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सुंदरता, समृद्धि और आनंद से भी श्रेष्ठ क्या है ?

सुंदरता, समृद्धि और आनंद से भी श्रेष्ठ क्या है ?


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एक सुंदर टापू पर सभी भावनाएं और गुण घर बनाकर रहते थे . सुंदरता, आनंद, उदासीनता आदि आस-पास रहते थे. प्रेम इनसे दूर एक कोने में बने अपने घर मेँ रहता था.

एक परी ने आकर सबको बताया कि आज शाम तक यह टापू डूब जाएगा. सभी भावनाएं व गुण अपनी-अपनी नाव लेकर भागने लगे. सिर्फ प्रेम शांति से चक्कर लगा रहा था.

उसे जाने की जल्दी नहीं थी. सभी को अचरज हुआ. भागने की तैयारी मेँ व्यस्त किसी के पास समय नहीं था कि वह प्रेम से पूछे कि वह इतना बेफिक्र क्यों है?

दरअसल प्रेम को उस टापू से बहुत लगाव था. वह अंत क्षण तक वहां रहना चाहता था. जैसे-जैसे शाम हुई, टापू डूबने लगा. प्रेम ने टापू पर भरपूर स्नेह बरसाया. टापू के कण-कण मेँ प्रेम भर दिया.

पूरा टापू प्रेममय हो गया. पानी प्रेम के घुटने तक आ गया. प्रेम समझ गया कि टापू छोडने का वक्त आ गया है. लेकिन प्रेम के पास तो नाव थी नहीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ठीक उसी समय समृद्धि की नाव वहां से निकली. प्रेम ने पूछा, ‘बहन समृद्धि! मुझे अपनी नाव मेँ ले चलोगी?’

समृद्धि ने नाव मेँ नजर फेरी फिर कहा, ‘माफ करना प्रेम ! मेरी नाव सोना, चाँदी और हीरे जवाहरातों से भरी है. तुम्हारे लिए जगह नहीं बची!’

समृद्धि के पीछे नाव लेकर आ रही सुंदरता को देख प्रेम चिल्लाया, ‘हे सुंदरता! मुझे अपनी नाव मेँ बिठाओगी?’ सुंदरता ने प्रेम को गौर से देखा. वह गीला हो चुका था.

उसने कहा- ‘माफ करना प्रेम! तुम बहुत गीले हो. मेरी नाव गंदी कर दोगे. तुम जानते हो मुझे गंदगी पंसद नहीं. सुंदरता भी चली गई.

पानी प्रेम के सीने तक आ गया. प्रेम को उदासीनता की नाव जाती दिखी. प्रेम चिल्लाया- ‘उदासीनता, मुझे भी अपने साथ ले चलो. मुझे बचा लो.’ उदासीनता उदास थी.

वह बोली, ‘माफ करना प्रेम. यहां से जाने के कारण मैं बहुत उदास हूँ. तुम मुझे अकेला छोड दो.’ उदासीनता भी प्रेम को छोड़कर चली गई.

वहां सेँ आनंद अपने नाच-गान मेँ मशगूल गुजरा. प्रेम ने बहुत पुकारा. उसने भी प्रेम की बात नहीं सुनी. पानी प्रेम के गले तक आ गया था. अब उसे लगा कि वह नहीं बचेगा.

प्रेम रोने लगा. तभी पीछे से प्रेम भरी आवाज आयी- प्रेम! मेरी नाव मेँ बैठ जा. एक बूढ़ा आदमी नाव लिए खडा था. उसने प्रेम का हाथ पकडकर अपनी नाव मेँ बिठा लिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रेम हतप्रभ था. वह बोल नहीं पा रहा था. बूढे ने उसे किनारे पर छोडा तब भी कुछ नहीं बोला. बस उसका आभार किया. बूढा प्रेम को उतारकर चुपचाप चला गया.

अचानक प्रेम को याद आया कि डूबने के डर और बच जाने की खुशी के बीच वह खुद को बचाने वाले शख्स का नाम पूछना भी भूल गया. प्रेम अपने आप को कोसने लगा.

वह पता लगाने के लिए दौड़ता-दौड़ता ज्ञान के घर गया. ज्ञान को पूरी बात बताई. ज्ञान ने आँखें बंद की. थोडी देर बाद आँखें कहा, ‘तुझे बचाने वाला समय था.’

प्रेम को अचरज हुआ. प्रेम ने पूछा, ‘हे ज्ञान! जब कोई भी मेरी मदद को तैयार न था तो सिर्फ समय ने ही क्यों बचाया?’

ज्ञान ने सदियों के अनुभव के निचोड़ से बताया- सिर्फ समय ही प्रेम की महानता और उसकी अहमियत को समझ सकता है. दूसरों को इतनी बुद्धि होती तो वे समय ती तरह शाश्वत न हो जाते.

सौंदर्य, समृद्धि और आनंद में चूर प्रेम की अहमियत को जो नहीं समझते उन्हें समय सबक सिखाता है. वह सबक कड़वा होता है. दिमाग पर जोर डालिए और याद कीजिए जब सबने आपका साथ छोड़ दिया था तो किसी के प्रेम-स्नेह ने सहारा दिया होगा.
लेखन व संपादनः राजन प्रकाश

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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