गुरू, सदगुरू एवं जगतगुरू में क्या गुण होने चाहिए?

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एक बार कुमार कार्तिकेय भगवान सूर्यनारायण के दर्शन और उनसे ज्ञान प्राप्ति को गए. उन्होंने सूर्यदेव से पूछा कि तत्वज्ञान प्रदान करने में समर्थवान किसे मानना चाहिए? तभी वहां उन्होंने आश्चर्यजनक दृश्य देखा.
एक दिव्य विमान आया. भगवान सूर्य स्वयं उठकर गए और विमान से उतरे व्यक्ति का आदर सत्कार किया. उसके अंग को स्पर्शकर, मस्तक को सहलाकर पितृवत प्रेमभाव दर्शाया. प्रेम से बातें की और अपने पास में बैठाया.
थोड़ी देर में दूसरा विमान आया. उसमें से जो व्यक्ति उतरा उनका भी भगवान सूर्य ने उसी प्रकार स्वागत, स्नेह प्रदर्शन किया. कार्तिक स्वामी यह सब देखकर चकित हुए. वह अपनी जिज्ञासा को रोक न पाए.
उन्होंने सूर्यनारायण से पूछा कि विमानों से आये इन दो व्यक्तियों को आपने इतना सम्मान दिया है इसका कारण क्या है? इनके पास ऐसा कौन सा पुण्य है जो आपके इतने स्नेह के पात्र बन गये हैं?तब सूर्यनारायण ने कहा- हे कुमार कार्तिक! मुझे अपनी संतान यम, यमी, शनि या तप्ती इतने प्रिय नहीं हैं जितने प्रिय ये दो व्यक्ति हैं जिन्हें आपने अभी-अभी देखा था.
इनमें से पहले व्यक्ति वह हैं जो अयोध्या में लोगों को नियमपूर्वक भावविभोर होकर हरिचर्चा सुनाते थे. भगवन्नाम की कथा करने वाले व्यास थे. हरिकथा से लोगों के पाप दूर होते हैं, अज्ञान दूर होता है.
मैं तो प्रकाश करता हूं तब रात्रि का अन्धकार दूर होता है मगर ये कथाकार जब कथा करते हैं तब हृदय का अन्धकार दूर होता है. इसलिए मैं उनका इतना स्वागत करता हूँ.जिस दूसरे व्यक्ति को आपने देखा वह है उस भगवद् कथा का उत्तम श्रोता. इसने अनगिनत बार भगवद कथा सुनी है लेकिन किसी बार एक पल के लिए भी उबा नहीं. भाव-विभोर होकर कथा सुनता रहा.
श्रवण जा के समुद्र समाना… यह श्रोता ऐसा उत्तम है कि कथा सुनने के बाद इसने कथावाचक की प्रदक्षिणा की और उन्हें दान दिया. इसलिए उस पर मेरी प्रीति बढ़ गई.
कथा (सत्संग) एक ऐसा दिव्य प्रकाश है कि उस प्रकाश के आगे सूर्य का प्रकाश और चन्द्रमा का प्रकाश भी छोटा पड़ता है. शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं-
“गंगा पापं शशी तापं दैन्यं कल्पतरूस्तथा।
पापं तापं च दैन्यं च घ्नन्ति सन्तो महाशयाः।।”
गंगास्नान से पाप दूर होते हैं, चाँदनी की शीतलता में शरीर की तपन मिटती है और कल्पवृक्ष मिले तो दरिद्रता दूर होती है लेकिन जिसको महापुरूष मिलते हैं उसके पाप, ताप और हृदय की दरिद्रता सदा के लिए दूर हो जाती है.इसलिए हे कुमार! हरिचर्चा, आत्मज्ञान चर्चा, ब्रह्मज्ञान की चर्चा करने वाला व्यास है जो हमारे मन की बिखरती वृत्तियों को कथा द्वारा एकाग्र करे. हमारे चित्त की वृत्तियों को एकाकार करने की, उनमें भगवद्भाव में लाने की व्यवस्था करे उसका नाम व्यास है.
आचार्य उसे कहते हैं जो हमारे मन को सात्विकक आचरण करने का सामर्थ्य दें, हमें उस प्रयत्न में सहायता करें. गुरू वह हैं जो हमारे आत्मा की परमात्मा से भेंट कराने का सामर्थ्य रखते हों.
कोई सिर्फ व्यास होता है, कोई आचार्य, कोई गुरू मगर कोई-कोई ब्रह्मवेत्ता संत ऐसा होता हैं जो व्यास भी हो, आचार्य भी और सदगुरू भी. भगवान श्रीकृष्ण ऐसे आचार्य ऐसे व्यास ऐसे गुरू हैं कि युद्ध के मैदान में अर्जुन को आत्मज्ञान-अमृत का पान करा दिया है.”कृष्णं वन्दे जगदगुरुम् !”
विवेक चाहिए, वैराग्य चाहिए, साधन चतुष्टय चाहिए, बाद में वेदान्त सुनने का अधिकार मिलता है पर श्रीकृष्ण ने इन सब अधिकारों की परवाह किए बिना, युद्ध के मैदान में अर्जुन को आत्मज्ञान का उपदेश देकर मोहनिद्रा से जागृत कर दिया.
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं वैकुण्ठ में विरले ही जा पाते हैं लेकिन जहां हरिकथा होती है, जहां आत्मचर्चा होती है, जहाँ कीर्तन होता है वहां वैकुण्ठ स्वयं आकर उपस्थित हो जाता है.
संकलनः मनोज त्रिपाठी
संपादनः राजन प्रकाश
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