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स्वर्ग जाने के लिए घोर तप ही जरूरी नहीं उससे भी ज्यादा सहज रास्ते हैं.

स्वर्ग जाने के लिए घोर तप ही जरूरी नहीं उससे भी ज्यादा सहज रास्ते हैं.

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जय-विजय दोनों भाई ब्रह्माजी के अधीनस्थ देवदूत थे. एक बार विधाता ब्रह्माजी ने उन्हें आदेश दिया कि तुम दोनों पृथ्वी पर जाओ और किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढकर लाओ जिसके धर्म-कर्म ऐसे हों कि उसे सीधे स्वर्ग में प्रवेश दिया जा सके.

जय-विजय स्वर्ग भोगने के अधिकारी ढूंढने धरती पर आए. घोर तपस्वियों से मिले और कठोर साधना का कारण पूछा तो तरह-तरह के उत्तर मिले जिनकी उन्हें आशा न थी.

कोई कहता कि मैं तप इसलिए करता हूं ताकि जीवन में धन और सम्मान बना रहे. कोई बताता कि मरने के बाद सद्गति और स्वर्ग केलिए तप कर रहा है.

किसी के अनुसार यह संसार आज है कल नहीं होगा. हम यह साधना इसलिए कर रहे है कि मुक्ति मिल जाए. किसी का विचार था कि जाने अनजाने हुए पाप की शुद्धि के लिए साधना करते हैं.

तप के लिए भांति-भांति के विचार सुनकर जय-विजय भ्रम में पड गए. उन्होंने अपनी देव बुद्धि का प्रयोग किया तो पाया के सभी की कथनी और करनी में भी अंतर है.

इन साधकों से मिलने के बाद वे आगे बढ़े. रात घिरने लगी थी. रास्ता ऊबड़-खाबड़ और कीचड भरा था. पर अचानक उन्हें कुछ जगहों पर जलते हुए दीपक रखे मिले. इस खराब रास्ते के किनारे एक बूढा आदमी बैठ हुआ था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बूढा हर आने-जाने वालों को दूर से ही रास्ता बताने लगता. कीचड़ और गड्ढों से आगाह करता. जो व्यक्ति गलती से कीचड़ में फंस जाते उनके हाथ-पैर धुलाकर पास में बिठाता था. कोई भूखा-प्यासा हो तो यथासंभव खिलाता-पिलाता भी था.

बूढा यह क्यों करता है यह जानने की उत्सुकता में जय-विजय वहीं रुक गए. पता चला कि बूढा तो नेत्रहीन है. वह कदमों या वाहनों की आहट सुनकर रास्ता बताता है.

जय विजय ने पूरी रात वहीं बितायी. सुबह जब दोनों चलने को हुए तो देखा वह बूढा अपनी लगायी सब्जियों की क्यारियों की देखभाल में लगा है.

जय विजय ने पूछा- आप रात भर जागते रहे और सुबह उठकर इस काम में लग गए जबकि सुबह तो भगवान की पूजा और ध्यान के लिए होता है, आप वह नहीं करते क्या?

नेत्रहीन वृद्ध बोला- मुझे रात में लोगों को राह बताना, उन्हें ठोकर और कीचड़ से बचाना, उनकी सेवा करना अच्छा लगता है. उस आनंद के लिए कुछ धन तो चाहिए ही, वह मैं इन क्यारियों की सब्जी बेचकर कमा लेता हूं.

रात में अपना मनचाहा कामकर आनंद उठाना और दिन में उस काम के लिए मेहनत करना इसी को आप पूजा पाठ जो समझ लें इससे ज्यादा और कुछ मैं नहीं जानता.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जय विजय ने साधकों की सूची में इस अंधे बूढे का विवरण भी लिख लिया और स्वर्ग लौटे. प्रजापति ने सभी विवरण पढे और बोले- बाकी सभी साधक तो महज आडम्बर व समय काटने में लगे हैं. बस यही एक स्वर्ग का सच्चा अधिकारी है.

ब्रह्माजी ने उसे स्वर्ग ले आने का आदेश दिया. यह सुनकर जय-विजय उलझन में पड़ गये क्योंकि उनकी नजर में दो चार साधक निस्संदेह कठोर साधना में लगे हुए थे.

उनकी उलझन पढते हुये विधाता ने समझाया- उपासना का मतलब केवल अपनी मुक्ति हेतु जप-तप नहीं है. जनमानस को उचित दिशा दिखाना भी उपासना का एक स्वरूप है दूसरों की निस्वार्थ सेवा करने वाले के दिल में ही भगवान रहते हैं.

ऐसे निःस्वार्थ सेवियों का सम्मान करना, उनके नेक कार्य में सहायता करना भी समान पुण्यदायक कार्य है.(गीता प्रेस सत्कथा अंक में प्रकाशित कथा)
संपादनः राजन प्रकाश
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