भागवत कथाः श्रीकृष्ण और बलराम का नामकरण संस्कार

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कंस के भेजे पूतना और तृणावर्त राक्षसों का श्रीकृष्ण ने उद्धार कर दिया. अपने बालक के साथ लगातार होते अपशकुन से यशोदा मैया घबराई थीं. वह तरह-तरह के उपाय करतीं.
गंगाचार्य यदुवंशियों के कुल पुरोहित थे. वसुदेवजी ने उनसे प्रार्थना की कि वह गोकुल जाकर नंदजी के पुत्रों का नामकरण संस्कार करा दें. श्रीगंगाचार्य समझ गए कि ये वसुदेव के ही पुत्र हैं. उन्होंने इस बात को गोपनीय रखने का वचन दिया और व्रज गए.
नंदजी उन्हें देखकर बड़े प्रसन्न हुए. नंदजी ने उनसे दोनों बच्चों के नामकरण आदि संस्कार संपन्न कराने की विनती की. गंगाचार्य आए तो थे इसी कार्य से लेकिन उन्हें यह बात प्रकट भी नहीं करनी थी.
गर्गाचार्यजी ने कहा- मैं यदुवंशियों का पुरोहित हूं. नामकरण संस्कार कराने से कंस यह मानने लगेगा कि ये देवकी के ही पुत्र हैं. वह पहले से बी घबराया हुआ है. तुम्हारी व वसुदेव की मैत्री है. वह दुर्बुद्धि इन्हें वसुदेव पुत्र मानकर इनके अहित का प्रयास करेगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
देवकी की आठवीं संतान पुत्री थी और उसने कंस से कहा था- उसको मारने वाला जन्म ले चुका है. यदि मैं नामकरण संस्कार करवा दूंगा तो मुझे पूर्ण आशा है कि वह इन बच्चों को मार डालेगा और व्रजवासियों का अनिष्ट करेगा.
नंदजी को गंर्गाचार्यजी की बात समझ में आ गई लेकिन वह ऐसे विद्वान महात्मा के हाथों ही नामकरण संस्कार कराना चाहते थे. नंदजी ने कहा-यदि ऐसा है तो एकान्त स्थान में चलकर इनके द्विजाति संस्कार करवा दें. मैं किसी को न्योता न दूंगा.
नंद के प्रस्ताव से गर्गाचार्य प्रसन्न हो गए और उन्होंने एकान्त में चुपचाप दोनों बच्चों का नामकरण करवा दिया. उन्होंने अपना अभीष्ट भी पूरा किया और वसुदेवजी को दिया गोपनीयता का वचन भी रख लिया.
गर्गाचार्यजी ने कहा- रोहिणी का यह पुत्र गुणों से अपने लोगों के मन को प्रसन्न करेगा. अतः इसका नाम राम होगा. यह असीमित बल का स्वामी है इसलिए इसे बल भी कहा जाएगा. बल और राम के साथ इसे बलराम नाम भी मिलेगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
यदुवंशियों की आपसी फूट मिटाकर उनमें एकता स्थापित करेगा, अतः इसे संकर्षण भी कहा जाएगा. बलराम को योगमाया ने देवकी के गर्भ से खींच लिया था इसलिए भी वह संकर्षण कहे जाते हैं.
गंगाचार्य ने यशोदा और नंदजी से कहा- तुम्हारा पुत्र अवतार ग्रहण करता रहता है. कभी इसका वर्ण श्वेत, कभी लाल, कभी पीला होता है. इस बार कृष्णवर्ण का हुआ है अतः इसका नाम कृष्ण होगा.
तुम्हारे पुत्र के नाम और रूप गिनती के परे हैं. उनमें से गुण और कर्म अनुरूप कुछ को मैं जानता हूँ। दूसरे लोग यह नहीं जान सकते. यह गोकुल को आनंदित करता हुआ तुम्हारा कल्याण करेगा. इसके द्वारा तुम भारी विपत्तियों से भी मुक्त रहोगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
यह सबके लिए वंदनीय होगा. इसके कृपापात्रों को शत्रु पराजित नहीं कर सकेंगे जिस तरह विष्णु के भजने वालों को असुर नहीं पराजित कर सकते. तुम्हारा पुत्र सौंदर्य, कीर्ति, प्रभाव आदि में विष्णु के सदृश होगा. अतः इसका पालन-पोषण सावधानी से करना.
इस प्रकार कृष्ण के विषय में आदेश देकर गर्गाचार्य अपने आश्रम को चले गए.
कल श्रीकृष्ण और बलरामजी की बाल लीलाओं की कथा सुनाउंगा. प्रभु का मिट्टी खा लेना और माता को उनके मुख में समस्त संसार के दर्शन का प्रसंग बड़ा रोचक है. इस पर कल चर्चा करेंगे.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली