माण्डव्य मुनि के शाप से धर्मराज को लेना पड़ा दासीपुत्र के रूप में जन्मः विदुर की कथा

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राजा परीक्षित के बेटे और अभिमन्यु के पौत्र जनमेजय ने महात्मा विदुर के बारे में बहुत कुछ सुना. उनके ज्ञान, धर्मपरायणता और बुद्धिमता के बारे में सुनकर जनमेजय को विदुरजी के बारे में जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हुई.
जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायनजी ने कहा- राजन! विदुर धर्मराज के अवतार थे. महात्मा माण्डव्य के शाप से धर्मराज को विदुर रूप में उत्पन्न होना पड़ा. वह कथा मैं आपको सुनाता हूं.
माण्डव्य नामक एक धैर्यवान, धर्म के ज्ञाता, सत्यनिष्ठ एवं तेजस्वी मुनि थे. अपने आश्रम में मौनव्रत धारण करके वह कठिन तपस्या कर रहे थे. एक दिन राजमहल में चोरी करने के बाद कुछ चोर भागते हुए आए और मुनि के आश्रम में छिप गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.चोरों का पीछा करते हुए राजा के सैनिक आए. चोरों ने प्राण बचाने के लिए चोरी का धन आश्रम में रख दिया और छिप गए. सैनिकों ने माण्डव्य से चोरों और धन के बारे में पूछा लेकिन मौन व्रत के कारण वह चुप ही रहे.
सैनिकों ने खोजा तो चोरी का धन और चोर आश्रम में ही मिल गए. सैनिकों ने चोरों के साथ माण्डव्य को भी बांधा और राजा के पास ले गए. उस राज्य में चोरी का दंड था सूली पर चढ़ाकर मृत्यु देना.
मौन धारण करने के कारण मुनि अपना प्रतिवाद कर नहीं पाए इसलिए नियम अनुसार उन्हें भी चोरों के साथ सूली पर चढ़ाया गया. माण्डव्य ऋषि शूल के अग्र भाग पर बैठे हुए ही तप करते रहे. व्रत और अनाहार के कारण सूली पर चढ़ने से भी मृत्यु नहीं हुई.
शूल से भी एक मुनि के प्राण नहीं निकले यह बात फैल गई. तत्काल कई ऋषि-मुनि आए और सारी बात समझ गए. उन्होंने राजा की इसके लिए बहुत निंदा की.
राजा भागा आया और माण्डव्य से क्षमा मांगने लगा. उसने हर प्रकार से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास किया. मुनि प्रसन्न हो गए और राजा को क्षमा कर दिया.
मुनि को शूली से उतार दिया गया. शूल का कुछ हिस्सा उनके शरीर में प्रवेश कर गया था वह प्रयास करने पर भी नहीं निकला तो काट दिया गया. इसी से इनका नाम अणिमाण्डव्य पड़ा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.माण्डव्य के मन में यह समझने की लालसा हुई कि आखिर किस कारण से उन्हें ऐसा कष्ट मिल रहा है. वह धर्मराज के पास पहुंचे और पूछा- मेरे किस पाप का फल मुझे इस रूप में भुगतना पड़ा है.
धर्मराज ने बताया— आपने बचपन में एक पतंगे के पुच्छ भाग में सींक घुसेड़ दिया था और वह पीड़ा से छटपटाता रहा. माण्डव्य ने कहा- बचपन में शास्त्रज्ञान नहीं होता और बाल्यकाल के अपराधों का इतना बड़ा दंड.
हे घर्मराज! अज्ञानता में हुए बाल्यकाल के अपराध तो क्षम्य हैं. फिर भी आपने मुझे ऐसा कड़ा दंड दिया. मैं आपको शाप देता हूं कि आपको राजा, दासी पुत्र व चाण्डाल रूप में जन्म लेकर संसार के कष्ट भोगने होंगे.
धर्मराज ने उनसे अपनी भूल का पश्चाताप किया तो माण्डव्य ने कहा- आप पृथ्वीलोक पर जन्म तो लेंगे किंतु अपने गुणों के कारण आप सबके लिए श्रद्धेय और अनुकरणीय बनंगे. आपका बड़ा सम्मान होगा.
वैशम्पायनजी ने जनमेजय से कहा- हे राजन! इसी शाप के कारण धर्मराज को राजा युधिष्ठिर, दासीपुत्र विदुर एवं चाण्डाल के घर में वाल्मीकि के रूप में जन्म लेना पड़ा. (महाभारत की कथा)
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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