnam Facebook Group

error: Content is protected !!