घमंड से ज्ञान नष्ट हो जाता हैः श्वेतकेतु की कहानी

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उद्दालक ऋषि का पुत्र श्वेतकुतु था तो बहुत होशियार लेकिन उसका पढ़ने में ज्यादा मन नहीं लगता था. 12 साल की उम्र तक खेलकूद में ही लगा रहा. लेकिन पिता के समझाने के बाद उसने 12वें साल से पढ़ाई शुरू की और अगले 12 वर्षों में वेद-शास्त्रों का जमकर अध्ययन किया.
जब वह घर लौटा तो उसे अपनी बुद्धिमानी पर झूठा घमंड हो चुका था. उसे ऐसा लगने लगा कि वह संपूर्ण वेद-शास्त्रों का ज्ञाता है और वह अपने पिता से भी ज्यादा ज्ञानी बन चुका है. इसी अभिमान के कारण घर लौटने पर उसने अपने पिता को प्रणाम तक नहीं किया.
विद्या से विनम्रता आती है लेकिन अगर विद्या हासिल करने के बाद विनम्रता समाप्त हो जाए तो सारा ज्ञान बेकार चला जाता है. महर्षि उद्दालक समझ गए कि उनके बेटे को अपने ज्ञान पर घमंड हो चुका है इसलिए उसने प्रणाम नहीं किया. उन्होंने निश्चय किया कि वह अपने बेटे को सही राह दिखाएंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.महर्षि ने अपने बेटे से कहा, “तुम तो सारे संसार का ज्ञान हासिल कर चुके हो. मेरे एक साधारण से प्रश्न का उत्तर दो. वह कौन सी वस्तु है जिससे जिसके ज्ञान से सभी जीवों का ज्ञान हो जाता है.”
श्वेतकेतु ने बहुत सोचा लेकिन उसे उत्तर नहीं सूझ रहा था. उसका सारा घमंड पल भर में चूर हो गया. वह अपने पिता के पैरों में गिरकर बोला, “मुझे इसका उत्तर नहीं पता. कृपया आप ही बताइए.”
महर्षि बोले, “जिस प्रकार मिट्टी के बारे में अगर पूरी जानकारी हो तो उसपर चाहे कोई कितना भी रंग-रोगन कर दे लेकिन यह बताया जा सकता है कि वह घड़ा, सुराही या कोई और वस्तु मिट्टी से बनी है.
सोने का ज्ञान रखने वाला आसानी से बता सकता है कि सोने से कौन-कौन से आभूषण बनाए जा सकते हैं. उसी प्रकार सभी जीवों का संबंध आत्मा से है. अगर आत्मा का ज्ञान हो तो सबका ज्ञान हो जाता है.”हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मुनि ने अपने पुत्र को समझाया कि जैसे समुद्र का जल भाप बनकर, बादल बन जाता है और फिर उसी बादल से वर्षा होती है और पानी नदियों में जाता है. नदियों से वह जल समुद्र में वापस चला आता है. उसी प्रकार सभी जीवों में एक आत्मा होती है.
वह कभी नहीं मिटती. बस आकार बदलती रहती है. इसलिए अगर आत्मा का ज्ञान हो जाए तो सभी जीवों के सुख-दुख का ज्ञान हो सकता है. आत्मा का संबंध ईश्वर से है. ईश्वर तक पहुंचने के लिए भक्ति की जरूरत है. भक्ति के लिए इंसान को सरल और विनम्र होना चाहिए.
श्वेतकेतु समझ चुका था कि थोड़े ज्ञान से उसमें जो घमंड आ गया था उसने इसकी बुद्धि हर ली थी जिसके कारण वह इस सामान्य बात को नहीं समझ पा रहा था.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम्
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