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संतान के मार्ग में आई कुम्हार के आँवे जैसे विघ्नों से बचाते है श्रीगणेशः माघी तिल चतुर्थी व्रत

संतान के मार्ग में आई कुम्हार के आँवे जैसे विघ्नों से बचाते है श्रीगणेशः माघी तिल चतुर्थी व्रत

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे भी आपको पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इसका लिंक इसी लाइन के नीचे में है.संकष्ठि गणेश चतुर्थी को बहुत फलदायी व्रत माना जाता है. खासतौर से संतान के सुख के लिए इसका बड़ा माहात्म्य कहा गया है. 27 जनवरी को है यह चतुर्थी. आपको इसकी पूरी पूजा विधि और दो प्रचलित व्रत कथाएं हम इस पोस्ट में बताएंगे.

गणेश-पूजन विधिः

माघ मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को संकष्टि गणेश चतुर्थी या तिल चतुर्थी के नाम से जाना जाता है. भाद्रपद मास और माघ मास की चतुर्थी सभी चतुर्थियों में विशेष उत्तम बताई गई है.

यह व्रत महासंकट का नाश करने वाला और सभी मनोकानाओं को पूरा करने वाला है. इस दिन श्रद्धा से एकदंत गजानन का पूजन करने से सात माह के अंदर ही इच्छित फल की प्राप्ति हो जाती है.

जिन्हें किसी कारण अपने संतान को लेकर बहुत चिंता है, संतान की विद्य़ा और उन्नति में बाधा दिख रही है उन्हें यह व्रत करना चाहिए. संतान को जलते भट्टे जैसे संकट से निकालकल से आने वाली महिमा इस व्रत की बताई गई है.

प्रथमपूज्य गणेशजी विद्याबुद्धि के देवता तो हैं ही इस चतुर्थी को उनकी पूजा करने वाली माताओं के संतान की रक्षा करते हैं.

तिल चौठ को साफ-सुथरे लाल वस्त्र धारणकर, अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें. तत्पश्चात स्वच्छ आसन पर बैठकर भगवान गणेश का पूजन करें.
लाल रंग के फूल, अक्षत, तिल के लड्डु आदि से भगवान गणपति की आराधना करें.

लाल रंग के फल, लाल फूल, रौली, मौली, अक्षत, पंचामृत आदि से श्रीगणेश को स्नान कराएं. धूप-दीप आदि से श्रीगणेश की आराधना करें.

गणेशजी को तिल से बनी वस्तुओं, तिल-गुड़ के लड्डूत तथा मोदक का भोग लगाएं.

गणेशजी को दूर्वा के साथ तिल के लड्डू भी चढ़ा दें.

इसके बाद संकष्टि गणेश चतुर्थी की कथा पढ़ें अथवा सुनें और सुनाएं.

तत्पश्चात गणेशजी की आरती करें.

एक माला (108 बार) “ऊं गं गणपत्ये नमः” मंत्र का जप करने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें.

व्रत के बाद प्रसाद स्वयं भी ग्रहण करें और सभी को दें. दूध, मिष्ठान्न, फल-फूल आदि का सेवन कर सकते हैं. अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद भगवान की पूजा कर पारण कर लें.

व्रत की प्रचलित कथाएं आगे के पन्नों पर देखें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें. [fblike]

इसके बाद गणेश चतुर्थी की यह संक्षिप्त व्रत कथा सुनें-

गणेश चतुर्थी व्रत की कथा आरंभ करते हुए गणेशजी माता पार्वती से कहते हैं- सर्वसिद्धिदायिनी में विधानपूर्वक गणेश पूजन करने से अनेक शुभफल प्राप्त होते हैं. गुरु परंपरा का पालन करते हुए हर महीने अलग-अलग नामों से मेरी आराधना करनी चाहिए.

वे नाम क्रमशः हैं- वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णापिन्दाक्षम, गजवक्त्रं, लम्बोदरं, विकट, विघ्नाराजेंद्रम, धूम्रवर्ण, भाल्चंद्रम, विनायक, गणपति और गजानन.

गणेशजी माता पार्वती को संकष्टि चतुर्थी की कथा सुनाते हुए कहते हैं- सतयुग में नल नामक प्रतापी राजा थे और उनकी परम रूपवती पत्नी दमयंती थीं. भाग्यवश शाप के कारण नल का दमयंती से वियोग हो गया. उनकी पत्नी ने इस व्रत के प्रभाव से अपने पति को पुनः प्राप्त किया.

जगदंबा ने पार्वती से पुनः प्रश्न किया- हे पुत्र विनायक ! दमयंती ने किस विधि से उत्तम व्रत किया जिससे सातवें महीने में ही उसने अपने संतान के साथ पति को प्राप्त कर लिया.

अपनी माता के प्रश्न को सुनकर गणेशजी ने कहा- हे माता राजा नल दैवयोग से घोर विपत्ति में पड़ गए. हाथी घोड़े, धन-संपत्ति आदि सभी चल-अचल वस्तुओं का नाश हो गया.

मंत्री लोग छोड़कर चले गए. द्युत क्रीडा में हारे हुए व्यक्ति के समान राजा भी अपना सब कुछ गंवा चुके थे. अपने राज्य को नष्ट हुआ जानकर वह रानी दमयंती के साथ वन को चले गए.

जंगल में नल अनेक प्रकार की यातनाएं भोगते रहे और अंत में अपनी पत्नी के साथ भी उनका वियोग हो गया.

किसी नगर में जाकर नल किसी तरह अपना जीवन कष्टों में भरकर बिताने लगे. उनकी पत्नी अन्य स्थान पर भीख मांगते हुए घोर कष्ट का जीवन बिता रही थीं परस्पर वियोग में रहकर वे दोनों अपने कर्मो का फल भोग रहे थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें. [fblike]

संयोगवश एक दिन दमयंती की शरभंग ऋषि से भेंट हुई. दमयंती ने ऋषि से पूछा- हे ऋषिवर कृपा कर मुझे यह बताइए कि अपने पति तथा पुत्र से मेरा किस प्रकार से पुनः मिलन हो सकता है.

राज्य तथा अपने धन संपत्ति की किस प्रकार से पुनः प्राप्ति हो सकती है. इसके अतिरिक्त मैं यह भी जानने को उत्सुक हूं कि आखिर किस पाप के कारण भाग्य ने मुझे ऐसे दिन दिखाए हैं.

गणेशजी ने माता पार्वती से कहा- हे माता! दमयंती के वचनों को सुनकर शरभंग ऋषि ने कहा, हे दमयंती! सुनो मैं तुम्हारे हित की दृष्टि से कहता हूं. भाद्रपद मास और माघ मास की चतुर्थी जो संकष्ट चतुर्थी के नाम से विख्यात है.

यह व्रत महासंकट का नाश करने वाला और सभी मनोकानाओं को पूरा करने वाला है. इस दिन श्रद्धा से एकदंत गजानन का पूजन करने से सात माह के अंदर ही इच्छित फल की प्राप्ति हो जाती है.

गणेशजी ने पार्वतीजी से कहा- हे माता! दमयंती ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत को भाद्रपद मास से आरंभ किया और सात महीने में ही उन्हें अपने पति तथा राज्य की फिर से प्राप्ति हुई और वे सुखमय जीवन बिताने लगे.

(यह कथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पंचांग से ली गई है. इसके अतिरिक्त भी कई गणेश कथाएं हैं जिनका श्रवण चतुर्थी को करने से गणेशजी प्रसन्न होते हैं. अगले पेज पर पढ़ें गणेशजी द्वारा जलते आंवे से बच्चे को बचाने वाली चतुर्थी की एक अन्य प्रचलित व्रत कथा)

अगले पेज पर तिल चतुर्थी की एक और प्रचलित व्रत कथा. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

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इसके अलावा गणेश संकष्ट चतुर्थी व्रत की एक अन्य कथा है जो प्रचलित है-

प्राचीन समय में एक नगर में एक कुम्हार एक राज्य के सभी बर्तन बनाता था. जिसमें मिट्टी के बर्तन पकाए जाते हैं उसे आँवा कहते हैं. आँवा लगाने के एक वर्ष में बर्तन पक कर तैयार होते थे.

एक बार उस कुम्हार ने आँवा लगाया परन्तु बर्तन पके ही नहीं. इससे वह कुम्हार परेशान होकर राजा के पास गया. राजा ने आँवा ना पकने का कारण राजपण्डित से पूछा.

राज पण्डित ने कहा कि जब भी आँवा लगाया जाएगा तब एक बच्चे की बलि देने से आँवा पकेगा अन्यथा आँवा नहीं पकेगा| राजा ने आज्ञा दी कि प्रत्येक वर्ष एक घर से एक बच्चे की बलि दी जाएगी. इस प्रकार आँवा पकाने के लिए हर वर्ष एक बच्चे की बलि देने का प्रचलन चल पडा़.

कुछ वर्षों बाद राज्य में रहने वाली एक बुढि़या के बेटे की बलि की बारी आई. बुढि़या का उसके बेटे के अलावा कोई अन्य सहारा नहीं था. बुढि़या को अपने बेटे के जाने का बहुत दु:ख था.

वह सोचने लगी कि मेरा तो एक ही बेटा है और वह भी मुझसे जुदा हो जाएगा. उसने अपने कलेजे पर पत्थर रख कर अपने बेटे को बलि के लिए भेज दिया. बुढि़या ने उस दिन संकष्ट चतुर्थी का व्रत रखा हुआ था.

उसने अपने बेटे के हाथ में थोडे़ से तिल देकर कहा कि जब तुम आँवे में बैठोगे तब अपने चारों ओर यह तिल डाल देना बाकि भगवान गणेश पर छोड़ देना वो जैसा चाहेगें वैसा करेंगें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें. [fblike]

उस दिन वह स्वयं भगवान गणेश की पूजा करती रही और रो-रो कर यही प्रार्थना करती रही कि मेरे बच्चे कि रक्षा करना. उसके बेटे ने अपनी माँ के दिए तिलों को आँवे में बैठने के बाद अपने चारों ओर बिखेर दिया और भगवान गणेश का ध्यान करने लगा.

आँवे में मिट्टी के बर्तनों को पकने में एक वर्ष का समय लगता था परन्तु उस दिन एक दिन के बाद ही आँवा ठण्डा हो गया और बर्तन पक गए. कुम्हार को बहुत हैरानी हुई कि यह कैसे हुआ.

उसने आँवा हटाया और यह देखकर हैरान हो गया कि बुढि़या का बेटा जीवित बैठा है और गणेश जी का ध्यान कर रहा है. उसके साथ नगर के अन्य बालक भी जीवित थे.

कुम्हार ने राजा को इस बात की सूचना दी. राजा ने सम्पूर्ण वृतान्त के बारे में बुढि़या के बेटे से पूछा, उसने अपनी माँ द्वारा रखे गये उपवास तथा गणेश जी की महिमा के बारे में बताया.

सारी बातें जानने के पश्चात राजा ने बुढि़या तथा उसके बेटे को बहुत से उपहार और इनाम दिए. साथ ही सारे नगरवासियों से निवेदन किया कि अपने परिवार और राज्य की रक्षा के लिए माघ मास की कृष्ण पक्ष की गणेश संकष्ट चतुर्थी का व्रत करें. इससे सभी की बाधाएं दूर होगी तथा मनोकामनाएं भगवान गणेश पूर्ण करेंगें.

।।श्री गणेशाय नमः।।
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