भागवत कथाः द्रोण-धरा ने ब्रह्मा से मांगा श्रीहरि के पुत्रवत प्रेम का वरदान, नंद-यशोदा के घर आए घनश्याम

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भगवान ने जबसे पूतना और तृणासुर का संहार किया तब से माता यशोदा अपने लल्ला को लेकर बहुत चिंतित रहने लगीं. वह उन्हें ज्यादातर अपने सीने से चिपकाए रखतीं. एक पल के लिए ओझल होने न देतीं.
नामकरण संस्कार के लिए गंगाचार्यजी ने बताया कि कंस तरह-तरह से पीड़ा पहुंचाने की कोशिश करेगा तब से माता और चिंतित हो गईं. लल्ला साधारण बालक नहीं है इसका अंदाजा तो पूरे व्रज को हो गया था. गोपियां भी दिनभर उन्हें घेरे रहतीं.
बलराम और श्रीकृष्ण अब थोड़े बड़े हो गए थे. वे अब ठुमकते चलते दूसरे गोपियों के घऱ भी पहुंच जाते. वहां भी तरह-तरह की क्रीडाएं करते जिनसे वे मुग्ध होतीं. सब प्रतीक्षा करतीं कि लल्ला उनके पास आएं.
भगवन ने सोचा क्यों न इनका आनंद थोड़ा और बढ़ाया जाए. वह बालसुलभ क्रीडा करने लगते. कभी किसी की गाय दूह लेते, बछड़े खोल देते तो किसी की मटकी फोड़ देते. कभी मक्खन चुराकर बंदरों को खिला देते.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.गोपियों हों या बंदर ये सब तो देवता ही थे जिन्होंने प्रभु के लीला रस का आनंद लेने के लिए अवतार लिया था. प्रभु किसी को अपूर्ण कैसे रखते भला! उनकी लीलाओं से पूरा व्रज आनंद में सराबोर था.
यशोदा मैया को उलाहने भी आते. अब प्रभु लीला करें और मैया तक बात न पहुंचे, फिर क्या लाभ. लगातार कन्हैया के उलाहने आने लगे. माता उन्हें समझातीं तरह-तरह की कसमें देकर शरारत नहीं करने का वचन लेतीं, पर लीलाधर लीला छोड़ दें!
एक दिन बालकों ने आकर यशोदाजी से शिकायत की कि कान्हा ने मिट्टी खा ली है. माता भागी आईँ कि कहीं लल्ला को कोई रोग न हो जाए. उन्होंने कन्हैया को डांटा तो उन्होंने तो साफ मना कर दिया कि मैया मैंने तो माटी खाई ही नहीं.
माता ने सोचा कन्हैया के मुख से माटी निकालकर ही दिखा दूं. उन्होंने गोद में बिठाया और मुंह खोला. मुख के अंदर उन्हें सारा चर अचर जगत दिखाई पड़ने लगा. सारी सृष्टि उसमें समाई हुई थी. माता तो देखती ही रह गईं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.यशोदा जी ने नारायण का अवतार समझकर उन्हें विधिवत प्रणाम किया. प्रभु ने माया फैलाई और माता को ममता रस से सराबोर कर दिया. उनकी स्मृति से वह सब निकाल दिया जो उन्होंने देखा था.
शुकदेवजी ने जब राजा परीक्षित से प्रभु की इस लीला का वर्णन आरंभ किया तो उनके मन में कौतूहल हुआ. उन्होंने शुकदेव से पूछा- मुनिवर नंदजी और यशोदाजी ने ऐसा क्या पुण्य किया था जो उन्हें ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ?
शुकदेवजी ने बताया- नन्दबाबा पूर्वजन्म में द्रोण नामक वसु थे. उनकी पत्नी का नाम था धरा. दोनों ने ब्रह्माजी से मांगा- जब हम पृथ्वी पर जन्म लें, तब जगदीश्वर श्रीहरि हमारे घर में पुत्र रूप में रहकर हमारा जीवन सार्थक करें.
ब्रह्माजी ने द्रोण और धरा को अभीष्ट वरदान दे दिया. द्रोण ब्रज के राजा नन्द हुए और धरा इस जन्म में उनकी पत्नी यशोदा हुईं. ब्रह्माजी का वरदान पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण ब्रज में रहकर ब्रजवासियों को अपनी लीला से आनन्दित करने लगे.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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