ऐसी कड़ी परीक्षा पर जो खरा उतरता है वही असाधारण बनता है- उपमन्यु की गुरूभक्ति कथा

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आपको एक ऐसे गुरुभक्त की कथा सुनाता हूं जिसकी भक्ति से प्रसन्न होकर गुरू ने उसे स्वयं से भी ज्यादा प्रसिद्ध विद्वान होने का आशीर्वाद दिया. इस कथा में एक गूढ़ संदेश भी है. आप पढ़ें, समझें और अपने बच्चों को सिखाएं.
महर्षि आयोद धौम्य की ख्याति ऐसे गुरू के रूप में थी जो अपने शिष्यों की कड़ी परीक्षा लेते और उन्हें तपाकर सोने से कुंदन बना देते थे.
धौम्य के यहां उपमन्यु शिक्षा लेने आए. धौम्य ने भांप लिया कि उपमन्यु साधारण विद्यार्थी नहीं है इसलिए वह उपमन्यु की तरह-तरह से परीक्षा लिया करते थे.
गुरु ने उपमन्यु को गायें चराने का काम सौंपा. उपमन्यु दिनभर गाय चराते और शाम को आश्रम लौटते. एक दिन गुरु ने पूछा कि आजकल तुम खाते क्या हो?
उपमन्यु ने कहा- मैं भिक्षा मांगकर अपना काम चला लेता हूं.
गुरू ने कहा- ब्रह्मचारी को इस प्रकार भिक्षा का अन्न नहीं खाना चाहिए. जो कुछ भी मिले उसे गुरु को समर्पित कर देना चाहिए. फिर गुरू यदि कुछ दे तो ग्रहण करना चाहिए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उपमन्यु ने स्वीकार कर लिया. कुछ दिनों बाद फिर गुरू ने पूछा- उपमन्यु तुम जो कुछ भिक्षा में लाते हो वह तो मुझे दे देते हो, फिर तुम क्या खाते हो?
उपमन्यु बोला- मैं पहले भिक्षा लाता हूं. उसे आपको सौंप देता हूं. फिर मैं दोबारा भिक्षा मांगता हूं और उसी को खाकर अपना निर्वाह करता हूं.
गुरूदेव बोले- दोबारा भिक्षा मांगना तो धर्म के विरूद्ध है. इससे गृहस्थों पर अधिक भार पड़ेगा और दूसरे याचकों को अन्न नहीं मिलेगा. इसलिए दोबारा भिक्षा मांगने मत जाया करो.
उपमन्यु ने कहा- मुझे माफ कर दें. मैं आज से ऐसा नहीं करूंगा.
कुछ दिनों बाद फिर गुरूदेव ने पूछा- उपमन्यु आजकल तुम अपने जीवन का निर्वाह कैसे करते हो?
उपमन्यु बोला- आजकल मैं इन गायों का दूध पीकर ही अपनी जीविका की निर्वाह करता हूं. गुरू ने कहा- ये गायें तो मेरी हैं और मेरी आज्ञा के बिना इनका दूध पीना अपराध है.
उपमन्यु ने अब दूध पीना भी छोड़ दिया. कुछ दिनों बाद फिर गुरू ने पूछा- तुम भिक्षा नहीं मांगते, दूध नहीं पीते. देखकर लगता नहीं कि उपवास कर रहे हो, फिर खाते क्या हो?
उपमन्यु बोला- गुरूदेव जब बछड़े अपनी मां का दूध पीने लगते हैं तब उनके मुंह से गिरा फेन पीकर मैं काम चला लेता हूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.गुरूदेव बोले- बछड़े बहुत दयालु होते हैं. वह तुम्हारे लिए अधिक फेन फेंकते होंगे और खुद भूखे रह जाते होंगे. यह तो उचित नहीं.
अब उपमन्यु उपवास करने लगे. दिनभर बिना कुछ खाए-पीए गायें चरानी पड़तीं. जब भूख बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उसने आक के पत्ते खा लिए.
आक का विष शरीर में चढ़ गया और अपमन्यु अंधे हो गए. गायों के पीछे-पीछे चलते वह एक सूखे कुएं में गिर गए. सारी गाएं आश्रम लौट गईं लेकिन उपमन्यु नहीं पहुंचे.
गुरु धौम्य को चिंता हुई. शिष्यों के साथ वह वन में गए और पुकारने लगे. गुरू की आवाज सुनकर उपमन्यु ने बताया कि वह अंधे होकर कुएं में गिर गए हैं.
गुरुदेव ने कुएं से निकाला. फिर उपमन्यु ने सारी बात कह सुनाई. धौम्य को अपने शिष्य की भक्ति और वचनशीलता पर गर्व हुआ.
उन्होंने उपमन्यु को वैदिक मंत्र बताए और कहा कि देवों के वैद्य अश्विनी कुमारों का आह्वान करो और चक्षु दान मांगो. उपमन्यु की स्तुति से अश्विनी कुमार प्रकट हुए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन्होंने उपमन्यु को नेत्र प्रदान करने वाली औषधि देकर कहा- इसे तुरंत खा लो. तुम्हारी आंखों की रौशनी वापस आ जाएगी.
उपमन्यु ने अश्विनीकुमारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा- देव, क्षमा करें. मैं अपने गुरू की आज्ञा के बिना कुछ नहीं खा सकता.
अश्विनी कुमारों ने उपमन्यु की परीक्षा लेने के लिए- तुम्हारे गुरू भी एक बार अंधे हो गए थे. हमने उन्हें भी औषधि दी. उन्होंने भी बिना अपने गुरू की आज्ञा लिए इसे खाकर अपनी आंखें पाई थीं.
उपमन्यु ने कहा- वह मेरे गुरू हैं. उन्होंने कुछ भी किया हो, मुझे उससे कोई सरोकार नहीं. परंतु मैं बिना गुरू की आज्ञा के नहीं खाउंगा भले ही मुझे जीवनभर अंधा रहना पड़े.
इस गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमारों ने उपमन्यु को बहुत सी विद्या देकर ज्ञानी बना दिया. (उपनिषद की कथा)
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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