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भागवत कथाः प्रजापति को था पुत्ररूप में आने का वरदान, श्रीकृष्ण स्वरूप में आ गए भगवान

भागवत कथाः प्रजापति को था पुत्ररूप में आने का वरदान, श्रीकृष्ण स्वरूप में आ गए भगवान

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आकाश में ग्रह और नक्षत्रों अधीरता से प्रतीक्षा कर रहे थे कि किस मुहूर्त और काल में श्रीहरि माता देवकी के गर्भ से प्रकट होते हैं. समस्त आकाश मंडल अप्सराओं और गंधर्वों द्वारा किए जा रहे गान और वादन से गूंज रहा था.

भाद्रपद मास में कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि में भगवान ने गर्भ का त्याग किया और साक्षात प्रकट हुए. चतुर्भुझ भगवान शंख, चक्र, गदा, पदम से सुशोभित बालरूप में थे.

उनके तेज से कारागार में रात में दिन के समान प्रकाश हो गया. वसुदेव साक्षात उनके चरणों में गिर गए. भगवान आ गए हैं यह सोचकर कारागार में भी उनका मन ऐसे प्रसन्न हो रहा था जैसे वह संसार के एकछत्र राजा है.

माता देवकी बोलीं- प्रभु आपका चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन तो पापियों के भी समस्त पापों का अंत करने वाला है. इसलिए हे प्रभु आप इस रूप को समेटकर बालरूप धर लें क्योंकि आपका दुर्लभ चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन तो उन्हें ही प्राप्त हों जो ध्यान करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भगवान ने वसुदेव-देवकी से कहा- स्वयंभावु मन्वतंर में आपका पहला जन्म हुआ था. देवकी आप पृष्णि थीं और वसुदेवजी आप सुतपा प्रजापति थे. ब्रह्माजी ने आप लोगों को संतान उत्पत्ति का आदेश किया तो आप लोगों ने मुझे संतानरूप में पाने की इच्छा जताई.

ब्रह्माजी ने आपको आदेश किया कि आप तप से मुझे प्रसन्न करें. आप दोनों ने ऐसा घोर तप किया जो आसाधारण था और सामान्य लोगों के लिए संभव ही नहीं था. आखिरकार मैंने आप दोनों को दर्शन दिए.

आप दोनों संतानहीन थे. आपने मुझसे मोक्ष के स्थान पर मेरे जैसे पुत्र की तीन बार याचना की. मैंने आपकी याचना स्वीकार ली. आप संतान प्राप्ति हेतु विषय भोग में रत हो गए.

मैंने बहुत विचार किया लेकिन मुझे ऐसा कोई नजर नहीं आया जो मेरे ही समान हो. अंततः मुझे स्वयं आपके गर्भ में आना पड़ा. उस समय मैं पृश्निगर्भ के नाम से विख्यात हुआ.

अगले जन्म में आप अदिति हुई और वसुदेव आप कश्यप हुए. आपने अपने पुत्रों के उद्धार के लिए फिर से मेरी स्तुति की और पुत्ररूप में आकर कल्याण करने की याचना की. मैंने वामन रूप में आपके गर्भ से जन्म लिया. इंद्र के अनुज रूप में होने से उपेन्द्र भी कहलाया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तीसरे जन्म में भी मैं स्वयं आया हूं. इस जन्म में मैंने आपको अपना स्वरूप इसलिए दिखाया ताकि आपको मेरे द्वारा मिले वरदान और मेरे पूर्व अवतारों का स्मरण हो जाए. आप लोग मेरे साथ पुत्रभाव ही रखते हुए ब्रह्मनिष्ठ हों तो मोक्ष प्राप्त होगा.

प्रभु ने फिर अपना रूप समेट लिया और बालक रूप में हो गए. उनकी योगमाया के प्रभाव से वसुदेव और देवकी उन्हें ईश्वररूप के स्थान पर पुत्ररूप में देखने लगे.

जो पिता कुछ पल पूर्व संसार में स्वयं को सर्वसमर्थ महसूस कर रहा था अब उसे भय होने लगा कि कहीं कंस उनके पुत्र का वध न करे दे. कंस के बंदी वसुदेव श्रीहरि की रक्षा के लिए चिंतित होने लगे. यही तो प्रभु की माया है.

उधर प्रभु के आदेश पर योगमाया ने नंदबाबा के घर में जन्म लिया. योगमाया के प्रभाव से बंदीगृह के रक्षकों पर मूर्च्छा आ गई. कारागार के दरवाजे स्वयं खुल गए. वसुदेवजी प्रभु की प्रेरणा से उन्हें एक टोकरी में रखकर नंदबाबा के घर की ओर चल पड़े.

योगमाया ने कंस को कैसे आभास करा दिया कि उसकी मृत्यु का कारण अवतार ले चुका है. कंस ने देवकी वसुदेव को कारागर से मुक्त करने के बाद क्या किया. यह कथा आपको अगले भाग में सुनाउंगा.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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