भीम-बर्बरीक युद्ध, अंबिकाओं का वरदान व बर्बरीकजी द्वारा शीशदान (भाग-2)

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एक दिन पांडव वनवास काल में भ्रमण करते हुए भूखे प्यासे उस तालाब के पास पहुँचे जिससे वीर बर्बरीक सिद्ध अम्बिकाओं के पूजन हेतु जल लिया करते थे. महाबली भीम प्यास से उतावले थे. वह बिना हाथ-पैर धोए ही उस तालाब में प्रवेश कर गए. बर्बरीक ने गर्जना करते हुए भीम को ऐसा करने से रोका.
बात बढ़ गई. भीम और बर्बरीक के बीच मल्ल युद्ध शुरू हुआ. बर्बरीक ने महाबली भीम को अपने हाथों से उठा लिया और जैसे ही उन्हें सागर में फेंकना चाहा, सिद्ध अम्बिकाएं प्रकट हो गईं. उन्होंने बर्बरीक से भीम का वास्तविक परिचय करवाया.
सत्य जानकर बर्बरीक को बड़ा शोक हुआ और वह अपने प्राणों का अंत करने को तैयार हो गए. सिद्ध अम्बिकाओं एवं भगवान शंकर ने बर्बरीक का मार्ग दर्शन करते हुए उन्हें भीम के चरणस्पर्श कर क्षमा याचना का सुझाव दिया. महाबली भीम अपने सुपौत्र के पराक्रम से प्रसन्न हुए और बर्बरीक को आशीर्वाद देकर विदा हो गए.
महाभारत की रणभेरी बज चुकी थी. वीर बर्बरीक को इसकी सूचना मिली तो अपनी माता मोरवी एवं आराध्य शक्तियों की आज्ञा लेकर युद्धक्षेत्र के लिए चल पड़े. नीले अश्व पर सवार वीर बर्बरीक युद्धक्षेत्र पहुंचे. उन्होंने पांडव सेना की छावनी के पास अपना अश्व रोका और संवाद ध्यान से सुनने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
उधर कौरव पक्ष में भी चर्चा हो रही थी कि कौन-कौन महाबली, किस-किसके सहयोग से और कितने दिनों में महाभारत का युद्ध जीत सकता है. भीष्म पितामह और कृपाचार्य यह युद्ध एक-एक महीने में, द्रोणाचार्य 15 दिनों में, अश्वत्थामा 10 दिनों में जबकि कर्ण इसे मात्र छह दिनों में ही जीत सकते थे.
पांडव खेमे में अर्जुन ने कहा कि वह अकेले मात्र एक दिन में ही यह युद्ध जीत सकते हैं. अर्जुन की बात सुनकर बर्बरीक चर्चा के बीच में ही बोल पड़े- मेरे होते आप लोगों को यह युद्ध लड़ने की आवश्यकता नहीं होगी, मैं अकेला अपने अजेय आयुधों के साथ इस युद्ध को एक पल में जीत लूंगा. आपको विश्वास न हो तो मेरे पराक्रम की परीक्षा ले लें”
यह सुनकर अर्जुन बड़े लज्जित हुए और श्रीकृष्ण की और देखने लगे. इस पर श्रीकृष्ण ने कहा-यह नव आगंतुक ठीक ही तो कह रहा है. पूर्वजन्म में इसने पाताल लोक में नौ करोड़ पलाशी दैत्यों का संहार कर दिया था. श्रीकृष्ण ने उसके पराक्रम को परखना चाहा.
उन्होंने पूछा-‘वत्स! भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा और दुर्योधन आदि महारथियों द्वारा सुरक्षित कौरव सेना पर भगवान शंकर द्वारा ही विजय पाना संभव है. तुम इसे कैसे पलभर में जीत सकते हो?’हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
वीर बर्बरीक ने अपने तुणीर से एक बाण निकाला. उसमे सिंदूर जैसे भस्म को भर दिया. धनुष की प्रत्यंचा को कान तक खींचकर छोड़ दिया. उस बाण से जो भस्म उड़ा उसने समस्त वीरों के मर्मस्थल को छू लिया. केवल पांच पांडवों, अश्वत्थामा और कृपाचार्य पर उस बाण का प्रभाव नहीं पड़ सका.
वीर बर्बरीक ने कहा, ‘देखिए, मैंने इस बाण के प्रभाव से युद्धस्थल में विराजमान समस्त योद्धाओं के मर्म को जान लिया है. अब इस दूसरे बाण से इन सभी को यमलोक पहुँचा दूँगा. आप सबको आपके धर्म की सौगंध है कि मेरे होते कोई अस्त्र न उठाए.”
वीर बर्बरीक ने जैसे ही यह बात कही, वैसे ही श्रीकृष्ण ने कुपित होकर सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काट दिया. वहां उपस्थित सभी वीर विस्मय में पड़ गए. पांडवों में हाहाकार छा गया. घटोत्कच तो मूर्छित हो गए. तभी बर्बरीक की आराध्य 14 देवियां और सिद्ध अम्बिकाएं प्रकट हुईँ. वे पुत्र शोक से संतप्त घटोत्कच को सांत्वना देने लगीं.
सिद्ध अम्बिकाओं ने ऊंचे स्वर में शिरोच्छेदन के रहस्य को उजागर करते हुए कहा-” हे पांडुपुत्रों! देवसभा में यह वीर शिरोमणि सूर्यवर्चा नामक यक्षराज था.देवसभा में अभिमान से भरे वचन बोलने के कारण अभिशप्त यक्षराज ने बर्बरीक के रूप में जन्म लिया था. ब्रह्माजी के अभिशापवश इसका शिरोच्छेदन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूर्व-नियोजित था. अतः आपलोग शोक न करे और बर्बरीक के पूर्वजन्म की कथा सुनिए.
(स्कन्दपुराण के माहेश्वर खंड अंतर्गत द्वितीय उपखंड “कौमारिका खंड” की कथा. बर्बरीक के पूर्वजन्म की कथा तीसरे खंड में पढ़ें)
संकलनः महावीर प्रसाद सर्राफ “टीकम”
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