जानकीकृतं पार्वती स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित
माता जानकी द्वारा रचित पार्वती स्तोत्रम्
जानकीकृत पार्वती स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित
सदा शंकरयुक्ते च पतिं देहि नमोsस्तु ते ॥1॥
(जानकी बोलीं– सबकी शक्तिस्वरूपे! शिवे! आप सम्पूर्ण जगत की आधारभूता हैं। समस्त सद्गुणों की निधि हैं तथा सदा भगवान शंकर के संयोग-सुख का अनुभव करने वाली हैं; आपको नमस्कार है। आप मुझे सर्वश्रेष्ठ पति दीजिये।)
सृष्टिस्थित्यन्त रूपेण सृष्टिस्थित्यन्त रूपिणी ।
सृष्टिस्थियन्त बीजानां बीजरूपे नमोsस्तु ते ॥2॥
(सृष्टि, पालन और संहार आपका रूप है। आप सृष्टि पालन और संहाररूपिणी हैं। सृष्टि, पालन और संहार के जो बीज हैं, उनकी भी बीजरूपिणी हैं; आपको नमस्कार हैं।)
हे गौरि पतिमर्मज्ञे पतिव्रतपरायणे ।
पतिव्रते पतिरते पतिं देहि नमोsस्तु ते ॥3॥
सर्वमंगल बीजे च नमस्ते सर्वमंगले ॥4॥
(आप समस्त मंगलों के लिये भी मंगलकारिणी हैं। सम्पूर्ण मंगलों से सम्पन्न हैं, सब प्रकार के मंगलों की बीजरूपा हैं; सर्वमंगले! आपको नमस्कार है।)
सर्वप्रिये सर्वबीजे सर्व अशुभ विनाशिनी ।
सर्वेशे सर्वजनके नमस्ते शंकरप्रिये ॥5॥
(आप सबको प्रिय हैं, सबकी बीजरूपिणी हैं, समस्त अशुभों का विनाश करने वाली हैं, सबकी ईश्वरी तथा सर्वजननी हैं; शंकरप्रिये! आपको नमस्कार है।)
परमात्मस्वरूपे च नित्यरूपे सनातनि ।
साकारे च निराकारे सर्वरूपे नमोsस्तु ते ॥6॥
(परमात्मस्वरूपे! नित्यरूपिणि! सनातनि! आप साकार और निराकार भी हैं; सर्वरूपे! आपको नमस्कार हैं।)
क्षुत् तृष्णेच्छा दया श्रद्धा निद्रा तन्द्रा स्मृति: क्षमा ।
एतास्तव कला: सर्वा: नारायणि नमोsस्तु ते ॥7॥
(क्षुधा, तृष्णा, इच्छा, दया, श्रद्धा, निद्रा, तन्द्रा, स्मृति और क्षमा– ये सब आपकी कलाएँ हैं; नारायणि! आपको नमस्कार है।)
एतास्त्व कला: सर्वा: सर्वरूपे नमोsस्तु ते ॥8॥
(लज्जा, मेधा, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, सम्पत्ति और वृद्धि– ये सब भी आपकी ही कलाएँ हैं; सर्वरूपिणि! आपको नमस्कार है।)
सर्वानिर्वचनीये च महामाये नमोsस्तु ते ॥9॥
(दृष्ट और अदृष्ट दोनों आपके ही स्वरूप हैं, आप उन्हें बीज और फल दोनों प्रदान करती हैं, कोई भी आपका निर्वचन (निरूपण) नहीं कर सकता है, महामाये! आपको नमस्कार है।)
शिवे शंकर सौभाग्ययुक्ते सौभाग्यदायिनि ।
हरिं कान्तं च सौभाग्यं देहि देवी नमोsस्तु ते ॥10॥
( हे शिवे! आप शंकरसम्बन्धी सौभाग्य से सम्पन्न हैं तथा सबको सौभाग्य देने वाली हैं। देवि! श्रीहरि ही मेरे प्राणवल्लभ और सौभाग्य हैं; उन्हें मुझे दीजिये। आपको नमस्कार है।)
स्तोत्रणानेन या: स्तुत्वा समाप्ति दिवसे शिवाम् ।
नमन्ति परया भक्त्या ता लभन्ति हरिं पतिम् ॥11॥
(जो स्त्रियाँ व्रत (गौरीव्रत) की समाप्ति के दिन इस स्तोत्र से शिवादेवी की स्तुति करके बड़ी भक्ति से उन्हें मस्तक झुकाती हैं; वे साक्षात श्रीहरि को पतिरूप में प्राप्त करती हैं।)
इह कान्तसुखं भुक्त्वा पतिं प्राप्य परात्परम् ।
दिव्यं स्यन्दनमारुह्य यान्त्यन्ते कृष्णसंनिधिम् ॥12॥
(इस लोक में परात्पर परमेश्वर को पति रूप में पाकर कान्त-सुख का उपभोग करके अन्त में दिव्य विमान पर आरूढ़ हो भगवान श्रीकृष्ण के समीप चली जाती है।)
पार्वती स्तोत्रम् का महत्वः
शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा: शास्त्रों के अनुसार कौन-सी पूजा श्रेष्ठ है?
शिवलिंग पूजा विधि: क्या महिलाएं शिवलिंग की पूजा कर सकती हैं? शिव प्रसाद खाना चाहिए?
( डिस्कलेमरः यह पोस्ट ज्योतिर्विदों और धर्मशास्त्र के जानकारों के साथ परामर्श के बाद तैयार की गई है। इस पोस्ट का उद्देश्य सिर्फ एक प्रचलित ज्योतिषीय अनुमान देना है। इसका उद्देश्य कोई गलत जानकारी देना या अंधविश्वास फैलाना नहीं हैं। पोस्ट में बताएं किसी भी परामर्श पर अमल करने से पहले विषय के विशेषज्ञ से परामर्श लें।)
प्रभु शरणम् के बारे में दो शब्दः
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