श्रीराम के दरबार में ये कैसा दंड
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे भी आपको पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इसका लिंक इसी लाइन के नीचे में है.भगवान श्रीराम अयोध्यापति के सिंहासन पर आसीन अपनी राजसभा में विराजमान थे. प्रभु प्रतिदिन विश्राम के लिए जाने से पहले यह पक्का कर लेते थे कि कहीं कोई फरियादी अपनी गुहार लगाने को बाकी न रह गया हो.
श्रीराम ने विश्राम के लिए उठने ले पूर्व लक्ष्मणजी से कहा- भाई लक्ष्मण एक बार बाहर अच्छे से देख लो कि कहीं कोई खड़ा तो नहीं. न्याय की आस में खड़ा कई दिखे, चाहे वह मानव हो या पशु, उसे तत्काल सम्मान के साथ लेकर आओ.
लक्ष्मणजी राजसभा से बाहर गए और अच्छे से देखा. उन्हें कोई मनुष्य तो प्रतीक्षारत नहीं दिखा परंतु दरवाजे पर एक कुत्ता रोता हुआ दिख गया.
लक्ष्मणजी को बड़ा अचंभा हुआ. श्रीराम के दरबार के बाहर एक कुत्ता विलाप क्यों कर रहे हैं, उन्होंने कुत्ते से पूछा कि क्या तुम्हें कोई परेशानी है. यदि है तो चलो, स्वयं अयोध्यापि श्रीराम तुम्हारे कष्ट दूर करेंगे.
लक्ष्मणजी की बात सुनने के बाद भी वह कुत्ता दरबार के भीतर आने से मना करता रहा. लक्ष्मणजी बार-बार कहने लगे तो कुत्ते ने शास्त्रों की बात शुरू कर दी.
कुत्ते ने तर्क दिया- हे रघुकुल के कुलरत्न लक्ष्मणजी मैं अधम योनि में पैदा हुआ हूं. राजा साक्षात धर्म का रूप होता है. इसलिए मेरा राजमहल में प्रवेश करना धर्म के विरूद्ध होगा. मैं इसी कारण अंदर नहीं जा रहा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें. कुत्ता ऐसी ज्ञान की चर्चा कर रहा है, लक्ष्मणजी की तो आंखे फटी ही रह गईं. वह समझ गए कि कोई साधारण बात नहीं है.
लक्ष्मणजी ने कुत्ते को वहीं कुछ पल प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया और लपककर दरबार के अंदर पहुंचे. वहां उन्होंने भगवान को कुत्ते की कही सारी बात बता दी.
प्रभु ने कहा- न्याय की आस में राजा के सामने प्रस्तुत होना प्रत्येक जीव का अधिकार है, चाहे वह किसी योनि का क्यों न हो. यह पूरी तरह से धर्मसंगत है. जाकर कहो कि मैंने स्वयं उससे अंदर आने का अनुरोध किया है.
लक्ष्मणजी ने प्रभु का संदेश जाकर सुना दिया तो कुत्ता स्वयं को धन्य महसूस करता दरबार में आया. प्रभु को यथाविधि अभिवादन किया और खड़ा हो गया.
उसके सिर में चोट लगी थी, खून बह रहा था. उसी दर्द के कारण वह विलाप कर रहा था.
श्रीराम ने कहा- तुम कुल का विचार त्याग दो औऱ निडर होकर अपना कष्ट कहो. यहां किसी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं तुम्हें पूरा न्याय मिलेगा.
कुत्ते ने कहा- प्रभु सर्वार्थसिद्धि नामक एक भिक्षु ने बिना अपराध मेरे सिर पर लाठी से प्रहार किया. इससे मैं घायल हो गया हूं. मैं इसके इंसाफ के लिए आपके पास आय़ा हूं. मुझे न्याय प्रदान करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें. भगवान ने भिक्षु को बुलवाया और उससे पूछा कि बिना बात उसने कुत्ते को लाठी क्यों मारी?
भिक्षु बोला- मैं भिक्षाटन के लिए जा रहा था. यह कुत्ता कई बार रास्ते में आ गया. भूख से व्याकुल होने के कारण मेरा दिमाग स्थिर न था. मुझसे अपराध तो हुआ है. आप जो चाहें दंड दें, मुझे स्वीकार है.
भिक्षु की बात सुनकर श्रीराम ने सभासदों से उसके लिए दंड तय करने को कहा.
सभी मंत्रीगणों की राय थी कि भिक्षु तो दंड से परे होता है इसलिए हमारा दंड तय करना उचित न होगा. पर कुत्ता यदि चाहता है कि इसे दंडित किया जाए तो दंड का निर्धारण पीड़ित कुत्ता स्वयं ही तय करे.
भगवान ने कुत्ते से पूछा तो वह इस बात के लिए सहमत दिखा. उसने कहा- प्रभु यदि आप चाहते हैं कि मैं दंड तय करूं तो फिर इस भिक्षु को कालंजर मठ का मठाधीश बना दीजिए.
इस दंड की बात सुनकर सभी को घोर आश्चर्य हुआ. एक भिक्षु को मठ का अधिपति बना देना यह कैसा दंड है. शायद दिमाग पर चोट लगने से कुत्ते की मति फिर गई है.
श्रीराम ने भिक्षु को कालंजर का कुलपति नियुक्त करके सम्मानपूर्वक मठ में भेज दिया. सभासद अपना कौतूहल रोक नहीं पा रहे थे. उन्होंने आखिरकार पूछ ही लिया कि क्या सचमुच यह दंड है?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें. उन्होंने कहा- पशु तुमने तो भिक्षु को दंड के स्थान पर पुरस्कार दे दिया.
कुत्ता बोला- उसे दंड ही मिला है. आपने दंड का रहस्य नहीं समझा इसलिए ऐसा कह रहे हैं.
कुत्ते ने दंड का रहस्य बताया- मैं पूर्व जन्म में मठ का अधिपति था. हालांकि मैं अतिथियों का सत्कार करने वाला, सबके हित की चिंता करने वाला, प्रभु भक्ति में रमा व्यक्ति था फिर भी कुलपतित्व के दोष से मुझे कुत्ते की योनि मिल गई.
यह भिक्षु तो अत्यंत क्रोधी, क्रूर और मूर्ख है. ऐसी दशा में वहां का कुलपति होना वरदान नहीं बड़ा शाप है.
मठ का अधिपति होने से सात पीढ़ियों को नर्क भोगना पड़ता है. जिसे नरक में गिराना चाहें उसे मठाधीश बना दें.
सभासदों ने पूछा-ऐसा क्यों? कुत्ते ने बताया- मठाधीश देवों के अंश, स्त्रीधन, बालधन और दूसरों के दिए धन का अपहरण करता है.
वह मन से द्रव्यों पर बुरी नजर डालता है इसलिए अवीचिमान नामक घोर नरक का भागी होता है. इसलिए ज्ञानी मुनिजन भूलकर भी मठाधीशी नहीं लेते.
कुत्ते के ज्ञान से प्रभु की संगति में प्रतिदिन बैठने वाले सभासद भी आश्चर्यचकित थे. उन्होंने कुत्ते के पिछले जन्म को प्रणाम किया और कुत्ता चला गया.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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