महाकाली से देवता हुए भयाक्रांत, पैरों में लेटकर शिवजी ने किया काली को शांत
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे भी आपको पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इसका लिंक इसी लाइन के नीचे में है.दैत्य रक्तबीज ने कठोर तप से यह वरदान पा लिया था कि उसके रक्त की जितनी बूंदें धरती पर गिरेंगी उससे उतने ही नए रक्तबीज पैदा हो जाएंगे. जो भी नए दैत्य पैदा हों वह बल और पराक्रम में रक्तबीज जैसे ही हों.
उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया. उसका आतंक तीनों लोकों में कोहराम मचाने लगा. देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा. भयंकर युद्ध हुआ.
देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी रक्तबीज का कुछ बिगाड़ नहीं पा रहे थे उलटे उनके प्रहार से जैसे ही रक्तबीज के शरीर से रक्त का एक भी बूंद धरती पर गिरता नए रक्तबीज पैदा हो जाते.
सभी देवता मिलकर महाकाली की शरण में गए. मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं जिनकी उत्पत्ति राक्षसों का संहार करने के लिए ही हुई थी.महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारणकर युद्धभूमि में प्रवेश किया. महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन उनके आक्रमण के कारण जल्द ही युद्धभिमि रक्तबीजों से भर गई.
वे सभी रक्तबीज मिलकर महाकाली पर तीखे बाण और अन्य अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करने लगे. अभ तो महाकाली के क्रोध की कोई सीमा ही न रही. उन्होंने अपनी सहायिका देवियों को उत्पन्न किया.
उन सभी भयानक देवियों के हाथ में खप्पर था. महाकाली जैसे ही किसी असुर की गर्दन काटतीं, दूसरी देवियां उसके रक्त को अपने खप्पर में भरकर पी जातीं. इस तरह रक्तबीज का रक्त धरती पर गिरने ही न पाता.
उन असुरों का सिर काटकर महाकाली अपने गले में मुंडमाला की तरह घारण कर लेतीं. युद्धभुमि में रक्तबीजों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि मां महाकाली लगातार कई वर्षों तक उनका शीश काटती रहीं.इस तरह राक्षसों के रक्त से स्नान करतीं महाकाली का क्रोध बढ़ता ही चला गया. रक्तबीज का तो अंत हो गया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विकराल रूप से चुका था कि उससे देवता भी डरने लगे.
वह माता के समीप जाकर उनकी स्तुति करने से भी भयभीत हो रहे थे कि कहीं देवी क्रोध में उनका ही नाश न कर दें. असुरों के बाद देवताओं में भी भगदड़ मच गई. सभी देवता भगवान शिव के पास गए.
देवताओं ने उनसे महाकाली को शांत करने की प्रार्थना की. भगवान शिव ने महाकाली को बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश की लेकिन उनका क्रोध शांत ही न होता था.
शिवजी चिंतित थे. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कैसे महाकाली को शांत कराया जाए. जब उनके सभी प्रयास विफल हो गए तो वह महाकाली के मार्ग में ही लेट गए.प्रलंयकारी हुंकार भरती हुई महाकाली दौड़ रहीं थी. उनके वेग से संसार कांप रहा था. प्रलय की आशंका थी.
असुरों के साथ ही देवतागण भी भयभीत थे. उन्हें भय था कि यदि क्रोध को शांत न किया गया तो महाकाली सर्वनाश कर देंगी.
सभी ने शिवजी की ओर देखा. शिवजी रणभूमि में लेटे थे तभी महाकाली के चरण शिवजी पर पड़ गए.
जब उन्होंने शिवजी को पैरों के नीचे देखा तो वह एकदम से ठिठक गईं. उन्हें आशंका हुई कि क्या उन्होंने शिवजी पर प्रहार कर दिया है?
महाकाली संकोच में पड़ गई. उन्होंने युद्धभूमि नें दृष्टि दौड़ाई तो वहां असुरों का कोई नामोनिशान न था. यह देखकर उनका क्रोध शांत हो गया. (मार्कण्डेय पुराण)
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