Advertisement728 × 90

शिव बड़े कि हरि?

शिव बड़े कि हरि?

Shiva and Vishnu

प्रभु शरणं के पोस्ट की सूचना WhatsApp से चाहते हैं तो अपने मोबाइल में हमारा नंबर 9871507036 Prabhu Sharnam के नाम से save कर लें। फिर SEND लिखकर हमें उस नंबर पर whatsapp कर दें.

जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे.एक बार भगवान नारायण अपने वैकुंठलोक में सोये हुए थे. स्वप्न में वो क्या देखते है कि करोड़ो चन्द्रमाओं की कान्तिवाले, त्रिशूल-डमरूधारी, त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदातिरेक से उन्मत होकर उनके सामने नृत्य कर रहे हैं.

उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष-गदगद से सहसा शैय्या पर उठकर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे. उन्हें इस प्रकार बैठे देख श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगीं कि “भगवान! आपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है?”

भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में खोए हुए चुपचाप बैठे रहे. फिर गदगद-कंठ से बताने लगे- “हे देवि! मैंने अभी स्वप्न में भगवान श्री महेश्वर का दर्शन किया है.

उनकी छवि ऐसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी. मालूम होता है, भगवान शंकर ने मुझे स्मरण किया है. अहोभाग्य! चलो, कैलाश चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करते हैं.

लक्ष्मीजी भी सुनकर प्रसन्न हुईं और दोनों कैलाश की ओर चल दिए. श्रीहरि और महालक्ष्मी ने मुश्किल से आधी दूरी ही तय की होगी कि उन्हें महादेव, पार्वतीजी के साथ उनकी ओर ही आते दिख गए.

अब भगवान के आनंद का क्या ठिकाना? मानो घर बैठे निधि मिल गई. पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले. मानो प्रेम और आनंद का समुद्र उमड़ पड़ा.

एक दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आन्नद के अश्रु बहने लगे. दोनों के शरीर पुलकित हो गए. दोनों ही एक दूसरे को गले लगाए कुछ देर जड़वत खड़े रहे.अब दोनों ने ही कारण पूछा कि किधर की यात्रा है? मालूम हुआ कि शिवजी ने भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न देखा मानों विष्णु भगवान को उसी रूप में देख रहे हैं, जिस रूप में वह अब उनके सामने खड़े थे.

दोनों के स्वप्न का वृतांत अवगत होने पर दोनों ही लगे एक दूसरे से अपने यहां ले जाने का आग्रह करने. नारायण कहते प्रभु वैंकुण्ठ पधारकर उसे धन्य करिए. शम्भू कहते कैलाश पर आपके चरण पड़ें तो आनंद आए. कैलाश चलकर कृतार्थ करिए.

दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहाँ चला जाये?

इतने में ही वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारदजी कहीं से आ निकले. बस, फिर क्या था? किसे और किधर चलना चाहिए इसका निर्णय करने को नारदजी को कहा गया.

अब नारद जी तो स्वयं उस अलौकिक मिलन को देखकर आनंद में डूबे स्वयं अपनी सुध-बुध भूले बैठे थे. वह निर्णय करने के बदले झूमते-नाचते शिव-हरि के कीर्तन करने लगे.

अब निर्णय कौन करे? अंत में यह तय हुआ कि भगवती उमा जो निर्णय कर देंगी वही स्वीकार होगा. भगवती पहले तो कुछ देर चुप रहीं.

फिर निर्णय दिया- “हे नाथ! हे नारायण! आपलोगों के निश्छल, अनन्य एवम अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास- स्थान अलग-अलग नहीं हैं. जो कैलाश है वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है.केवल नाम में ही भेद है. यही नहीं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो लग रहे हैं. और तो और, मुझे तो अब यह स्पष्ट दिखने लगा है कि आपकी भार्यायें भी एक ही है, दो नहीं.

जो मैं हूं वही श्रीलक्ष्मी हैं और जो श्रीलक्ष्मी हैं वही मैं हुं. केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ धारणा हो गई है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानों दोंनों के प्रति ही घृणा का भाव रखता है.

एक की जो पूजा करता है, वह स्वाभाविक ही दूसरे की भी पूजा करता है और जो एक को अपूज्य मानता है वह दूसरे की भी पूजा नहीं करता. मैं तो यह समझती हूं कि आप दोनों में जो भेद मानता है.

उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है. मैं देखती हुं कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मुझे चक्कर में डाल रहे हैं, मुझे भुलावा दे रहे है.

अब मेरी यह प्रार्थना है कि आपलोग दोनों ही अपने-अपने लोक को पधारिये. श्रीविष्णु यह समझें कि हम शिवरूप में वैकुण्ठ जा रहे हैं और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णुरूप से कैलाश गमन कर रहे है.

इस निर्णय को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए दोनों अपने अपने लोक को चले गये.

लौटकर जब विष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि- ‘प्रभु! सबसे अधिक प्रिय आपको कौन है?

इस पर भगवान बोले- ‘प्रिय! मेरे प्रियतम केवल श्रीशंकरजी हैं. देहधारियो को अपने देह कि भांति वह मुझे अकारण ही प्रिय है. एक बार मैं और शंकरजी दोनों ही पृथ्वी पर घुमने निकले.मै अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश-देशांतर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा.

थोड़ी देर के बाद ही मेरी श्रीशंकर जी से भेंट हो गई. हम लोग पूर्वजन्म अर्जित विद्या की भांति एक दूसरे के प्रति आकृष्ट हो गये. वास्तव में मैं ही जनार्दन हूं और मैं ही महादेव हूं.

अलग-अलग दो घडों में रखे हुए जल की भांति मुझमें और उनमें कोई अंतर नहीं है. जो शिव की पूजा नहीं करते वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते.

सारः परमात्मा में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है. ऐसे तुच्छ विचार तो मानव मन में आते हैं. जो इन विचारों से ऊपर उठता है वही देवतुल्य होता है.

आपके आराध्य देव कोई भी हों किसी अन्य देव के प्रति अगर दुर्भावना है या श्रद्धा का भाव नहीं है तो आपके इष्ट देव की पूजा पूर्ण नहीं होती.

धर्म प्रचार के इस मिशन से जुड़िए. नीचे एप्प का लिंक है उसे क्लिक करके एक बार एप्प को डाउनलोड जरूर करें और देखें. नहीं पसंद आए तो डिलिट कर देना पर बिना देखे किसी चीज का मूल्यांकन हो सकता है क्या!!

अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प. लेटेस्ट कथाओं के लिए प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प डाउनलोड करें.

Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें

ये भी पढेंः

अपने ही वरदान के जाल में फंस गए भोलेनाथ
जानिए क्यों बारह वर्ष तक की आयु के बच्चे रहते है शनि के साढे साती से मुक्त

error: Content is protected !!