कामदेव की राख से गणेश ने रचा भंड़ासुरः मां त्रिपुर सुंदरी अवतरण कथा
शिवजी ने कामदेव को भस्म किया और उसकी राख से गणेश जी ने कैसे बना दिया भंडासुर. शिवभक्त भंडासुर कैसे देवताओं को शत्रु हो गया. भंडासुर का अंत करने के लिए क्या करना पड़ा. क्या भंडासुर शिवजी की माया से रचा गया था. मूल प्रयोजन तो आदिशक्ति पराशक्ति मां ललिताम्बा का अवतरण था.
भंडासुर की यह कथा बड़ी रोचक और ज्ञानप्रद है.

धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-भगवान शंकर ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को जला तो दिया पर कामदेव की भस्म अनंत वर्षों के लिए वहीं पड़ी रह गयी. एक दिन गणेशजी खेलते-खेलते वहां पहुंचे और उस भस्म से एक मनुष्य जैसा आकार देने लगे. गणेश जी ने बढिया मूर्ति बनायी. देखते देखते ही वह पूरा आकार ले गयी.
एक जीते जागते बालक में बदल गयी. बालक भी कामदेव सरीखा सुंदर था. गणेश जी ने तो उसे प्रसन्नता से गले ही लगा लिया. गणेशजी ने उस बालक को शतरुद्रीय का उपदेश किया और उससे कहा- शिवशंकर की स्तुति करो.
बालक ने वैसा ही किया जैसा गणेशजी ने कहा था किया. शिवजी ने भी उसे देखा तो बड़े खुश हुए.
ब्रह्माजी जब उसे देखते तो उसे भंड-भंड कहकर पुकारते क्योंकि वह राख से बना था. भंड के दो मतलब होते हैं पहला कल्याण हो, तो दूसरा किसी के द्वारा अपमान या हंसी का पात्र बनो. भंड ने जीवन में दोनों का स्वाद चखा.
आगे चलकर उसका नाम भंडासुर रखा गया.
भंड भगवान शिव की मन लगाकर पूजा करता. एक दिन जब भगवान शिव ने देखा कि यह गणेशजी का बड़ा आज्ञाकारी है तो उन्होंने प्रसन्न हो कर कहा- जो मन चाहे वर आज मांग लो.
भगवान शिव के ऐसा कहने पर भंड़ ने कहा- मुझे वरदान दीजिये कि मैं देवता आदि किसी प्राणी के हाथों न मारा जाऊं.
महादेव ने उसे यह वरदान तो दिया ही साथ ही हर तरह के दिव्य अस्त्र-शस्त्र और साठ हजार साल के लिए राजसुख भी दे दिया.
औघड़दानी के इस वरदान की चर्चा स्वर्ग में फैली तो ब्रह्माजी ने फिर से कहा- भंड–भंड.
दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को भंड के इस वरदान की सूचना मिली. उन्हें भंड में अवसर नजर आया. शुक्राचार्य भंड के पास आए और उसे समझाया कि शिवजी के वरदान का उसे उपयोग करना चाहिए. इसके लिए उसे एक गुरू की जरूरत है. शुक्राचार्य भंड के गुरू बने और नाम दिया भंडासुर.
उन्होंने मय को बुलाया और शोणितपुर नामक नगरी को फिर से सजवाया. भंडासुर को उसका राजा बनाया गया.
शिवभक्त भंड़ासुर के राज में दैत्य भी धर्म-कर्म से चलते. भंडासुर खुद भी शिवजी की पूजा करता. जगह जगह वेद पाठ किए जाते. घर-घर यज्ञ होता. ऐसे ही धर्म-कर्म पूर्वक साठ हजार बरस बीत गए.
पर असुरों का साथ होने से धीरे-धीरे भंडासुर माया की चपेट में आ ही गया. भंडासुर की चार पत्नियां पहले से थीं, वह एक और दिव्य अप्सरा के प्रेम में पड़ गया. पहले भंडासुर के प्रिय मंत्री, फिर भंजासुर के सेवक और बाद में प्रजा भी विलासी बन गयी.
अब भंडासुर के शोणितपुर में भगवान शिव का कोई नाम लेवा था न कोई पूजा पाठ करता था.
दैत्यों के भय से अपना घर परिवार छोड़ बिल, खोह, पाताल समुद्र में रह रहे देवता यह पतन देख अपने घर लौट आए. बहुत दिनों बाद इंद्र भी सिंहासन पर बैठने का साहस कर पाए. उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाने की सोची. देवताओं ने उत्सव का आयोजन किया और उसमें पहुंचे नारद जी. नारद जी आएं और कुछ नया न हो, ऐसा कैसे संभव था.
नारदजी ने इंद्र पर तंज कस दिया.नारद बोले देवराज, कितने दिनों के लिए इस सिंहासन पर विराजेंगे. यह न भूलिए कि भंडासुर की मति फिरी है. अभी शुक्राचार्य तपोरत हैं. जिस दिन वह तप से उठेंगे, भंडासुर को समझाकर मार्ग पर ले आएंगे. फिर क्या होगा. आपके लिए तो यह चार दिन की चांदनी ही रह जाएगी.
आनंद में मगन इंद्र और सभी देवता ठिठक गए और नारदजी से उसका उपाय पूछा.
नारद ने सुझाया कि कोई ऐसा इंतज़ाम करो कि दैत्यों का भय हमेशा के लिए चला जाए. आप सब एक साथ आदिशक्ति, पराशक्ति की पूजा करो. नारद ने पराशक्ति को प्रसन्न करने की विधि भी समझा दी.
शुक्राचार्य को पता चल गया और वे तप रोकर भंडासुर के पास आए.
उन्होंने भंडासुर को समझाया- देवतागण हिमालय पर पराशक्ति की पूजा कर रहे हैं. यदि उन्होंने पराशक्ति को प्रसन्न करके मनचाहा वरदान मांग लिया तो तुम्हारा अनिष्ट होना तय है. अपना अस्तित्व देखना चाहते हो तो देवताओं की पूजा में विध्न डाल दो.

भंडासुर दल-बल लेकर देवताओं पर चढ बैठा. पर वह इससे पहले कि उनके समीप आ पाता इससे पहले ही पराशक्ति ने उसके और देवताओं के बीच दिव्य तेज की एक दीवार खड़ी कर दी. अब तो भंडासुर जल उठा.
उसने दानवास्त्र चलाया. दीवार टूट गयी. पर पलक झपकते ही दीवार फिर जस की तस थी. भंडासुर ने उस पर वायव्यास्त्र चला दिया. दीवार एक बार फिर टूटी पर तुरंत पहले जैसी हो गयी. इसी तरह जब कई बार हुआ. असफल भंडासुर झुंझलाकर शोणितपुर लौट आया.
भंड लौट तो गया पर देवता डर के मारे कांपने लगे कि अगर यह दीवार न रहेगी तो क्या होगा. दो ही रास्ते बचे या तो पराअम्बा को प्रसन्नकर उनका दर्शन और आशीर्वाद पाएं या भंडासुर के हाथों मारे जायें. देवताओं ने आराधना और बढा दी.
पराम्बा दिव्य कन्या रूप में प्रकट हुईं. ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी वहां पहुंचे. ब्रह्मा ने सोचा पराम्बा अगर यहीं रहें तभी रक्षा सम्भव है. इसके लिए उन्हें सांसारिकता में बांधा जाए.
उन्होंने सोचा क्यों न पराशक्ति का विवाह करा दिया जाए. अब पराम्बा से विवाह के लिए योग्य वर कौन हो जो उनके तेज को सहन कर ले?उनके जैसी तेजस्विनी को भगवान भोलेनाथ के अलावा और कोई वर ही नहीं सकता था. भगवान शिव ने अपने अंश से अत्यंत सुंदर युवक का स्वरूप प्रकट किया.
ब्रह्माजी ने उस युवक अवतार का नाम कामेश्वर रखा. पराशक्ति ने कामेश्वर को देखा. दोनों एक दूसरे पर मुग्ध हुए. शक्ति और शक्तिमान का मेल विवाह बंधन में बंध गया. उधर भंड़ासुर ने भीषण उत्पात मचा रखा था.
अब तो वह शिवजी और गणेशजी की भी नहीं सुनता था. आखिर पराम्बा ने माता ललिताम्बा का अवतार लिया. भंड़ासुर के साथ युद्ध छेड़ दिया. भंड़ासुर भी कम न था.
उसने एक से एक भयानक अस्त्रों का प्रयोग किया. माता ललिताम्बा ने सबको काट गिराया. भंड के रोग फैलाने वाले हथियार को ललिताम्बा ने मंत्रों वाले हथियार से बेकार कर दिया.एक समय ऐसा आया कि भंड ने माया से हिरण्याक्ष, हिरणाकश्यपु, रावण, कंस, महिषासुर जैसे असुरों को फिर से पैदा कर देवों को भयभीत किया तो ललिताम्बा ने अपने दसों नाखूनों से भगवान वाराह, नृसिंह, श्रीराम, श्रीकृष्ण, दुर्गा आदि का स्वरूप प्रकट कर दिया.
माता का मुख्य हथियार था- ईख का डंडा और कुछ फूल. अंततः माता ने काम तत्त्व से भरे और प्रेम बीज वाले कामेश्वर नाम के अस्त्र का प्रयोग किया और भंडासुर का संहार कर ही दिया. सारे देवता बहुत प्रसन्न हुए.
पराशक्ति मां ललिताम्बा दस महादेवियों में गिनी जाती हैं. इनका यह स्वरूप इतना मोहक है कि इन्हें माता त्रिपुर सुंदरी के नाम से भी पूजा जाता है.
(ब्रह्मांड्पुराण की कथा)
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