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कैसे हो लक्ष्मी का स्थायी वास ?

कैसे हो लक्ष्मी का स्थायी वास ?

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हमारी संस्कृति में लोकगाथाएं रची जाती हैं कोई न कोई संदेश देने के लिए. उन कथाओं में देवी-देवताओं को इसलिए जोड़ा जाता है ताकि लोग उसी आस्था में अमल करें और लाभ उठा लें. यह लोककथा भी मेहनत और चतुराई के मेल का लाभ बताती है.

एक गांव में एक गरीब लकड़हारा रहता था. उसकी पत्नी मर गयी. लकड़हारे के सात बेटे थे. सातों पूरे निकम्मे थे. सिवाय खाने के कोई काम नहीं करते थे, इस बात को लेकर लकड़हारा सोच में डूबा रहता था.

गाँव के लोगों ने सलाह दी की अपने बेटों की शादी कर दो तो घर में लक्ष्मी आयेगी, दिन बदल जायेंगे. उसने सबकी बात मान कर अपने सबसे बड़े बेटे की शादी उसी गाँव में कर दी.

बहू कुशल थी. उसने जल्दी ही घर का सारा काम संभाल लिया और अपने सभी देवरों से कहा की आज से आलस बंद सभी कुछ न कुछ करेंगे और करने से जो मिलेगा, मुझे देंगे.

उस दिन उसका एक देवर आकर बोला- भाभी, देखो हम यह लाए हैं. देखा तो उसकी चप्पल में गोबर लगा हुआ था. उसने हंस कर कहा- ठीक है अपनी मेहनत को संभाल कर रख दो.

अगले दिन दूसरा देवर आ कर बोला देखो- भाभी हम क्या लाये हैं. वह एक मरा हुआ सांप लाया था. भाभी का वही जवाब था- अपनी कमाई संभाल कर रख दो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुछ ही दिन बीते होंगे कि रानी जब नहा रहीं थीं तो उनका नौलखा हार एक कौआ ले उड़ा. राजा ने ढिंढोरा पिटवा दिया जो कोई हार लाकर देगा, उसे मुंहमांगा ईनाम मिलेगा.

दीपावली आने वाली थी. दो दिन के बाद ही नरक चौदस था. सो घर की सफाई शुरू हुयी. पता चला नौलखा हार छत पर पड़ा हुआ है और मरा हुआ सांप वहां से गायब है. हार देख लकड़हारा खुश हो गया.

लकड़हारा हार को लेकर राजा के पास यह सोचता हुआ जाने को तैयार हुआ कि वह राजा से इस हार के बदले मुंह मांगी दौलत मांग लेगा उसका बाकी जीवन आराम से बीत जायेगा.

मगर उसकी बहू ने अपने ससुर को समझाते हुये कहा कि जो मैं कहूँ वही मांगना तो हम फायदे में रहेंगे. बहू ने राजा से कहा कि आप इस हार के बदले राजा से सारे गांव की रुई, दीया और तेल मांग लें.

लकड़हारे ने वही मांगा. राजा वचन दे चुके थे. विवश होकर आदेश जारी कर दिया कि लकड़हारा जिस गांव में रहता है उस पूरे गाँव का दीया तेल और रुई लकड़हारे के घर भेज दी जाये.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जब दिवाली कि रात आयी तो पूरे गाँव में अँधेरा था. लकड़हारे का घर रौशनी से जगमग. कोई कोना रोशनी से बाकी नहीं. घर में बैठी दारिद्री की तो आंखें ही फूटने लगीं, वह अंधेरे की जो आदी थी.

दारिद्री ने घर से बाहर जाने कि कोशिश कि तो दरवाजे पर बहू बैठी थी. वह बोली- जाना है तो सात पुश्तों के लिए जाओ. दरिद्री ने परेशान होकर उसकी शर्त मान ली और घर से निकल गई.

इसके बाद जब खूब रात हो गयी तो लक्ष्मीजी आईं. लक्ष्मीजी परेशान अंधरे में उनको कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था. रास्ता चलना मुश्किल. उन्हें लकडहारे का जगमग घर दिखाई दिया. वह उधर ही बढ चलीं.

लक्ष्मीजी लकड़हारे की बहू से बोलीं- गांव में अंधेरे के चलते मेरे पैर में कांटा चुभ गया है. मुझे जल्दी से अन्दर आने दे. बहू ने कहा- माता आपको कब मना है. पर मेरी एक विनती भरी शर्त है.

बहू ने मां लक्ष्मी से कहा- आना है तो सात पुश्तों के लिए आओ कोई और घर या रास्ता न देख लक्ष्मीजी ने उसकी यह शर्त मान ली और उस रात से उसके घर निवास करने लगीं. अगले ही दिन से लकड़हारे के वैभव का क्या पूछना.

इस तरह से यह साबित होता है कि मेहनत करना, मेहनत से पायी कमाई को बचा कर रखना और समय पर बुद्धि का इस्तेमाल करना लक्ष्मी पाने का सबसे सही तरीका है.

स्रोत: लोकगाथा

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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