हनुमानजी को कब-कब मिले अमरत्व का वरदान, शरीर छोड़ने की भी है अनुमति?
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हनुमानजी कैसे चिरंजीवी हुए इसके संदर्भ में कई कथाएं हैं। आज उन कथाओं पर एक-एक करके चर्चा करेंगे और श्रीराम के चरणों में हनुमानजी के अनुराग का रस भी लेते रहेंगे।
इन्हें नित्यजीवी अथवा अजर-अमर कहना भी असंगत नहीं है क्योंकि लंका विजय के पश्चात हनुमानजी ने केवल श्रीराम में सदा के लिए अपनी निश्चल भक्ति की याचना की थी। इसी विनती में उन्होंने अमरत्व प्राप्त कर लिया।
जब भगवान ने हनुमानजी से कुछ मांगने को कहा तो उन्होंने भगवान के चरणों में अटल भक्ति मांग ली। इससे प्रभु विभोर हो गए।
श्रीराम ने इन्हें हृदय से लगाकर कहा था- “कपिश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा। संसार में जब तक मेरी कथा प्रचलित रहेगी तब तक तुम्हारी कीर्ति भी अमिट रहेगी औऱ तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे। तुमने मुझ पर जो उपकार किए हैं उनका बदला मैं नहीं चुका सकता।”
इस प्रकार जब श्री राम ने इन्हें चिरकाल तक संसार में प्रसन्नचित्त होकर जीवित रहने का आशीर्वाद दिया तब इन्होंने भगवान से कहा- जब तक संसार में आपकी पावन कथा का प्रचार होता रहेगा तब तक मैं आपकी आज्ञा का पालन करता हुआ पृथ्वी पर रहूँगा।”
सुंदरकांड हनुमानजी को विशेष प्रिय क्यों है? पढ़ें अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.सुंदरकांड हनुमानजी को विशेष प्रिय क्यों है?
तुलसीदासजी जब श्रीराम कथा लिख रहे थे तो हनुमानजी उनकी एक-एक चौपाई को देख-विचारकर स्वयं उस पर सहमति देते। तुलसीदास जी हनुमानजी की भक्तिभाव से इतने मुग्ध हो गए कि एक बार ऐसा भी हुआ कि उनके मन में हनुमानजी के प्रति श्रद्धा श्रीराम से भी ज्यादा हो गई।
यह श्रीरामजी की लीला थी। वह चाहते हैं कि उनके भक्त का स्मरण ज्यादा हो। हनुमानजी तो श्रीराम के हृद्य में रहते हैं। हृद्य में क्या विचार आए उन्होंने तत्काल पढ़ लिए और तुलसी बाबा के मन में नई प्रेरणा दी।
रामचरितमानस में सुंदरकांड इसी का प्रतीक समझ में आता है। उसमें तुलसीदासजी ने हनुमानजी की महिमा का अद्भुत चित्रण किया है। वह भगवान श्रीराम की प्रेरणा से हुआ। हनुमानजी ने प्रभु का आदेश स्वीकार लिया।
इसलिए सुंदरकांड हनुमानजी को विशेष रूप से प्रिय है। हनुमानजी की स्तुति का आरंभ पहले श्रीराम के नाम स्मरण के बाद ही करना चाहिए।
“जय सियाराम जय जय हनुमान, संकटमोचन कृपा निधान” हनुमानजी को ऐसे स्मरण करने की आदत डाल लें तो उत्तम है।
इंद्र से भी हनुमानजी को मिला इ्च्छामृत्यु का वरदान? पढ़ें अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.इंद्र से भी मिला है हनुमानजी को इच्छामृत्यु का वरदान
जब हनुमानजी सूर्यदेव की ओर लपके तो राहु उसी समय उन्हें ग्रसने जा रहा था। हनुमानजी ने सोचा कि उनके फल को कोई और चखने आ रहा है सो उन्होंने राहु पर प्रहार करके भगा दिया।
राहु को देव-असुर समझौते के अंतर्गत सूर्य और चंद्रमा को ग्रसने का अधिकार मिला था। राहु इस बात की शिकायत लगाने इंद्र के पास पहुंचे और पूछा कि आपने ग्रसने का मेरा अधिकार छीनकर किसी और को कैसे दे दिया है?
इंद्र ने मना किया कि उन्होंने कोई नई व्यवस्था नहीं बनाई है। वह राहु को लेकर चले। उन्हें हनुमानजी दिख गए। इंद्र ने उन्हें रोकने के लिए वज्र का प्रहार कर दिया। हनुमानजी ने इंद्र का मान रखने के लिए उस प्रहार से मूर्च्छा ले ली।
पवनदेव अपने पुत्र पर आक्रमण से क्रोधित होकर छुप गए। सृष्टि पर संकट आ गया। सभी देवताओं ने हनुमानजी को तरह-तरह के वरदान दिए। तब इंद्र ने हनुमान जी को वरदान दिया था कि आपकी मृत्यु तब तक नहीं होगी जब तक स्वयं आपको मृत्यु की इच्छा नहीं होगी। इस तरह चिरंजीवी होने की एक कथा मिलती है।
सीताजी द्वारा हनुमानजी को अमरत्व का वरदान? पढ़ें अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.सीताजी द्वारा अमरत्व का वरदान
हनुमानजी तब लंका में पहुंचे थे जब माता सीता अपने प्राण देने का विचार कर रही थीं। अचानक हनुमानजी उनके सम्मुख आशा की एक किरण के सदृश
उपस्थित हो गए।
उन्होंने जेसे ही माता को प्रभु श्रीराम की मुद्रिका दिखाई माता हर्षित हो गईँ। उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। उन्हें हनुमानजी पर बड़ा स्नेह आया।
माता सीती ने हनुमानजी से कहा- आपने मुझे आज वह सुख दिया है जो कोई पुत्र अपनी माता को दे सकता है। इस शत्रुप्रदेश में मेरे सम्मुख मेरे स्वामी का संदेश लेकर आए हे कपिश्रेष्ठ आज से मैं आपको अपना पुत्र स्वीकार करती हूं।
माता के पास जो कुछ भी होता है वह उसके पुत्र के लिए होता है। मैं तुम्हें आशीष देती हूं कि हे पुत्र तुम चिरंजीवी हो जाओ।
इस तरह माता सीता के वरदान से हनुमानजी चिरंजीवी हो गए।
क्या हनुमानजी को शरीर त्यागने का वरदान भी मिला है? पढ़ें अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.क्या हनुमानजी को जीवनमुक्ति का आदेश भी मिला है?
हनुमानजी को अमरत्व के वरदान तो बहुत मिले हैं, क्या उन्हें शरीर त्यागने की भी अनुमति मिली है? इस संदर्भ में एक प्रसंग है। एक बार सीताजी द्वारा दिए गए मणि औऱ रत्नों से विभूषित हार को पहनकर हनुमान जी श्रीराम के सम्मुख खड़े थे।
भगवान ने इनकी निष्ठा औऱ भक्ति से अत्यंत प्रसन्न होकर कहा- “हनुमान! मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम जो वर चाहो सो माँग लो। जो वर त्रिलोकी देवताओं को भी मिलना दुर्लभ है, वह भी मैं तुम्हें अवश्य दूँगा।”
हनुमानजी ने अत्यंत हर्षित होकर भगवान श्री राम के चरणों में प्रणाम करके कहा-“प्रभो! आपका नाम स्मरण करते हुए मेरा मन तृप्त नहीं होता। मैं आपका नाम स्मरण करता हुआ स्थित रहना चाहता हूँ। मेरा मनोवांछित वर यही है कि जब तक संसार में आपका नाम स्थित रहे तब तक मेरा शरीर भी विद्यमान रहे।”
इस पर भगवान श्रीराम ने कहा-” ऐसा ही होगा, तुम जीवनमुक्त होकर संसार में सुखपूर्वक रहो। कल्प का अंत होने पर तुम्हें मेरे सायुज्य की प्राप्ति होगी।”
इन प्रमाणों से ज्ञात होता है कि हनुमान जी न केवल चिरजीवी ही हैं बल्कि नित्यजीवी, इच्छा-मृत्यु तथा अजर-अमर भी हैं। भगवान श्रीराम से उन्हें कल्प के अंत में सायुज्य मृत्यु का वरदान प्राप्त है।
अतः उनकी अजरता-अमरता में कोई संशय नहीं है। जनश्रुतियों के अनुसार भी वे अपने भक्त-उपासकों को यदा-कदा जिस-तिस रूप में दर्शन देते हैं।
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