शिवजी की काशी में एक शिवभक्त स्वयं बन बैठा शिव, श्रीहरि और गणेशजी ने उसे कैसे किया ठीक

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक बार भगवान शिव से मां पार्वती ने कहा कि हिमालय क्षेत्र हमारा मायका है, यहां रहने में बहुत संकोच होता है. आपने तो इसको ही स्थाई निवास बना लिया है. इससे जगहंसाई होती है.
भगवान शिव निवास के लिए उचित स्थान देखने निकले. काशी देखकर उन्होंने पार्वतीजी से कहा- शिवे! अब हम इसी काशीक्षेत्र में ही निवास करेंगे. इस स्थान से हमारा जुड़ाव भी है.
जब तुमने सतीरूप में अपने पिता यज्ञ में स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर लिया था उस समय मैं तुम्हारे शरीर को लेकर तीनों लोकों में घूमता जब यहां पहुंचा तब तुम्हारा मस्तक टूट कर इसी क्षेत्र में गिरा था.
इससे यह भूमि पवित्र हो गयी. तब से इस भूमि का नाम ‘गौरी मुख तीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ. प्रलय के समय भी इस ‘गौरी मुख तीर्थ’ का विनाश नही हुआ. हम इसी अविनाशी क्षेत्र में रहेंगे.
काशी क्षेत्र में पहुंच शिव बोले- पार्वती तुम अन्नपूर्णा का रुप धारण कर के लोगों के भोजन की व्यवस्था करो, मैं जीवों के उद्धार के लिए लोगों को अपना परम गुप्त तारक मंत्र का उपदेश देता हूं.
कुछ समय के बाद शिवजी के तारक मंत्रों के प्रभाव से यह स्थान सिद्धिपीठ हो गया तो इस सिद्धिपीठ स्थान का नाम काशी हो गया.मां अन्नपूर्णा की कृपा से यहां कभी कोई भूखा नहीं रहता.बहुत बरस बाद भगवान शिव ने घोर तपस्या के लिए एकांत की आवश्यकता समझ काशी छोड़ने का निर्णय लिया. वह मंदरांचल चले गए. काशी के लोग जो भगवान शिव के संरक्षण में रहते थे. अब उनकी रक्षा और पालन कौन करेगा.
लोगों को उत्तम प्रजापालक मिलता रहे यह सोचकर भगवान शिव ने इस क्षेत्र की रक्षा के लिए पवित्र, धर्मनिष्ठ राजाओं को उत्पन्न किया जाए. शिवजी की इच्छा से परम प्रतापी हर्यश्व का जन्म हुआ.
इसके बाद इनके बहुत सुंदर बेटे पुरुरवा ,पुरुरवा के वीर आयुष, यहां के राजा हुए. शिव अभी नहीं लौटे. वह तप में लीन थे. आयुष के बाद, आयुष के प्रपौत्र, काश्य तथा काश्य के बाद, काश्य के पुत्र सुदेव, राजा हुए.
सुदेव से शंबर दैत्य ने इस क्षेत्र पर कब्जा लिया पर देवासुर संग्राम में इंद्र ने दैत्यों से सौ नगर जीते तो यह एक नगर सुदेव के पुत्र दिवोदास को भेंट कर दी. दिवोदास शिवभक्त था.
धनवंतरी के बाद आयुर्वेद का सबसे बड़ा ज्ञाता था. दिवोदास ही उस पहले शल्य चिकित्सा के विद्यालय का निर्माण कराया जिसके प्रथम प्राचार्य सुश्रुत बने. दिवोदास के राज में काशी की प्रजा बहुत सुख चैन से रहती थी.
पर जब राजा दिवोदास का काशी पर से राज समाप्त होने का समय आया तब वह अपना राजकाज हमेशा बना रहे इस वर प्राप्ति के लिये ब्रह्माजी की तपस्या करने चला गया.बहुत दिन तक राजा के न रहने पर सब कुछ गड़बड़ा गया. प्रजा को बहुत कष्ट हुआ. राजा दिवोदास ने कठोर तप करके ब्रह्माजी से वरदान मांगा कि देवता देवलोक में ही वास करें.
नाग लोक में नाग और पाताल में राक्षस, भूलोक यानी धरती मनुष्यों के रहने के लिये छोड़ दिया जाय. सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने उसे मनचाहा वर देकर कहा कि अब तप छोड़ो शीघ्र वापस राज काज संभालो. तुम्हारी प्रजा बहुत दुखी है.
इससे कलियुग में देवताओं के गुप्त रूप से पृथ्वी पर रहने की योजना गड़बड़ा गयी. उधर शिव जी ने सोचा कि अब फिर काशी चला जाये अब तो उनके द्वारा उत्पन्न अंतिम राजा का समय भी समाप्त हो चुका है.
शिवजी ने काशी जाने से पहले कुछ दूत भेज कर काशी का हाल जानने का निश्चय किया और अपने कुछ दूत काशी भेजे. उधर काशी में दिवोदास ने अपने तपोबल से तमाम देवताओं का रूप ले रखा था.
इस तरह उसने न सिर्फ शासन व्यवस्था बहुत बेहतर कर रखी थी, लोगों को भरमा भी रखा था. शिवदूतों के पूछने पर काशी के लोगों ने कहा- हमारे पालनकर्ता तो बस दिवोदास हैं. हम तो उन्हीं को जानते हैं.
दिवोदास के साथ केवल ब्रह्माजी का दिया वरदान ही नहीं था वह शिवभक्त भी था. तो जब तक दिवोदास काशी स्वयं नहीं छोड़ता शिव वापस काशी नहीं जा सकते थे. दूतों ने यह बात शिवजी को नहीं बताई.शिवजी काशी में फिर से स्थापित हों इसके लिए भगवान विष्णु, चौंसठ योगिनियों और श्रीगणेश ने मिल कर युक्ति निकाली. दिवोदास काशी को खुद ही छोड़े इसके लिए देवों ने योगिनियों, सूर्य, ब्रह्मा, गणों, गणपति आदि को काशी भेजा.
भेजे गये सभी लोग भेष बदलकर काशी में अपना अपना काम कर रहे थे. बहुत समय बीतने पर भी शिवजी का कोई दूत न लोटा था उन्हें चिंता हुई कि आखिर क्या हुआ. उन्होंने विष्णुजी से चर्चा की.
विष्णुजी तो सब जान ही रहे थे. उन्होंने कहा कि मैं स्वयं पता करता हूं. इसके लिए एक योजना तैयार की गयी. काशी में गणपति ने अपना आवास एक मंदिर में बनाया.
रानी लीलावती तथा राजा दिवोदास सहित समस्त जनता जल्द ही गणेश से प्रभावित हो उन्हें मानने लगी थी. इसी बीच गणेशजी ने एक ज्योतिषी का रूप बनाया और राजा दिवोदास के पास पहुंचे.
ज्योतिषी बने गणेश ने राजा को बताया कि अठारह दिन बाद एक ब्राह्मण तुम्हारे पास पहुँचकर सच्चा उपदेश करेगा. दिवोदास अत्यंत प्रसन्न हुआ. अब विष्णु कथावाचक विद्वान ब्राह्मण के वेश में आये.
विष्णुजी ने अपना नाम पुण्यकीर्त, गरुड़ का नाम विनयकीर्त तथा लक्ष्मीजी का नाम गोमोक्ष बताया. वे स्वयं गुरु रूप में तथा उन दोनों को चेलों के रूप में लेकर काशी पहुंचे थे.
राजा को समाचार मिला तो गणपति की बात को याद करके उसने पुण्यकीर्ति का स्वागत किया और पूछा क्या चाहते हैं. विष्णु ने कहा- आपकी पुण्य नगरी में कथा वार्ता की अनुमति.पुण्यकीर्ति ने राजा दिवोदास से की आज्ञा मिलने के बाद काशी में वैकुंठ लोक के वैभव की कथायें खूब कहीं क्योंकि वहां लोग हर तरह से सुखी और पवित्र थे सो पाप पुण्य का उपदेश कौन सुनता.
दिवोदास के कानों तक भी विष्णु लोक के वैभव की बात पहुंची तो उसने पुण्यकीर्ति को बुला उपदेश सुना. विष्णु ने कहा अभी तक तो सब ठीक है पर पूरे जीवन में न जाने कब जाने अनजाने कौन सा अधर्म हो जाए पता नहीं.
इस अधर्म से पुण्य घट जायें और स्वर्ग न मिले इससे तो बेहतर है कि राजा आप जो कि इस समय ही बैकुंठ वासी होने के योग्यता रखते हैं , बैकुंठ चले जायें, पर यह आपकी मर्जी है. राजा दिवोदास के बात जंच गयी.
राजा दिवोदास ने विष्णु के साथ ही विष्णुलोक जाना स्वीकार लिया. तब गरुड़ विष्णु के संदेश वाहक बने और सारी घटना का स्वरूप समस्त घटना का विस्तृत वर्णन शिव को जा सुनाया.
ऐसे में यह आवश्यक हो गया कि काशी को एक बार फिर भगवान शिव का संरक्षण मिले. देवतागण भी काशी में अंश रूप से रहने के पुन: अधिकारी बनें. काशी की जनता को नया राजा मिले.
इस बीच जाने से पहले काशिराज राजा दिवोदास ने वरुणा नदी तथा असि नदी के बीच में स्थित स्थान पर एक शिवलिंग स्थापित किया और लिंग का नाम रखा विश्वनाथ. जगह का नाम वारुणासी पड़ गया.
दिवोदास विष्णु लोक को गये, शिव काशी आये. काशीवासी ब्राह्मणों ने शिव से वरदान मांगा कि वे कभी काशी छोड़ कर नहीं जायेंगे. आज भी काशी में भगवान भोले का वास है.
(यह दंत कथा है)
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