बर्बरीक के पूर्वजन्म की कथा और श्रीकृष्ण द्वारा पूजनीय होने का वरदान (भाग-3)

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भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से भीम के पौत्र बर्बरीक का शीश काट दिया. वहां बर्बरीक की आराध्य सिद्ध अंबिकाएं प्रकट हुईं. उन्होंने शोकग्रस्त पांडवों को सांत्वना देते हुए बर्बरीक के पूर्वजन्म की कथा सुनानी शुरू की.
मूर दैत्य के अत्याचारों से पीडित पृथ्वी देवसभा में गाय के रूप में अपनी फरियाद लेकर पहुंची- “ हे देवगण! मैं सभी प्रकार का संताप सहन करने में सक्षम हूँ. पहाड़, नदी एवं समस्त मानवजाति का भार सहर्ष सहन करती हुई अपनी दैनिक क्रियाओं का संचालन करती रहती हूँ, पर मूर दैत्य के अत्याचारों से मैं व्यथित हूँ. आप लोग इस दुराचारी से मेरी रक्षा करो, मैं आपकी शरणागत हूँ.”
गौस्वरुपा धरा की करूण पुकार सुनकर सारी देवसभा में सन्नाटा छा गया. थोड़ी देर के मौन के पश्चात ब्रह्माजी ने कहा-“ मूर दैत्य के अत्याचारों से रक्षा के लिए हमें भगवान श्रीविष्णु की शरण में चलना चाहिए और पृथ्वी के संकट निवारण हेतु प्रार्थना करनी चाहिए.”
देवसभा में विराजमान यक्षराज सूर्यवर्चा ने अपनी ओजस्वी वाणी में कहा- ‘ हे देवगण! मूर दैत्य इतना प्रतापी नहीं जिसका संहार केवल श्रीविष्णुजी ही कर सकें. हर बात के लिए हमें उन्हें कष्ट नहीं देना चाहिए. आप लोग यदि मुझे आज्ञा दें तो मैं स्वयं अकेला ही उसका वध कर सकता हूँ.”हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
सूर्यवर्चा की बात सुनकर ब्रह्माजी बोले- “नादान! मैं तेरा पराक्रम जानता हूँ. तुमने अभिमानवश इस देवसभा को चुनौती दी है. स्वयं को विष्णुजी के बराबर समझने की भूल करने वाले अज्ञानी! तुम इस देवसभा के योग्य नहीं हो. तुम अभी पृथ्वी पर जा गिरो. राक्षसकुल में जन्म लो. युद्ध के लिए आतुर यक्ष! पृथ्वी पर एक धर्मयुद्ध के आरंभ के ठीक पहले स्वयं भगवान विष्णु तुम्हारा सिर काटेंगे. राक्षस रूप में तुम उस युद्ध से वंचित रह जाओगे.
सूर्यवर्चा ब्रह्माजी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा. ब्रह्माजी का क्रोध शांत हुआ. वह बोले- “वत्स! तूने अभिमानवश देवसभा का अपमान किया है, इसलिए मैं शाप वापस नहीं ले सकता. लेकिन इसमें कुछ संसोधन अवश्य कर सकता हूँ. भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से तुम्हारा शीश काटेंगे. उसके बाद देवियां तुम्हारे शीश का अमृत से अभिसिंचन करेगी. जिससे तुम देवताओं के समान पूज्य हो जाओगे.”
तत्पश्चात भगवान श्रीहरि ने भी इस प्रकार यक्षराज सूर्यवर्चा से कहा- हे वीर! तुम्हारे शीश की पूजा होगी और मेरे आशीर्वाद से तुम देवरूप में पूजित होगे. अभिशाप को वरदान में बदलता देख सूर्यवर्चा प्रसन्न मन से उस देवसभा से अदृश्य हो गए. भगवान विष्णु ने पृथ्वी के उद्धार के लिए श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर मूर दैत्य का वध किया और मुरारी कहलाए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
पिता के वध का समाचार पाकर मूर दैत्य की पुत्री कामकटंककटा(मोरवी) अजेय अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित हो श्रीकृष्ण से युद्ध करने लगी. मोरवी अपने अजेय खेटक (चंद्राकार तलवार) से भगवान के सारंग धनुष से निकलने वाले हर तीर के टुकड़े टुकड़े करने लगी. दोनों में घोर संग्राम हुआ. श्रीकृष्ण के पास सुदर्शन चक्र के प्रयोग के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था.
ज्योंही श्रीकृष्ण ने अपना अमोघ अस्त्र हाथ में लिया, उसी समय माता कामाख्या अपनी भक्त मोरवी के रक्षार्थ वहाँ उपस्थित हो गईं. देवी ने मोरवी के भगवान श्रीकृष्ण के बारे में बताया-“ जिस महारथी से तू संग्राम कर रही है यही भगवान श्रीकृष्ण तेरे ससुर होंगे. इनकी शरणागत होकर इच्छित वरदान मांग ले.” मोरवी ने शांत होकर श्रीकृष्ण भगवान को प्रणाम कर आशीर्वाद लिया.
उपस्थित लोगों को यह वृत्तान्त सुनाकर देवी चण्डिका ने पुनः कहा- “मोरवीनंदन का उद्धार स्वयं भगवान ने किया है. इसलिए आपको शोक नहीं करना चाहिए.” श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के शीश को रणभूमि में प्रकट हुई 14 देवियों सिद्ध, अम्बिका, कपाली, तारा, भानेश्वरी, चर्ची, एकबीरा, भूताम्बिका, सिद्धि, त्रेपुरा, चंडी, योगेश्वरी, त्रिलोकी और जेत्रा द्वारा अमृत से सिंचित करवाकर उसे देवत्व प्रदान करके अजर अमर कर दिया. नवीन जाग्रत शीश ने उन सबको प्रणाम किया और युद्ध देखने की अनुमति मांगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया, “हे वत्स! जब तक यह पृथ्वी नक्षत्र सहित विद्यमान है. जब तक सूर्य-चन्द्रमा विद्यमान हैं, तुम तब तक पूजनीय रहोगे. तुम देवियों के स्थानों में देवियों समान विचरते रहोगे. अपने भक्तगणों में कुलदेव समान मर्यादा पाओगे. कल्याणकारी रूप में तुम भक्तों के वात-पित्त-कफ जनित रोगों का नाश करोगे. पर्वत की चोटी पर विराजमान होकर युद्ध देखो. वासुदेव श्रीकृष्ण के वरदान के बाद देवियां अन्तर्धान हो गईं.
बर्बरीक जी का शीश पर्वत की चोटी पर पहुँच गया एवं बर्बरीकजी के धड़ का शास्त्रीय विधि से अंतिम संस्कार कर दिया गया. श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से उनका शीश देवरूप में परिणत हो गया था.
(स्कन्दपुराण के माहेश्वर खंड अंतर्गत द्वितीय उपखंड “कौमारिका खंड” की कथा)
संकलनः महावीर प्रसाद सर्राफ “टीकम”
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